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मन्नत पूरी होने पर इस मंदिर में भगवान को चढ़ाई जाती है देसी दारू, कांटों पर चलकर पूजा करते हैं भक्त

कैच ब्यूरो | Updated on: 23 February 2019, 12:11 IST

हमारे देश में लाखों मंदिर हैं और हर मंदिर से कोई ना कोई कहानी जुड़ी हुई है. इन मंदिरों में लोग पूूजा अर्चना के साथ-साथ मन्नत भी मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाते हैं. ऐसा ही एक मंदिर झारखंड के दुमका में स्थित है. इस मंदिर की खास बात ये है कि जब भक्तों की मन्नत पूरी हो जाती है तो यहां चढ़ावे में सोने-चांदी के जेवर या पैसे नहीं चढ़ाए जाते बल्कि देसी शराब चढ़ाई जाती है.

स्थानीय लोग दुमका के इस मंदिर को पहाड़ी बाबा चूटो नाथ के नाम से पुकारते हैं. इस मंदिर में ऐसी मान्यता है कि झारखंड, बिहार और पश्‍चिम बंगाल से हजारों लोग यहां आकर मन्नत मांगते हैं. पहाड़ बसे होने की वजह से इस मंदिर के पहाड़ी बाबा भी कहा जाता है. इस मंदिर का पुजारी कोई ब्राह्मण नहीं होता बल्कि घटवाल समुदाय के लोग ही इस मंदिर में पुजारी बनकर पूजा कराते हैं.

बताया जाता है कि इस मंदिर में मन्नत पूरी होने पर बाबा को महुआ से तैयार देसी दारू और पाठा भी भेंट दी जाती है. हालांकि मंदिर के इस प्रसाद को कोई भक्त ग्रहण नहीं कर सकता. बता दें कि पास ही में बहने वाली मयूराक्षी नदी के तट पर भक्त प्रसाद पकाते हैं और इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं.

 

वहीं जो भक्त इस मंदिर में बलि नहीं चढ़ाते और वैष्णव हैं, वो लोग अरवा चावल, बताशा, मिष्ठान व लड्डू चढ़ाते हैं. साथ ही पास ही में स्थित शिव पार्वती, मां काली और बजरंग बली के मंदिर में शीश नवाते हैं. इस मंदिर में चड़क पूजा भी की जाती है. इस मंदिर में आने वाले भक्‍त कांटों पर चलते हैं. यही नहीं कुछ भक्त आग के अंगारों से गुजरते हैं. हालांकि जब चड़क पूजा होती है तब यहां बलि नहीं दी जाती.

यहां पूजा-अर्चना करने वाले लोगों का कहना है कि पहाड़ी बाबा की प्राचीन काल से पूजा हो रही है. मंदिर की सबसे अनूठी परंपरा यह है कि यहां देसी शराब अर्पित की जाती है और नदी किनारे प्रसाद बनाकर यहीं ग्रहण किया जाता है. इस प्रसाद को भक्त अपने साथ लेकर नहीं जा सकते. चड़क पूजा के दौरान बाबा की भक्ति में यहां के भक्त डूबे रहते हैं. यह ऐसी कठिन साधना है जिसमें भक्त अंगारों पर चलते हैं और शरीर में मोटी कीलें चुभा लेते हैं.

स्थानीय लोग बताते हैं कि चूटोनाथ मंदिर में साल भर पाठा यानि बकरे की बलि देने की प्रथा है. हालांकि चड़क पूजा से 14 दिन पहले से यहां बलि पर रोक लगा दी जाती है. हर साल 14 अप्रैल को चड़क पूजा का आयोजन होता है. चड़क पूजा के आठ दिन तक बलि देने पर रोक रहती है.

इस दौरान मंदिर में केवल फुलाइश पूजन होता है. चड़क पूजा पर भव्य मेला लगता है और रात भर धार्मिक अनुष्ठान होते हैं. इसी दिन चूटो पहाड़ी की चोटी पर स्थापित पांच-बहनी माता मंदिर में भी पूजा की जाती है. बता दें कि इस मंदिर में साल में केवल एक बार चड़क पूजा के दिन ही पूजा होती है.


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First published: 23 February 2019, 12:11 IST
 
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