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वो भारतीय जिसकी चीन के कई शहरों में लगी हैं मूर्तियां, इनके नाम की शपथ लेकर डॉक्टर बनते हैं छात्र

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 August 2020, 22:03 IST

भारत और चीन के बीच मौजूदा दौर में काफी अच्छे नहीं है. दोनों देशों के बीच सीमा पर काफी तनाव है और इसके कारण देश में चीन के खिलाफ एक माहौल है. हालाँकि, एक समय था जब चीन और भारत के बीच का संबंध काफी मजबूत थे और चीन को जब जरूरत थी तब भारत ने उसकी सहायता भी की थी.

1938 में, चीन जापानी आक्रमणकारियों के साथ युद्ध में था, इस दौरान चीन में चिकित्सकों और दवाओं की भारी कमी हो गई थी, सैनिक गंभीर अवस्था में घायल थे और उनको बचाने के लिए कोई बचा नहीं था, चीनी नेता झू डे के अनुरोध पर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने चीन की मदद करने के लिए पांच डॉक्टरों का एक दल चीन भेजने का फैसला किया. इसी दल का सदस्य थे, डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस, जो वहीं जाकर बस गए और उन्होंने एक चीनी महिला से शादी कर ली थी. डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस ने चीनी सैनिकों को बचाने के लिए घंटो काम किया, और  उनके योगदान को आज भी चीन याद करता है.


डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस का जन्म वर्ष 1910 में महाराष्ट्र के सोलापुर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उन्होंने  बंबई विश्वविद्यालय के सेठ जी.एस. मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की पढ़ाई की. जब को एमडी की पढ़ाई पूरी करने वाले थे, उस दौरान उन्हें एक कॉल आया जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल कर रख दी. उन्हें चीन जाना पड़ा. चीन में उन्हें के दिहुआ नाम दिया गया था, जहां हुआ का मतलब चीन था.

डॉ कोटनिस ने पांच साल तक यनान और उत्तरी चीन में काम किया. इस दौरान उन्होंने घायलों और रोगियों को सावधानीपूर्वक उपचार दिया. लेकिन इसी काम के कारण उनकी भी गई क्योंकि वो लगातार काम करते रहते थे, जिसके कारण वो बीमार हो गए. साल 1939 में उन्होंने पहले यनान में काम किया और फिर उत्तरी चीन में जापानी विरोधी बेस क्षेत्र में चले गए जहां उन्होंने आठवें रूट आर्मी जनरल अस्पताल के सर्जिकल विभाग के चिकित्सक प्रभारी के रूप में काम किया. 1942 के जुलाई में कोटनिस चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए. वो चीनी सैनिकों की जान तो बचा ही रहे थे, इस दौरान वो चीनी चिकित्साकर्मियों को प्रशिक्षित करने पर भी काम कर रहे थे.

डॉ कोटनिस के लिए कहा जाता है कि वो इतनी सावधानियों से सैनिकों के घाव सिलते थे, जिससे सैनिकों को कम से कम दर्द हो. साल 1940 में एक बार वो 13 दिनों तक लगातार काम करते रहे और उस दौरान उन्होंने 800 से अधिक चीनी सैनिकों का ईलाज किया था. कहा जाता है कि उन्होंने इसी दौरान 72 घंटे तक बिना रूके सर्जरी भी की थी. इसी दौरान उन्हें इस बात की सूचना मिली थी कि उनके पिता का निधन हो गया था, लेकिन फिर भी उन्होंने चीन में रूकने और वहीं पर काम करने का फैसला लिया.

डॉ कोटनिस वर्ष 1941 में डॉ. बेथ्यून इंटरनेशनल पीस हॉस्पिटल के निदेशक के रूप में नियुक्त किए गए और यहां उन्होंन काफी कम अंतराल में ही 2 हजार से अधिक सर्जियां की और कई लोगों की जान बचाई. इस दौरान उन्होंने चीन की भाषा भी सीखी और चीन में छात्रों को पढ़ाने लगे. बाद में उन्होंने दिसंबर 1941 के दौरान ही एक चीनी महिला से शादी और बाद में उनका एक लड़का भी जन्मा, लेकिन बच्चे के तीन महीने के जन्म उनती मृत्यु हो गई.

डॉ कोटनिस के योगदान को देखते हुए चीन के कई शहरों में डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस की प्रतिमाएं लगाई गई. डॉक्टर कोटनिस के नाम पर ही शिजिआझुआंग मेडिकल कॉलेज का नाम 'के दिहुआ मेडिकल साइंस सेकंडरी स्पेशलाइज्ड स्कूल' रखा गया है और आज भी शिजिआझुआंग के छात्र डॉक्टर बनने से पहले उनके नाम की शपथ लेते हैं.

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First published: 31 August 2020, 21:34 IST
 
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