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एक साल, नीतीश कुमार: नई संगत में नया सफर

एन कुमार | Updated on: 23 November 2016, 7:57 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने अपनी वेबसाइट पर नीतीश सरकार के एक साल के कार्यकाल की रिपोर्ट अपलोड कर दी है. 
  • यह रिपोर्ट नीतीश कुमार के सात निश्चयों पर केंद्रित है जिसमें से कृषि, महादलित विकास मिशन और मानव विकास मिशन जैसे अहम सवाल गायब हैं.

140 पन्ने की रिपोर्ट तैयार थी, 20 नवंबर को ही नीतीश कुमार अपने एक साल के कामकाज का रिपोर्ट पेश करने वाले थे, उसी दिन कानपुर में रेल हादसा हो गया. लिहाजा नीतीश कुमार ने आयोजन को टाल दिया.

उसके ठीक एक दिन पहले भाजपा के नेताओं के संग राजग के सहयोगी केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार की सरकार के एक साल का रिपोर्ट 'एक साल, बुरा हाल' नाम से जारी कर दिया था. स्वाभाविक तौर विफलताओं का लेखा-जोखा के साथ ही सवालों का पुलिंदा भी पेश किया गया था.

साल भर में अपराध की बढ़ी घटनाओं, कृषि कैबिनेट की योजना के खात्मे, बैंक की ही योजना को स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड सिस्टम जैसे नाम दिये जाने पर आपत्ति जताते हुए नीतीश कुमार से जवाब मांगा गया कि उनके सात निश्चयों में कृषि गायब है.

महादलित विकास मिशन, मानव विकास मिशन के काम गायब हैं, ऐसा क्यों? और भी कई सवाल राजग नेताओं ने सामने रखे गए. नीतीश कुमार ने अपनी रिपोर्ट जारी ही नहीं किया, इसलिए उन्हें किसी सवाल का जवाब नहीं देना पड़ा.

रिपोर्ट मील का पत्थर

अब बिहार की सरकार ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की वेबसाइट पर 140 पन्ने की एक रिपोर्ट अपलोड कर दी गई है. रिपोर्ट नीतीश कुमार के सात निश्चयों पर केंद्रित है. बीच में सरकार के दूसरे लोगों को भी थोड़ा श्रेय दिया गया है. कहीं तेजस्वी भी प्रमुखता से हैं. स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड सिस्टम, पिछले एक साल में साढे़ दस लाख बिजली उपभोक्ता बढ़ाने, महिलाओं को सभी नौकरियो में 35 प्रतिशत और शिक्षक की नौकरी में 50 प्रतिशत आरक्षण, हर घर में पेयजल की पाईप लाईन पहुंचाने के लक्ष्य समेत सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर है कि पिछले दस सालों में बिहार के योजना आकार में 27 गुणा बढ़ोत्तरी हुई है. यह एक मील का पत्थर है.

लालू प्रसाद की राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर एक साल पहले शुरू हुए सफरनामें का लेखा-जोखा अब वेबसाइट पर उपलब्ध है. हर साल अपने कामकाज का लेखा.जोखा वार्षिक रिपोर्ट के रूप में सार्वजनिक करने की परंपरा की शुरुआत नीतीश कुमार ने ही 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरू की थी.

विपक्ष हमलावर

इस बार उनकी दसवीं रिपोर्ट जारी होती. इस रिपोर्ट को अपलोड किये जाने के बाद भाजपा नेता सुशील मोदी कहते हैं कि हमने जवाब मांगा था, उन्हें जवाब देना चाहिए था लेकिन नीतीश कुमार ने रेल हादसे का बहाना बनाकर आयोजन को टाल दिया. क्योंकि उन्हें जवाब देना पड़ता जो कि वे दे नहीं पाते.

