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जब अमेरिका में गलत वैक्सीन लगाने के कारण 40 हजार बच्चों की जान पर मंडराने लगी मौत

कैच ब्यूरो | Updated on: 3 September 2020, 9:56 IST

कोरोना वायरस महामारी के कारण पूरे विश्व में करीब 3 करोड़ लोग संक्रमित हो चुके हैं जबकि करीब 9 लाख लोगों की जान जा चुकी है. वहीं पूरी दुनिया में वायरस की वैक्सीन बनाने को लेकर होड़ मची हुई है. रूस ने वैक्सीन का रजिस्ट्रेशन करवा अपने यहां लोगों को वैक्सीन लगानी शुरू कर दी है, लेकिन कई वैज्ञानिकों ने इसको लेकर चिंता जताई है. दूसरी तरफ अमेरिका है जिसने जल्द जे जल्द वैक्सीन बनाने का दावा किया है. हर देश की स्थिति लगभग यही है, कोई भी वैक्सीन बनाने में पीछे नहीं होना चाहता. हालांकि वैज्ञानिकों ने इसको लेकर चिंता जाहिर की है अगर वैक्सीन का निर्माण हड़बड़ी में किया गया तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने पर सकते हैं और ऐसा हम एक बार देख भी चुके हैं, जब अमेरिका में एक वैक्सीन के कारण 40 हजार से अधिक बच्चों की जान पर मौत मंडरा रही थी क्योंकि उन्हें गलत वैक्सीन लगाई गई थी.

दरअसल, पोलियो के कारण अमेरिका में हर साल हजारों बच्चों की जान जा रही थी. लोग एक दूसरे से दूरी बनाए रखते थे, क्योंकि किसी को नहीं पता था कि आखिर बच्चों की जान क्यों जा रही है. पोलियो के कारण अमेरिका में सबसे खराब स्थिति साल 1952 में बनी थी, उस साल अमेरिका में 21,000 लोगों को लकवा मार गया था, 3,145 लोगों की जान गई थी, जबकि कुल 57,000 लोगों इससे संक्रमित हुए थे.


 

साल 1951 में यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के मेडिकल स्कूल के जोनास साल्क को वैक्सीन खोजने के लिए नेशनल फाउंडेशन फॉर इन्फैंटाइल पैरालिसिस से अनुदान मिला. कई महीनों की शोध के बाद वो सफल हुए और उनकी कामयाबी के किस्से अखबरों में छपे. साल्क की पोलियो की वैक्सीन का बड़े पैमाने पर ट्रायल हुआ, दूसरी तरफ अमेरिकी सरकार पर इस वैक्सीन के बड़े स्तर पर उत्पादन का दवाब बढ़े जा रहा था. 12 अप्रैल 1955 को वैक्सीन के ट्रायल के नतीजे आए, जो उसकी सफलता की कहानी बता रहे थे.

अमेरिकी सरकार ने उसी दिन देश की कई जानी मानी कंपनियों को इस ड्रग को बनाने के लिए लाइसेंस दिया गया जिसमें कटर लैबोरेटरीज भी शामिल थी. लेकिन इस वैक्सीन के साथ एक दिक्कत थी, जिसे एक वैज्ञानिक ने उठाया भी था लेकिन अधिकारियों तक उनकी बात पहुंची ही नहीं थी.

 

30 अगस्त 1954 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान, बेथेस्डा के एक वैज्ञानिक बर्निस ई एड्डी पोलियो वैक्सीन के एक बैच की जांच कर रहे थे. बर्निस ई एड्डी का काम था कि जिन कंपनियों ने वैक्सीन बनाने के लिए अपने सैंपल भेजे हैं क्या वो सही हैं या नहीं. बर्निस ई एड्डी ने जब कैलिफ़ोर्निया में कटर प्रयोगशालाओं से आए एक नमूने की जाँच की, उनके होश उड़ गए. क्योंकि वैक्सीन को पोलियो से बचाने के लिए बनाया जा रहा था जबकि वैक्सीन लगाने के बाद एक बंदर को पोलियो हो गया. उन्होंने पाया कि कटर कंपनी के नमूने में जीवित, संक्रामक वायरस था. उन्होंने अगस्त 1954 में कटर के सैंपल की जांच शुरू की थी जो नवंबर तक चली और इस दौरान उन्होंने पाया कि कंपनी ने जो छह सैंपल भेजे थे, जिन्हें बंदरों को लगाया गया, उसमें से छह में से तीन बंदर को लकवा मार गया था.

इसके बाद बड़े पांच कंपनियों ने बड़े पैमाने पर इस वैक्सीन का निर्माण शुरू हुआ. कटर कंपनी ने 1 लाख 65 हजार से अधिक डोज बनाए. लेकिन कुछ दिनों बाद ही रहस्यमय तरीके से इंसान पोलियो का शिकार होने लगे थे. कहा जाता है कि तकरीबन 1.2 लाख बच्चों को कटर लेबोरेटरीज की वैक्सीन लगाई गई थी जिसके कारण करीब 40 हजार बच्चे पोलियो के शिकार हो गए जबकि 51 बच्चे पैरालाइज्ड हो गए और कम से कम 25 बच्चों की मौत हो गई. कई लोग इसे अमेरिकी इतिहास की एक सबसे बड़ी जैविक त्रासदी बताते हैं.

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First published: 3 September 2020, 9:00 IST
 
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