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इस गांव में जल्द आने वाली है प्रलय, जमीन पिघलने से मौत के मुहाने पर खड़े हैं लोग

कैच ब्यूरो | Updated on: 19 November 2018, 11:19 IST

दुनिया की आबो-हवा देती से बदल रही है. जिसे जलवायु परिवर्तन नाम दिया है. जलवायु परिवर्तन ने पृथ्वी पर इंसानी सभ्यता के सामने चुनौतियां पैदा कर दी हैं कि आने वाले समय में या तो इंसान का वजूद मिट जाएगा या पृथ्वी वीरान हो जाएगी. यही नहीं अब दुनियाभर के कई स्थानों पर इसके निशान भी मिलने लगे हैं. जैसा कि ग्रीनलैंड के एक छोटे से टाउन में मिल रहा है.

दरअसल, ग्रीनलैंड का कानाक कस्बा इसका जीता जागता सबूत है. दुनिया के सबसे उत्तरी छोर पर बसे इस कस्बे पर शायद जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर हो रहा है. इस कस्बे की आबादी करीब 650 है. यहां रहने वाले लोग हाड कंपा देने वाली बर्फ की ठंक से भी ज्यादा ठंड में जीने को मजबूर हैं.

यहां का तापमान दो साल या इससे भी ज्यादा सालों तक जीरो डिग्री सेल्सियस से नीचे बना रहता है. यही वजह है कि आर्कटिक में पड़ने वाला ये इलाका लगातार जमता जा रहा है. इसकी बुनियाद पर ही यहां इमारतें और दूसरे निर्माण कार्य किए गए हैं. लेकिन, धरती का तापमान बढ़ने की वजह से कानाक की जमीन पिघलने लगी है जो मकानों को नेस्तनाबूद करने को तैयार है.

जमीन की बर्फ पिछलने की वजह से यहां के मकानों में दरारें पढ़ना शुरु हो गई हैं और शायद आने वाले वक्त में इन मकानों का वजूद खत्म होने के आसार बन रहे हैं. इसी वजह से अब यहां नए मकान बनाना मुमकिन नहीं है. आर्कटिक इलाके में आबाद दूसरे कस्बों का भी यही हाल है, लेकिन दूसरे कस्बे तो बर्फ के बजाय चट्टानों पर टिके हुए हैं. बता दें कि 1950 के दशक में बसाया गया कानाक कस्बा, मिट्टी, बालू और दलदली जमीन पर बसा हुआ है.

बता दें कि यहां 'पर्माफ्रॉस्ट' यानि सब कुछ जम जाने वाले हालात रहते हैं. इसीलिए यहां बर्फीली जमीन के ऊपर ही मकान बनाए गए. बीबीसी ने डेनमार्क की कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी के सेबेस्टियन जैस्ट्रज्नी के हवाले से लिखा है कि, "चट्टान के मुकाबले मिट्टी और दलदली इलाकों में पानी होता है. ये बड़ी चुनौती होती है. जब पर्माफ्रॉस्ट के हालात होते हैं, तो जमीन जम जाती है. फिर ये पिघल भी जाती है. यानी ये ऊपर-नीचे होती रहती है. इसकी वजह से मकान धंस जाते हैं, लुढ़क जाते हैं या फिर गिर भी जाते हैं.”

जलवायु परिवर्तन ने यहां की हालात बदल दिए हैं. इसी वजह से यहां की जमीन पर जमी बर्फ पिघल रही है. इसलिए स्थानीय निवासी ओर्ला क्लीस्ट के मकान को नुकसान पहुंचा है. उनके मकान के लिविंग रूम और बाथरूम की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं. बाथरूम का फर्श इतना ऊबड़-खाबड़ हो गया है कि मकान की टाइल्स टूट रही हैं. ओर्ला के रसोईघर की दीवारें तो इतनी फट गई हैं कि उनसे हवा घर के भीतर आती है.

इन सर्द हवाओं से बचने के लिए लोगों ने घरों की दीवारों पर टेप चिपका दिए हैं. बर्फ पिघलने और जमने का जो चक्र लंबे फासले पर चलता था वो बड़ी तेजी से घूमने लगा है. 2018 में ग्रीनलैंड में कई दिन ऐसे रहे, जब तापमान माइनस 23 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया. ये 1958-2002 के बीच के औसत तापमान से ज्यादा है. पूरे उत्तरी आर्कटिक इलाके में तापमान में ये उछाल देखा जा रहा है.

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First published: 19 November 2018, 11:11 IST
 
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