सुशील मोदी की तरह ही भाजपा के एक और नेता नंदकिशोर यादव कहते हैं कि नीतीश कुमार के पास जवाब नहीं है. पिछले एक साल से बिहार सिर्फ आपराधिक गतिविधियों के कारण चरचे में रहा तो वे जवाब क्या देंगे. इसलिए नीतीश कुमार सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के वेबसाइट पर रिपोर्ट कार्ड जारी किए हैं.

यह प्रसंग अगले कुछ दिनों तक चलेगा. राजग के पास सवाल रहेगा, नीतीश कुमार के लोग जवाब देंगे. राजद के नेता और राज्य के मंत्री तेजप्रताप यादव कहते हैं कि उस पार्टी के नेताओं को क्या जवाब देना, जिसके पास कानपुर रेल हादसे के बाद भी देने के लिए संवेदना नहीं है.

तेज प्रताप कहते हैं, कानपुर रेल हादसे के बाद हम लोगों ने सारे आयोजन रद्द कर दिये और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कानपुर से ही सटे आगरा में राजनीतिक भाषण दिये जा रहे थे. भाजपा के ऐसे नेताओं को जवाब देने का कोई मतलब नहीं. तेजप्रताप अपनी बात एक लाइन में खत्म कर देते हैं.

भाजपा से ज्यादा राजद की ओर से नीतीश कुमार को घेरने की कोशिश पिछले एक साल से जारी है. इसलिए इसमें कुछ नया नहीं. कई मसले पर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का अलग-अलग रुख रहा है. इन सब से परे नीतीश कुमार के एक साल के इस नये सफर पर गौर करें तो यह बातें साफ होंगी कि वे इन सभी बातों को सफर शुरू करने के पहले ही आंक चुके थे. इसलिए भाजपा के साथ-साथ राजद को भी नाथते हुए अपने सफर को जारी रखे हुए हैं. अगर एक साल में उनकी बदली शैली को देखें तो यह साफ लगेगा कि नीतीश कुमार राज्यस्तर पर खुद को नये सिरे से स्थापित करने में लगे हुए हैं साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं.

निश्चय यात्रा

वरिष्ठ पत्रकार और बिहार की राजनीति की जमीनी समझ रखनेवाले बिरेंद्र यादव कहते हैं, '28 मंत्रियों के साथ नीतीश कुमार एक साल का जश्न मना रहे हैं. कुल 44 विभाग हैं, नीतीश कुमार ने चतुराई से 23 विभाग जदयू के खाते में डाल दिये हैं. राजद में लालू प्रसाद के दोनों बेटे तेजप्रताप और तेजस्वी के अलावा अब्दुल बारी सिद्दिकी को छोड़ दे तो सभी के जिम्मे एक-एक विभाग है और उनका भी कोई खास महत्व नहीं है. यही हाल कांग्रेस का भी है.'

इतना ही नहीं इस एक साल में देखें तो सरकार में शामिल कांग्रेस और राजद के जो कार्यकर्ता हैं वे सिर्फ टकटकी लगाये हुए हैं. बिहार में कई बोर्ड निगम हैं, जिन पर पहले जदयू के नेताओं का ही कब्जा था. नयी सरकार बनने के बाद सबका इस्तीफा लिया गया. उम्मीद की गयी कि इन पदों को भरा जाएगा, कुछ नए लोगों को मौका मिलगा. लेकिन एक साल हो गये, सभी पद खाली हैं.

नीतीश कुमार उस पर कुछ बोलने की बजाय सात निश्चयों और शराबबंदी पर फोकस किए हुए हैं. वे निश्चय यात्रा पर है. इस यात्रा के जरिये नीतीश कुमार अपने लिए जीविकासेवियों, आंगनबाड़ी सेविकाओं, पंचायत के विभिन्न पदों पर कार्यरत लोगों के जरिये नये कार्यकर्ता तैयार करने में लगे हुए हैं.

बिरेंद्र यादव कहते हैं, 'सिर्फ निश्चय यात्रा ही नहीं, पिछले एक साल में जितनी भी योजनाएं नीतीश कुमार ने चलायी है, उसमें खुद को उन्होंने केंद्रित किया है और तेजस्वी या राज्य के दूसरे नेता कहीं-कहीं फर्जअदायगी करते दिखते हैं.'

