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नीतीश का हार्दिक प्रेमः चाल एक और कई निशाने

एन कुमार | Updated on: 16 December 2016, 7:41 IST
(प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया )

कोर्ट के आदेश पर अपने सूबे से दर-बदर चल रहे गुजराती नेता हार्दिक पटेल ने पटना में नीतीश कुमार से मुलाक़ात की है. उन्होंने अगले महीने गुजरात में उनकी अगुवाई में होने वाले किसान सम्मेलन के लिए न्योता दिया जिसे नीतीश कुमार ने स्वीकार कर लिया.

नीतीश कुमार के आवास पर हार्दिक करीब एक घंटा रुके. यहां उन्होंने दोपहर का खाना नीतीश के साथ खाया, फिर पटेल नवनिर्माण सेना को बिहार में भी गठित करने की औपचारिक बैठक कर वापस चले गए. 

उनके जाने के बाद से अटकलें तेज़ हो गई हैं कि हार्दिक पटेल अगर पटना आये थे तो राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बजाय नीतीश कुमार से क्यों मिले? वजह यह है कि हार्दिक और लालू की राजनीति कमोबेश एक जैसी है. दोनों आरक्षण के पैरोकार हैं और मोदी के कट्टर विरोधी. इस मोर्चे पर लालू की बजाय नीतीश कमज़ोर हैं, बावजूद इसके उन्होंने मुलाक़ात उन्हीं से की. 

बिहार की राजनीति में नीतीश-हार्दिक भेंट को जातीय चश्मे से देखा जा रहा है. पत्रकार बिरेंद्र कुमार यादव कहते हैं, 'यह नीतीश कुमार का कुरमी प्रेम है.'

वहीं नौकरशाही के संपादक इर्शादुल हक कहते हैं कि हार्दिक से मुलाक़ात कर नीतीश कुमार अपनी गलतियों की भरपाई की कोशिश कर रहे हैं. बकौल इर्शादुल, 'नोटबंदी अभियान का समर्थन करने से नीतीश को काफी फजीहतों का सामना करना पड़ रहा है. ममता बनर्जी जैसी नेता उन्हें पटना में आकर परोक्ष तौर पर गद्दार कहकर चली गयीं.'

उन्होंने आगे कहा, 'नोटबंदी के समर्थन से संदेश यह गया कि नीतीश कुमार भाजपा के करीब जाने की कोशिश कर रहे हैं. मगर हार्दिक से मुलाक़ात कर उन्होंने ऐसी तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया था. इस मुलाक़ात से संदेश यह गया है कि वे मोदी के विरोधी हैं और एक एंटी मोदी ब्रांड के साथ खड़े हैं'. 

नीतीश के इस नए दांव पर राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर एस नारायण कहते हैं, 'वह एक रहस्यमयी नेता हैं. कब क्या करेंगे और कौन-सा रास्ता अपनायेंगे, यह कोई नहीं जानता. नीतीश कुमार बिहार में राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के 15 सालों तक सीएम रहने का रिकॉर्ड तोड़ चुके हैं. अब वह अपने बचे हुए राजनीतिक जीवन का राष्ट्रीय राजनीति में उभार चाहते हैं.'

'आप' की चुनौती

मोदी विरोधी राजनीति के मुखर नेताओं में फिलहाल अरविंद केजरीवाल और नीतीश का नाम आगे आता है. केजरीवाल रणनीतिक तौर पर नीतीश से कम नहीं पड़ते. वह दिल्ली के बाद अब पंजाब, गोवा, गुजरात में भी आम आदमी पार्टी को फैलाने में लगे हुए हैं. इसके लिए केजरीवाल हार्दिक पर भी डोरे डाल चुके हैं. नीतीश के लिए आप का यह उभार एक किस्म की चिंता है. 

हार्दिक ने जब केजरीवाल में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखायी और यह तय किया कि किसान सम्मेलन में नीतीश, देवगौड़ा और ममता बनर्जी जैसे नेताओं को बुलायेंगे तो नीतीश ने हार्दिक प्रेम दिखाना शुरू कर दिया. 

कास्ट फैक्टर

हार्दिक गुजरात में कुरमी जाति को ही एकजुट कर अपने सियासी कैरियर को आगे बढ़ाना चाहते हैं. नीतीश कुमार भी कुरमी नेता के तौर पर जाने जाते हैं. लिहाज़ा, हार्दिक और नीतीश के साथ होने से दोनों को फायदा नज़र आ रहा है. 

प्रो नारायण कहते हैं, 'बिहार की राजनीति में यह मशहूर है कि नीतीश के दिमाग में क्या चल रहा होता है, यह सिर्फ वही जान रहे होते हैं, उनके सहयोगियों को भी भनक नहीं लगती. वे ऐसे प्रयोग करते रहते हैं और मौक़ो को भुनाने में उस्ताद नेता माने जाते हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी रैली में उन्होंने केजरीवाल को बुलाकर अपने पक्ष में हवा बनाने की कोशिश की. जेएनयू छात्र नेता कन्हैया कुमार जब चर्चित हुए तो उन्हें भी बुलाकर पटना में एक बड़ा सम्मेलन करवा दिया और अब हार्दिक में संभावनाओं के द्वार देख रहे हैं.'

First published: 16 December 2016, 7:41 IST
 
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