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इस जगह है ऐसे सिक्कों का चलन जिन्हें चोरी नहीं किया जा सकता, हैरान कर देने वाली है वजह

कैच ब्यूरो | Updated on: 8 May 2018, 10:58 IST
(Flickr: The British Library)

इंसानी सभ्यता जितनी पुरानी है, उतनी ही पुराने उसके रीति-रिवाज हैं. करेंसी यानि मुद्रा का इस्तेमाल भी उनमें से एक है. सदियों से लोग खरीद-फरोख्त के लिए करेंसी का ही इस्तेमाल करते रहे हैं. चाहे वो सिक्कों के रूप में हो या नोटों के रूप में. हर दौरा में इसका प्रयोग अलग-अलग रूप में होता रहा है.

किसी सभ्यता में महंगे रत्नों से कारोबार किया जाता था तो किसी में मोती, कौडियों और इसी तरह के दूसरे रत्नों का प्रयोग होता रहा. उसके बाद दौर आया सिक्कों का. शुरुआत में सोने-चांदी के सिक्कों का चलन रहा. उसके बाद तांबे और कांसे ने सिक्कों का रूप ले लिया. उसके बाद अल्यूमिनियम के सिक्के चलन में आए.

आज हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे देश के बारे में जहां ना सोने-चांदी के सिक्के चलते हैं और ना ही अल्यूमिनियम के. दरअसल, प्रशांतमहासागर में एक द्वीप पर आज भी पत्थरों के सिक्के चलते हैं. इस द्वीप का नाम है माइक्रोनेशिया. माइक्रोनेशिया द्वीप पर कई छोटे-छोटे जजीरे हैं. इन्हीं में से एक द्वीप पर यप. यप द्वीप पर मात्रा 11 हजार लोग रहे हैं.

बता दें कि यप द्वीप का जिक्र समय-समय पर होता रहा है. यूरोपीय यात्री मार्को पोलो ने तेरहवीं शताब्दी में इस का जिक्र किया था. इससे पहले 11वीं सदी में मिस्र के एक राजा ने भी यप द्वीप के बारे में बताया था. जहां पत्थरों के सिक्कों का चलन था.

यप द्वीप में आपको घने जंगलों के साथ दलदल और बेहद पुराने जमाने के हालात जैसा माहौल मिलेगा. यहां दिन भर में सिर्फ एक फ्लाइट है, जो यप के छोटे से हवाई अड्डे पर उतरती है. हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही आप को कतार से लगे छोटे-बड़े ढले हुए पत्थर दिखेंगे. इन पत्थरों के बीच मे छेद होता है, ताकि इन्हें कहीं लाने- ले जाने में दिक्कत ना हो. पूरे यप द्वीप पर ऐसे छोटे-बड़े पत्थर आपको हर जगह दिखाई दे जाएंगे.

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इस द्वीप पर पत्थर की इस करेंसी का चलन सदियों से है. किसी को नहीं पता कि इसकी शुरुआत कब हुई थी. स्थानीय लोग बताते हैं कि आज से सैकड़ों साल पहले यप के बाशिंदे डोंगियों में बैठकर चार सौ किलोमीटर दूर स्थित पलाऊ द्वीप जाया करते थे. वहां से वो चट्टानें काटकर ये पत्थर तराशा करते थे. फिर इन्हें नावों में लाद कर यहां यप लाया जाता था. इन्हें राई कहा जाता है. पिछली कई सदियों से इन पत्थरों को करेंसी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है.

कहा जाता है कि जब पलाऊ जाने वाले नाविक अपने साथ ढले हुए पत्थर लाते थे, तो वो इन्हें यप के बड़े सरदारों को सौंप देते थे. फिर वो सरदार इन पत्थरों को अपना या अपने परिवार के किसी सदस्य का नाम देकर लाने वाले को सौंप देते थे. पांच में से दो पत्थर ये सरदार अपने पास रखते थे और तीन पत्थर लाने वाले को दे दिये जाते थे.

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इन पत्थरों की यप समाज में अपनी अहमियत बरकरार है. आज हर पत्थर का इतिहास है. उससे जुड़ा कोई न कोई क़िस्सा है. किसी भी परिवार के पास ये करेंसी होना बहुत सम्मान की बात मानी जाती है. आज इन पत्थरों की करेंसी का इस्तेमाल रोजाना के लेन-देन में नहीं होता. बल्कि समाज में इसे कभी माफीनामे और कभी शादी-संबंध को मजबूत करने के लिए किया जाता है.

इन पत्थर के सिक्कों का आकार 7 सेंटीमीटर से लेकर 3.6 मीटर तक होता है. इन सिक्कों का मोल इस बात पर निर्भर करता है कि वो किस काम में इस्तेमाल होता है और किसको दिया जाता है. कबीले के सरदार, आने वाली नस्लों को पत्थर के हर सिक्के का इतिहास बताते हैं. इन पत्थरों के चोरी होने का भी डर नहीं है.

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First published: 8 May 2018, 10:58 IST
 
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