चतुर नेता

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर वात्सायन कहते हैं कि नीतीश कुमार चतुर नेता हैं, जैसी आशंका थी, वैसी बात नहीं हुई. पहले यह अशंका थी कि लालू प्रसाद यादव के साथ नीतीश कुमार सत्ता में रहेंगे तो लालू प्रसाद यादव हावी रहेंगे. लालू प्रसाद यादव ने यह कहा भी था कि अब बिहार में नीतीश कुमार राजपाट संभालेंगे और वे भाजपा को जवाब देंगे और देश भर घूमकर राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का विरोध करेंगे.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. नीतीश कुमार ने पिछले एक साल में लालू प्रसाद को कोई मौका नहीं दिया. कि वे हावी हो सकें या यह साबित कर सकें कि नीतीश कुमार उनकी दया पर निर्भर हैं. ज्ञानेश्वर कहते हैं कि नीतीश कुमार पिछले एक साल से भाजपा और राजग के शामिल सभी दलों के साथ ही राजद से भी उतनी मजबूती से लड़ रहे हैं. यह अलग बात है कि भाजपा को वे मुखर होकर जवाब दे रहे हैं जबकि राजद को वे मौन साधकर साध रहे हैं.

बकौल ज्ञानेश्वर, नीतीश कुमार ने पिछले एक साल में शहाबुद्दीन का रुख, तसलीमुद्दीन का रुख, शिक्षा माफियाओं का खेल और राजद से उनका कनेक्शन, सब देखा और झेला है. वे जानते हैं कि राजद नेता अगर खुलेआम नीतीश कुमार के साथ बोल रहे हैं तो वे अपनी मर्जी से नहीं बोल रहे. इसलिए वे सतर्क हैं और सावधानी से काम कर रहे हैं.

मोदी का विकल्प

नीतीश कुमार की स्थापित होती स्वतंत्र छवि की बात पर समाजशास्त्री प्रो एस नारायण कहते हैं कि अब इसमें कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हो चुके हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी का विकल्प बन सकते हैं. शासक के तौर पर यह काबलियत उनमें है और नेता के तौर पर दृष्टि भी. यह कोई आसान काम नहीं कि नीतीश कुमार पिछले एक साल से कांग्रेस और राजद के सत्ता में रहने के बावजूद खुद को इकलौते सूत्रधार नेता के तौर पर उभारने में सफल हुए हैं और भाजपा तथा राजग के दूसरे दलों की धार को कुंद करने में सफल रहे हैं.

प्रो नारायण कहते हैं कि आप नीतीश कुमार की सक्रियता को पिछले एक साल में देखेंगे तो सब पता चल जाएगा. वे केंद्र सरकार को जवाब भी देते हैं, सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी जैसे फैसले पर लालू प्रसाद के विपरीत जाकर केंद्र का समर्थन भी कर देते हैं. वे जदयू के अध्यक्ष के रूप में पार्टी का विस्तार भी करने में लगे हुए हैं. यूपी में भी लगातार सभा करते हैं. पास के झारखंड में भी सक्रिय रहते हैं और बिहार में तो लगातार अपने को आगे रखे ही हुए हैं.

जिस लालू प्रसाद यादव को सत्ता से उखाड़कर नीतीश कुमार सत्ता में आए थे उन्हीं लालू प्रसाद यादव के साथ दोबारा मिले तो उनके राजनीतिक जीवन का मर्सियागान किया गया कि यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा. लोगों ने इसे अवसरवादिता की हद बताया. लेकिन नीतीश ने एक साल में साबित किया कि वे अवसरवादी नहीं बल्कि अवसरों को अपनी योग्यता से अपने अनुसार ढालने वाले नेता हैं. उनका कोई इस्तेमाल नहीं कर सकता, वे किसी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

First published: 23 November 2016, 7:57 IST
 
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