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इंसानों की हड्डियों के साथ घूमते थे आवारा कुत्ते, सच्चाई जानकर डर से कांपने लगे लोग

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 January 2019, 11:12 IST

पेरू में करीब एक साल पहले अनोखा घटना देखने को मिली. जिसने वहां के लोगों को हैरान कर दिया. क्योंकि इलाके के आवारा कुत्ते अक्सर इंसानी हड्डियों के साथ नजर आने लगे. मामला हुआंचक्विटो इलाके का है. जहां करीब 500 साल पहले का एक ऐसा राज उजागर हुआ जो वाकई हैरान करने वाला था. लेकिन ये राज अब जाकर खुला है.

दरअसल, हुआंचक्विटो इलाके में रहने वाले लोग आवारा कुत्तों से परेशान हो गए थे. क्योंकि अक्सर वहां दिखने वाले कुत्तों के मुंह में इंसानी हड्डियां पाई जाने लगीं. 8 साल पहले जब पुरातत्व विभाग को इस बारे में पता चला तो इसकी जांच करवाई गई. जिसमें में पता चला 500 साल पुराने एक कब्रिस्तान का. उसके बाद इस इलाके की खुदाई की गई तो डरावनी सच्चाई सामने आई. इस सच्चाई ने हर को हैरान कर दिया.

बता दें कि साल 2011 में इस इलाके की खुदाई की गई. पुरातत्वविदों को खुदाई में कब्रिस्तान से सैकड़ों बच्चों और जानवरों के शव बरामद हुए. जिसे देखकर हर कोई हैरान हो गया. बाद में खुलासा हुआ कि इन बच्चों और जानवरों को वहां बलि देकर दफनाया गया था. इस जगह को दुनिया की सबसे बड़ी बलि देने वाली जगह बताया गया है.

उसके बाद पुरातत्व विभाग ने इन लाशों की रेडियोकार्बन जांच कराई. जिसमें पता चला कि सभी लाशें 5 से 14 साल के बच्चों की थीं, जिन्हें करीब 500 साल पहले यहां दफनाया गया था. दफनाने के तरीके और बच्चों के शरीर पर मिले निशानों को देखकर लग रहा था कि उन्हें अनुष्ठान के दौरान बलि देने के लिए मारा गया होगा. विशेषज्ञों ने अंदाजा लगाया है कि 500 साल पहले वहां के लोगों ने विनाशकारी बारिश और बाढ़ के दौरान देवताओं को प्रसन्न करने के लिए ऐसा किया होगा.

यही नहीं खुदाई के दौरान इस इलाके में एक और ऐसी ही जगह का पता चला था. दोनों जगहों से 300 इंसानी बच्चों और 466 बेबी लामा की डेड बॉडीज मिलीं. दरअसल, लामा एक प्रकार का जानवर है, जिसे सदियों पहले भोजन और परिवहन के स्रोत के रूप में बेहद मूल्यवान माना जाता था.

बता दें कि जिस जगह से बच्चों की लाशें बरामद की गईं. उस जगह को अब 'हुआंचक्विटो-लास लामाज' के नाम से जाना जाता है. यहां मिली कब्रों से बरामद बच्चों के शवों में लिपटे गहने और मिट्टी के बर्तन भी मिले थे. बताया जा रहा है कि ये कब्रें चिमू सभ्यता की हैं.

बता दें कि चिमू सभ्यता का विकास 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच हुआ था. इस सभ्यता को शहरों के निर्माण, बड़ी सिंचाई प्रणाली के अलावा काली मिट्टी और जटिल कीमती धातुओं के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है. इस सभ्यता के लोग चंद्रमा को सूर्य से ज्यादा शक्तिशाली मानते थे और यही वजह है कि वो चंद्रमा की ही पूजा करते थे.

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First published: 29 January 2019, 11:12 IST
 
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