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जानिए किस तरह की बातों पर भरोसा करते हैं आधे लोग

अमित कुमार बाजपेयी | Updated on: 20 December 2016, 20:19 IST

क्या आपने कभी झूठी याददाश्त के बारे में सुना है. अगर नहीं तो कोई बात नहीं लेकिन सच यह है कि आधे लोग झूठी याददाश्त वाले होते हैं. यानी वे फर्जी तथ्यों पर विश्वास करते हैं और उन्हें वे घटनाएं याद रहती हैं जो कभी घटित ही नहीं हुईं.

अगर आपको भी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा तो एक हालिया शोध में इस तथ्य का खुलासा हुआ है. इंग्लैंड स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ वार्विक में मनोविज्ञान विभाग के डॉ. किंबरले वेड ने फाल्स मेमोरीज (झूठी याददाश्त) के बारे में शोध किया.

इस शोध में उन्होंने प्रदर्शित किया कि अगर हमें हमारे जीवन की बिल्कुल काल्पनिक घटनाओं के बारे में बताया जाए और बार-बार कहा जाए कि वो घटना हुई थी, तो हममें से आधे लोग यह मान लेंगे कि ऐसा हुआ था.

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400 से ज्यादा प्रतिभागियों ने स्मृति आरोपण (मेमोरी इंप्लांटेशन) शोध में हिस्सा लिया और इन्हें उनके जीवन की काल्पनिक घटनाओं के बारे में बताया गया, तो पता चला कि इनमें से करीब आधे प्रतिभागियों ने इनपर विश्वास कर लिया. कुछ ने कहा कि उन्होंने इन घटनाओं का अनुभव भी किया है.

इस शोध के प्रतिभागियों को उनके जीवन की कई झूठी घटनाएं याद करने को कहा गया. इनमें बचपने में की गई हॉट एयर बैलून की यात्रा, किसी शिक्षक के साथ कोई प्रैंक करना या फिर परिवार में किसी की शादी में कोई परेशानी खड़ी करने जैसी घटनाएं शामिल हैं.

30 फीसदी प्रतिभागियों को लगा कि उन्हें यह घटनाएं याद हैं और उन्होंने इन घटनाओं को स्वीकार करने के साथ ही बताया भी कि कैसे यह घटनाएं घटी थीं. इतना ही नहीं कई ने तो इन घटनाओं से जुड़ी तस्वीरों का भी मौखिक चित्रण किया. अन्य 23 फीसदी ने ऐसे चिन्ह दिखाए कि वो इन घटनाओं को मानते हैं और उन्हें काफी हद तक लगता है कि यह घटनाएं घटीं भी थीं.

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डॉ. किंबरले और उनके सहयोगी इस नतीजे पर पहुंचे कि नियंत्रित शोध वातावरण में या फिर जीवन की वास्तिवक परिस्थितियों तक में यह तय करना बहुत मुश्किल है कि कब एक व्यक्ति झूठी याददाश्त से उलट हकीकत की पुरानी घटनाओं को याद कर रहा है.

कई क्षेत्रों में यह नतीजे काफी महत्वपूर्ण है- जैसे इलाज में, अदालती कक्ष में या फिर फोरेंसिक जांच में याददाश्त की असलियत पर सवाल उठाने के दौरान. 

इतना ही नहीं खबरों में गलत जानकारी की वजह से भी किसी व्यक्ति या समाज की सामूहिक याददाश्त भी गलत हो सकती है. 

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इस शोध की महत्ता पर डॉ. किंबरले टिप्पणी करते हैं, "हम जानते हैं कि झूठी याददाश्त और विश्वास को बनाने के लिए कई बातें प्रभाव डालती हैं- जैसे किसी व्यक्ति से बार-बार फर्जी घटना की कल्पना करने के लिए कहना या बार-बार किसी तस्वीर को दिखाकर उनकी याददाश्त को जगाना. लेकिन हम पूरी तरह यह नहीं समझ पाएं कि यह सभी कारक कैसे परस्पर प्रभाव डालते हैं. इस शोध की तरह एक बड़ा अध्ययन करने पर इसके बारे में कुछ और आगे तक पहुंचा जा सकता है."

उन्होंने यह भी लिखा, "यह नतीजे कि लोगों की भारी तादाद झूठे विश्वास विकसित करने की क्षमता रखती है, काफी महत्वपूर्ण हैं. हमारे शो से पता चला कि विकृत मान्यताएं (डिस्टॉर्टेड बिलीफ्स यानी असत्य या छेड़छाड़ की गई मान्यताओं) लोगों के व्यवहार, इरादों और दृष्टिकोणों को प्रभावित करती हैं." 

इन तरीकों में हेरफेर करके वैज्ञानिक बीते 20 वर्षों से यह शोध कर रहे हैं कि कैसे लोग पूरी तरह झूठे अनुभवों को याद कर सकते 

First published: 20 December 2016, 20:19 IST
 
अमित कुमार बाजपेयी @amit_bajpai2000

पत्रकारिता में एक दशक से ज्यादा का अनुभव. ऑनलाइन और ऑफलाइन कारोबार, गैज़ेट वर्ल्ड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, एजुकेशन पर पैनी नज़र रखते हैं. ग्रेटर नोएडा में हुई फार्मूला वन रेसिंग को लगातार दो साल कवर किया. एक्सपो मार्ट की शुरुआत से लेकर वहां होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों-संगोष्ठियों की रिपोर्टिंग.

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