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जब रूस में हुआ खतरनाक 'एक्सपेरिमेंट', लोग खाने लगे थे अपने शरीर का मांस

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 August 2020, 16:59 IST

अगर कोई व्यक्ति सही नींद नहीं लेता है तो उसे कई तरह की बीमारियां होती हैं, कई बार ऐसा होता कि कोई व्यक्ति 24घंटे से अधिक समय तक नहीं सोता जिसके कारण उसे सरदर्द जैसी परेशानी का सामना करना पड़ता है. हालांकि, कभी आपने सोचा है कि अगर कोई इंसान एक दो दिन नहीं बल्की करीब एक महीने तक ना सोए तो उसके साथ क्या होगा. आपको लगेगा शायद उस व्यक्ति के व्यवहार में कोई बदलाव आएगा और वो ऐसा करने में सफल हो जाएगा. हालांकि, किसी को नहीं पता कि अगर कोई व्यक्ति एक महीने तक बिना एक पल सोए रह सकता है. लेकिन दूसरे विश्व युद्द से पहले एक ऐसा प्रयोग हुआ था, जिसमें रूस के वैज्ञानिक ने ऐसा प्रयोग करने की कोशिश की थी.

कहा जाता है कि 1940 के दशक के अंत में रूसी शोधकर्ताओं ने एक प्रयोगात्मक गैस आधारित उत्तेजक का उपयोग करके पंद्रह दिनों तक पांच लोगों को जगाए रखा. इन लोगों को ऐसे कमरे में रखा गया था जो पूरी तरह से सील था और इस दौरान उनके सांस लेने के लिए ऑक्सीजन के उपयोग पर सावधानीपूर्वक निगरानी रखी गई. इन कमरों में किताबें रखी हुई थी, पर्याप्त सूखा भोजन, बहता पानी और टॉयलेट जैसी सुवधिाओं से लैस था. इसमें एक पांच इंच मोटी सीसे की खिड़की भी थी, जिससे उनके ऊपर नजर रखी जाती थी.


कहा जाता है कि जो लोग परीक्षण के लिए लाए गए थे वो राजनीतिक कैदी थे जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राज्य के दुश्मन समझा गया था. उनसे झूठा वादा किया गया कि उन्हें इस एक्सपेरिमेंट के बाद आजाद कर दिया जाएगा. ऐसे में यह लोग इसके लिए राजी हो गए.

 

इस एक्सपेरिमेंट के शुरूआती पहले पांच दिनों तक सब कुछ ठीक था. इस दौरान उनकी हर गतिविधियों पर नजर रखी गई. शुरूआत में वो सभी अपने अतीत में बढ़ती दर्दनाक घटनाओं के बारे में बात करते थे. लेकिन इसके बाद चीजे बदलती चली गई. ये लोग अपने अतीत में बढ़ती दर्दनाक घटनाओं के बारे में बात करना जारी रखते थे, जिसके कारण यहां तक पहुंचे थे. इसके बाद ये सभी लोग एक-दूसरे से बात करना बंद कर देते हैं और बारी-बारी से माइक्रोफ़ोन में फुसफुसाहट करने लगते हैं कभी कमरे में लगे सीसे को देखकर उसमें बात करते और अजीब तरह का बर्ताव करते.

वहीं इस परिक्षण के नौ दिन के बाद इन पांच में से एक कैदी जोर से चीखने लगे. वो लगातार चीख रहा था और चेंबर में ही इधर उधर दौड़ लगा रहा था. ऐसा उसने करीब तीन घंटे तक किया. उसके बाद उसकी आवाज बंद हो गई. वैज्ञानिकों को लगा कि उसके चीखने के कारण उसकी वोकल कॉर्ड फट गई है. वहीं इस दौरान वैज्ञानिकों के लिए सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इस दौरान बाकी किसी कैदी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

ऐसे ही कुछ और बीत गए, लेकिन 11वें दिन के बाद से ही अंदर के कोई आवाज नहीं आ रही थी, ऐसे में उन्होंने हर घंटे माइक्रोफोनों की जांच की, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे काम कर रहे हैं. इस दौरान चैम्बर में ऑक्सीजन की खपत ने संकेत दिया कि सभी पांचों को अभी भी जीवित होना चाहिए. इस दौरान इन पांचों ने जो ऑक्सीजन ली वो इतनी थी जिनती पांच लोग कठोर व्यायाम करने के बाद लेते.

 

इसके बाद 14वें दिन की सुबह शोधकर्ताओं ने चेंबर को खोलने का प्रयास किया. इसके लिए उन्होंने चेंबर के अंदर घोषणा की,"हम माइक्रोफोन का परीक्षण करने के लिए कक्ष खोल रहे हैं, दरवाजे से दूर और फर्श पर सपाट लेट जाएंगे या गोली मार दी जाएगी. अनुपालन आप में से एक को आपकी तत्काल स्वतंत्रता अर्जित करेगा." लेकिन उन्हें काफी हैरान करने वाला जवाब मिला. अंदर से आवाज आई कि हम अब आजाद नहीं होना चाहते हैं. ऐसे में वैज्ञानिकों की राय बट गई और उन्होंने 15वें दिन की मध्यरात्री में चेंबर को खोलने का फैसला लिया. जब चेंबर को खोल गया को उसे देखकर सभी के होश उड़ गए थे. पांच में से एक व्यक्ति कि मौत हो गई थी जबकि चार अन्य के शरीर से मांस गायब था. उन लोगों को देखकर लग रहा था कि उन्होंने खुद का ही मांस खाया है.

वैज्ञानिकों के इस कैदियों को चेंबर से बाहर निकालने का फैसला लिया और इसके लिए रूसी सैनिकों को बुलाया. इस दौरान कई रूसी सैनिकों की मौत हो गई क्योंकि ये लोग बाहर नहीं आना चाहते थे और जब सैनिक इन्हें पकड़कर लाने लगे तो उन्होंने उन्हें मार डाला. हालांकि, बाद में इन्हें बाहर लाया गया और रिसर्च सेंटर में ही इनका ईलाज किया गया. इन लोगों के ईलाज के बाद सबसे बड़ी दुविधा थी कि इनका क्या किया जाए, क्योंकि सभी वापस उसी चेंबर में ना सोने देने वाली गैस में जाना चाहते थे.

इसके बाद एक रूसी कमांडर ने इन्हें वापस उसी रूम में डालने और एक्सपेरिमेंट को जारी रखने का निर्देश दिया. लेकिन टीम के एक सदस्य ने रूसी कमांडर समेत बाकी के लोगों को भी मार दिया और एक्सपेरिमेंट के जुड़े सभी सबूत नष्ट कर दिए.

आज भी कई लोगों इस एक्सपेरिमेंट पर विश्वास करते हैं और कई लोग इसे बस मनगंढ़त बताते हैं. हालांकि, यह कहानी सच है या नहीं इसके बारे में तो किसी को कुछ नहीं पता लेकिन साल 2010 में creepypasta.fandom.com नामक वेबसाइट पर इसके बारें में बताया गया था और तब यह सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी.

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First published: 15 August 2020, 13:32 IST
 
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