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सोनपुर मेला: जनता और जानवर दोनों नदारद

निहारिका कुमारी | Updated on: 21 November 2016, 7:45 IST
(सभी फोटो: निहारिका कुमारी)

सोनपुर में इस समय मेले से ज्यादा भीड़ वहां के बैंकों और एटीएम में है. हालांकि यही हाल पूरे देश का है. लेकिन सोनपुर अलग है. सोनपुर अपने पशु मेले के कारण ऐतिहासिक है. हरिहर क्षेत्र सोनपुर के नाम से प्रसिद्ध इस ऐतिहासिक मेले का संयोग कहें या दुर्योग कि यह विश्व प्रसिद्ध मेला 12 नवंबर को शुरू हुआ और 13 दिसंबर तक चलेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके ठीक चार दिन पहले ही 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का ऐलान कर दिया था. लिहाजा इस फैसले का मेले की रंगत-रौनक पर बुरा असर पड़ा है. जनता और जानवर दोनों मेले से नदारद हैं.

मेले का मुआयना करने पहुंचे कैच ने यहां दूर-दराज से आए तमाम व्यापारियों और मेलार्थियों से बातचीत कर नोटबंदी के असर का एक आकलन किया. गौरतलब है कि सोनपुरा का मेला अपने पशु व्यापार के लिए प्राचीन काल से ही मशहूर रहा है. किंवदंतियां हैं कि मौर्यकाल में इस मेले की नींव पड़ी थी. उस वक्त से इस मेले मे व्यापार करने के लिए मध्य एशिया से लेकर मंगोलिया तक से पशु व्यापारी आते थे. उन्हीं व्यापारियों के जरिए पहली बार हिंदुस्तान में घोड़े पहुंचे थे. आज भी घोड़ों का मार्केट सोनपुर मेले की प्रमुख विशेषता है.

मेला क्षेत्र में मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले से आए गोपालक अर्जुन बेहद परेशान दिखे. उन्होंने कैच को बताया कि दिन-दिन भर उन्हें बैंक की कतारों में खड़ा रहना पड़ता है, जबकि शाम खरीदारों से भारी मोलभाव में बीत रही है.

सोनपुर मेले में व्यापार करने के लिए मध्य एशिया से लेकर मंगोलिया के व्यापारी आते थे

नोटबंदी ने 15 साल के इस किशोर को बुरी तरह उलझा कर रख दिया है. उन्हें खेलने-खाने-मेला घूमनेे का वक्त ही नहीं मिलता. अर्जुन के पिता सोहन लाल की हालत और चिंताएं इससे कहीं ज्यादा बड़ी और गंभीर हैं. उन्हें इस बात की चिंता सता रही है कि मवेशियों को दाना पानी का इंतजाम कैसे होगा, क्योंकि इस बार अब तक उनकी एक भी गाय या बछिया नहीं बिकी है.

सोहन लाल बीते 15 साल से अपने बेटों के साथ बिहार के इस ऐतिहासिक मेले में अपनी गायों का कारोबार करने के लिए आ रहे हैं. वो बताते हैं, 'इस बार धंधा कुछ ज्यादा ही मंदा है. इसकी सबसे बड़ी वजह नोटबंदी है. लोगों के पास पैसा ही नहीं बचा है.' वो आगे कहते हैं, 'बीते साल तो हमने पहले ही हफ्ते में 20 बाछियां (गाय के बच्चे) बेच दी थीं. दूसरे हफ्ते तक हम उज्जैन वापसी की तैयारी करने लगे थे. इस बार एक हफ्ता बीच चुका है लेकिन एक भी खरीददार नहीं आया है. जो भी आ रहा है 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोट के साथ आ रहा है. उनका तो कोई मोल ही नहीं है. लिहाजा एक भी बछियां बिकी नहीं है.'

सोहनलाल अपनी खीज कालाबाजारी करने वालों पर उतारते हैं, 'जिनके पास काला धन है, वे तो मजे में हैं. मुसीबत हम जैसे लोगों की हो गई है जिनके पास कोई काला धन तो नहीं है पर हमारे पैसे कागज हो चुके हैं.' अर्जुन बताता है कि वे लोग करीब 20,000 रुपया लेकर सोनपुर आए थे. अब सोहन लाल के सामने इन नोटों को बदलवाने का संकट आन पड़ा है.

अर्जुन अपने दूसरे भाई के साथ हर दिन अलग-अलग बैंकों की कतारों में खड़े हो जाते हैं. बाकी दो भाई गायों की देखभाल करते हैं.

नोटबंदी की मार मेलार्थी और दुकानदारों पर एक समान पड़ी है. इसकी वजह से मेले के ज्यादातर हिस्से में रौनक गायब है. छपरा के जीत राय कहते हैं, 'मैं हर साल औसतन एक दिन में 2-3 बकरियां बेच लेता था, लेकिन इस साल कोई खरीददार ही नहीं आ रहा है.'

नोटबंदी से पैदा हुए हालात में सोनपुर मेला जैसे पूरी तरह नगद लेन-देन पर आधारित अर्थव्यवस्था को भारी चोट पहुंचना लाजमी है. इस इलाके में बैंकिंग व्यवस्था कोई बहुत सुदृढ़ नहीं है. इलाके में कुल 4 बैंक हैं, लेकिन एक या दो बैंक में ही रोजाना पैसा आता है. देर-सबेरे आने वाले पैसे का वितरण भी इतना देर से होता है कि लोग दिन-दिन भर लाइन में लगे रहते हैं इसके बाद खाली हाथ वापस लौट जाते हैं. राय पूछते हैं, 'लोग बैंकों की कतार में खड़े रहते हैं, ऐसे में कारोबार कैसे होगा?'

