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प्रकृति प्रेमी हैं यहां के लोग, हाथों से करते हैं खेती, नदी से जितना लेते हैं उतना करते हैं वापस

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 August 2019, 14:11 IST

शायद ही दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे प्रकृति से प्रेम ना हो. बावजदू इसके क्या हम प्रकृति को कुछ वापस लौटाते हैंनहीं! क्योंकि हमें प्रकृति से चीजें लेने की तो आदत होती है लेकिन प्रकृति को वापस कुछ नहीं देते. लेकिन अरुणाचल प्रदेश के लोअर सुबंसरी जिले में समुद्रतल से 5600 फीट की ऊंचाई पर स्थित जीरो घाटी के लोग ऐसे नहीं है. ये प्रकृति से जितना लेते हैं उसे उतना वापस कर देते हैं. शायद ये दुनिया के कुछ उन चुनिंदा जगहों में से एक है जहां आज भी प्रकृति और परंपराओं की जुगलबंदी कायम है.

यहां के लोग एक दूसरे की मदद के लिए काम करते हैं. वो एक दूसरे के खेत में काम कराने में मदद करते हैंयहां के लोग अनोखी खेती वाड़ी करते हैं. यहां लोग खेती में किसी पशु या मशीन की मदद नहीं ले, बल्कि सारा काम सिर्फ महिलाएं अपने हाथों से करती हैं. यहां महिलाएं ही खेती करती हैं और वही परिवार की मुखिया भी होती हैं. यह वही अपातिनी जनजाति है. यही नहीं महिलाएं काले नोज प्लग पहनती हैं और जिनके माथे से ठोढ़ी तक टैटू होते हैं.

यहां के लोग पानी की बचत करने में माहिर है या यों कहें कि यहां के लोग हर बूंद का सही इस्तेमाल करते हैं. यही नहीं यहां नियम है कि साल में एक दिन हर व्यक्ति को नहर की देखरेख के लिए देना होगा. वे खेतों की इन नालीनुमा नहरों में मछली पालन भी हो रहा है.

यहां के लोग रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि मछलियां जो कुछ उगलती हैं वो खेतों में समाता रहता है. ये लोग ऑर्गेनिक खेती करते हैं. मुर्गियों और जानवरों के बाड़ों से एकत्र अपशिष्ट का इस्तेमाल खेतों में किया जाता हैइसी के साथ घरों के चूल्हों से निकली राख, तिनके-पत्तियां, डंठल, घरों में फलों-सब्जियों समेत अन्य ऑर्गेनिक कचरा को खेतों में डाला जाता है. यहां के लोग ऐसा सदियों से करते आ रहे हैं. जीरो वैली के हॉन्ग, सिरो और ओल्ड जीरो गांव में इस खेती की परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ा रहे हैं.

बता दें कि इस घाटी में करीब 48 फीसदी जमीन पर धान की खेती और मछली पालन हो रहा है, जबकि आसपास का 33 प्रतिशत इलाका जंगलों से ढंका हुआ है. 17 फीसदी इलाके में सिर्फ बांस होते हैं. और केवल 2 प्रतिशत जमीन पर घर और घर में बाग-बगीचे हैं.

यहां के लोग कीवी, शहतूत, अलूचे जैसे वृक्षों को भी लगाते हैं. सितंबर के महीने में यहां के लोग म्यूजिक फेस्टिवल का आयोजन करते हैं. इसमें स्थानीय और दूसरे प्रांतों से कलाकार आते हैं. इस दौरान लाेग आधुिनक संगीत का आनंद लेते हैं.

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First published: 1 August 2019, 14:15 IST
 
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