सोनपुर का मेला इस मामले में ऐतिहासिक है कि यहां हाथी से लेकर तोता-मैना तक की खरीद-फरोख्त होती है. मंदा पड़ चुके धंधे की कहानी सिर्फ गाय बाजार या बकरी बाजार की ही नहीं है. चिड़िया बाजार में भी मंदी का आलम पसरा हुआ है. यहां तोता और मैना की बिक्री एकदम ठप्प पड़ गई है.

जाहिर है दाल-रोटी के संकट के सामने तोता-मैना किसी की प्राथमिकता हो ही नही सकते. यहां मौजूद एक दुकानदार सोनू ने बताया, 'बीते साल एक तोते का भाव 300-400 रुपये के बीच था, लेकिन इस बार 200-250 रुपये के बीच तोता बिक रहा है. इसके बावजूद ग्राहक इन्हें तरजीह नहीं दे रहे हैं. गांवों में इस वक्त पैसा है ही नहीं. यहां आएगा कौन?'

चिड़िया बाजार में फिलवक्त करीब 50 दुकानदार अपनी दुकानें लगा चुके हैं. जबकि मेला आयोजकों के मुताबिक 25-30 दुकानदारों ने अपनी बुकिंग रद्द करवा दी है.

हालांकि, घोड़ों के बाजार में रौनक कायम है. अच्छी खासी संख्या में लोग घोड़े खरीदने के लिए आ रहे हैं. इस उलटबांसी ने रिपोर्टर के मन में सवाल पैदा किया कि जब हर ओर मंदी का माहौल है तब घोड़े कैसे दौड़ रहे हैं. इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने पर जो बात सामने आई उसका लेना देना नोटबंदी या मंदी से नहीं बल्कि बिहार की सामाजिक संरचना और उसमें गहराई तक जड़ जमाए बैठी सामंती मानसिकता से है.

घोड़ा विक्रेताओं के मुताबिक बिहार में आज भी जमीदारों, भूमिहारों में दरवाजे पर घोड़ा बांधने, घोड़ा से चलने की परंपरा कायम है. यह सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है. बिहार के बदनाम माफिया अनंत सिंह के बारे में मशहूर है कि वो अपने क्षेत्र में घोड़े पर बैठकर सैर करने निकलते हैं. घोड़ों का संबंध सामाजिक हैसियत, उसके रौब-दाब और दबंगता से है. लिहजा घोड़ों का कारोबार कमोबेश चल रहा है.

घोड़ा विक्रेताओं के मुताबिक अब तक यहां 40-50 घोड़ों का कारोबार हो चुका है, जबकि बीते साल तक पहले हफ्ते 10-15 ही घोड़े बिके थे. सीवान के घोड़ा विक्रेता नंद कुमार अब अपना बोरिया बिस्तर समेट रहे हैं. उनके मुताबिक वह इस बार 6 घोड़े लेकर आए थे और सभी बिक चुके हैं. यह पूछे जाने पर कितनी कमाई हुई, वह सिर्फ मुस्कुरा देते हैं. वैसे, उनके पड़ोसी विक्रेता सुरेंद्र के मुताबिक नंद कुमार को 10-12 लाख रुपये तक की कमाई हुई है.

लेकिन मेले में घोड़ा अपवाद है.  इस मेले की एक बड़ी पहचान यहां के थियेटर भी हैं. ये थिएटर अक्सर अपनी अश्लीलता के लिए जाने जाते हैं. लौंडा नाच से लेकर बार बालाओं के अश्लील नृत्य यहां दिखाए जाते रहे हैं. इन्हें देखने के लिए यहां बड़ी तादाद में भीड़ जुटती थी. लेकिन नोटबंदी की मार इन पर भी पड़ी है.

विकास गुलाब थियेटर की टिकट खिड़की घर पर मौजूद मंटू ने बताया, 'इस बार लोग खुदरा पैसा बचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. हमारे ऊपर दोहरी मार पड़ी है. शराबबंदी ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है. इससे हमें नुकसान हो रहा है. इस बार पुलिस की खास नजर हमारे जैसे थियेटरों पर कड़ी हो गई है. इसलिए लोग यहां आने से कतरा रहे हैं.'

समय बदलने के साथ ही यह प्राचीन पारंपरिक मेला टीवी, फ्रिज, मोबाइल और वाशिंग मशीन जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के छोटे-मोटे बाजार के रूप में भी उभरा है. कंपनियां और उनके विक्रेता इस मेले में अपनी खास योजनाएं और छूट के साथ अपने स्टाल लगाते हैं, ताकि बिक्री बढ़ सके. लेकिन इस बार होम अप्लायंस बनाने वली ज्यादातर कंपनियों ने अपने स्टाल नहीं लगाएं हैं.

सोनपुर मेले से जु़ड़ी एक कहानी है. अतीत में अक्सर जब इस मेले के ऊपर किसी तरह का संकट आया है तब उस दौर के राजे-रजवाड़ों ने इसे सहारा देकर इसकी अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाए रखने में योगदान दिया है. इस तरह की कहानियां हैं चंद्रगुप्त मौर्य ने एक बार इस मेले से 500 घोड़े खरीदे थेे. इसी तरह मुगल बादशाह औरंगजेब ने एक बार मेला पर छाए संकट को दूर करने के लिए यहां से दुर्लभ नस्ल वाले सफेद हाथी खरीद कर उन्हें शाही सेना में शामिल किया था.यह अजीब विडंबना है कि इस बार बादशाह ने ही इस मेले की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है.

First published: 21 November 2016, 7:45 IST
 
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