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क्या 'सुशासन बाबू' नीतीश कुमार कभी नंबर वन बन पाएंगे

जुगनू शारदेय | Updated on: 28 July 2017, 18:39 IST

कछुए की चाल चलने वाले नीतीश कुमार ने पहली बार खरगोश की चाल चली है. विधानसभा में बहुमत मिलना तो बस औपचारिकता भर थी. सवाल यह है कि नीतीश कुमार क्या कभी नंबर वन बन पाएंगे.

सच तो यह है कि नीतीश कुमार को राजनीतिक पृष्ठभूमि में रहने की आदत सी हो गई थी. कुछ आर्दश उन्हें अपने पिता से मिला था, कुछ राम मनोहर लोहिया से और कुछ चंद्रशेखर जी से. राजनीति में कुटिलता नीतीश कुमार को अनेक लोगों ने सिखाई और ज्यादातर उनके तथाकथित बड़े भाई लालू प्रसाद ने.

राजनीति में सर्वाइवल का गुण उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव से सीखा. कहने को तो वह भी गंगा किनारे के छोरे हैं और गंगा ने उनको बहना भी सिखाया. पर तथाकथित सेक्युलर लोगों से वह इस मामले में अलग हट कर हैं कि वह मुस्लिम तुष्टिकरण में विश्वास नहीं करते थे, पर वह तुष्टिकण भी करने लगे क्योंकि उन्होंने अतिपिछड़ा को खड़ा किया. यह काम उन्होंने कर्पूरी ठाकुर से सीखा.

दिल्ली की राजनीति में आने के साथ उन्होंने वह सब सीख लिया कि इमेेज कैसे बनाई जाती है. शायद इसमें उनकी मदद अरुण जेटली ने की. यह सच है कि नीतीश कुमार कोई दूध के धुले नहीं हैं पर अपनी पार्टी के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है. पर वह फाइल नहीं बेचते, पर ऐसी नीति बनाने में विश्वास रखते हैं कि कुछ न कुछ हो जाए.

उनके सामने आरंभ से ही यह संकट या हीनभावना रही कि वह नंबर वन नहीं बन पाते थे. लालू-सुशील जब पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव लड़ रहे थे तब नीतीश कुमार पटना इंजीनियरिंग कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष थे.

अंदर के आर्दश के कारण वह 1977 और 1980 में विधानसभा चुनाव हार चुके थे पर 1985 में लोकदल से जीते. पहली बार देवी लाल ने उन्हें बिहार लोकदल की युवा शाखा का अध्यक्ष बनाया था. तबसे शायद नंबर वन बनने की इच्छा मन में जगी होगी पर बन न पाए.

1989 में जब लोकसभा में आए और साल भर बाद बीपी सिंह मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री बने तो काम नंबर वन करते थे, पर मंत्री तो देवी लाल ही थे. तभी उन्होंने जाना और समझा कि अफसर बड़ा पढ़ा लिखा होता है. आदत लग गई फाइल पढ़ने की और नियम कायदा कानून समझने की और उसको कैसे तोड़ा जाए इसकी भी.

बिहार के मामले में जॉर्ज की समता पार्टी में वह लगभग नंबर वन ही थे पर जार्ज ने उनको एकाधिकारवादी भी बना दिया. बाद में शरद यादव ने भी इस एकाधिकारवादी बनने में उनकी मदद की. नीतीश कुमार को यह पता था कि जाति यानी अपनी जाति के बल पर वह लालू जैसे नेता नहीं बन सकते तो उन्होने जात की नहीं जमात की बात की.

2004 के लोकसभा चुनाव में उनको लगा कि हार का कारण नरेंद्र मोदी का गोधरा है, तब से उन्होंने नरेंद्र मोदी और इस प्रकार के मुस्लिम विरोधी नेताओं का चुनाव में आना ही बंद करा दिया था. 2005 तक नरेंद्र मोदी भी इतने बड़े नेता नहीं बने थे. वह तो 2009 मे लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व वाली भाजपा के हार के बाद बने.

2005 के नवंबर में वह बिहार के मुख्यमंत्री हो गए. भाजपा साझीदार थी पर चलती नीतीश कुमार की ही थी. फिर भाजपा ने सोचा कि एक प्रयोग किया जाए. पटना में उनकी कार्य़कारणी की बैठक में किसी चुनाव के मंच पर नरेंद्र-नीतीश का हाथ मिलाते हुए और बिहार को अपमानित करने वाली तस्वीर छापी.

नीतीश कुमार ने इसका विरोध किया. वह यह समझते रहे कि नरेंद्र मोदी केवल एक अमीर राज्य के मुख्यमंत्री भर हैं. उन्हें यह कभी नहीं लगा कि भाजपा एक पिछड़ा को नेता मान कर राष्ट्रीय नेता बना देगी. वह भी लालकृष्ण सिंड्रोम के शिकार रहे और जब नरेंद्र मोदी ने उनकी सोमनाथ से रथ यात्रा में मदद नहीं की तो जय प्रकाश नारायण के गांव बिहार के सिताबदियारा से वह यात्रा शुरु हुई.

अब भाजपा और नीतीश कुमार में ठन गई. इसका नतीजा निकला 2013 के महाराजगंज लोक सभा उपचुनाव में. वहां लालू के कट्टर विरोधी लालू की पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे, नीतीश का भी उम्मीदवार था पर भाजपा की स्थानीय मदद न मिलने की वजह से हार गया.

नीतीश कुमार को एहसास हुआ कि उनके जदयू का संगठन नहीं है पर उनकी लोकप्रियता के बल पर उनके उम्मीदवार को हार के बावजूद सम्मानजनक वोट मिले. उसी के बाद उनका भाजपा से 1996 से चल रहा गठजोड़ टूट गया.

...अब फिर से वे ऐसे नंबर वन हैं जो देश के नंबर वन से कभी भी बात कर सकते हैं

बिहार का नंबर वन तरह-तरह के गठजोड़ के बल पर सरकार चलाता रहा. अपनी लोकप्रियता के घमंड में अनेक लोगों की राय कि वह नरेंद्र मोदी को कम कर के न आंके, नरेंद्र मोदी के झूठझोला को समझ न पाए. 2014 में लोकसभा का चुनाव बिना किसी गठबंधन के हुआ हुआ तो पिट गए. तब संत बनने के लिए जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. अब वह एक राज्य के भी नंबर वन न रहे.

साल भर बाद जीतन राम मांझी को हटाने के लिए फिर लालू की मदद मांगी और फिर से नंबर वन हो गए. राजद-जदयू-कांग्रेस के महागठबंधन के सामने 2015 के बिहार विधानसभा मे नरेंद्र मोदी का झूठझोला न चला. बिहार में तथाकथित महागठबंधन की सरकार भी बन गई.

अब शुरू हुआ नीतीशीय दांव पेंच जो शराबबंदी से लेकर हर बात पर अपनी चलाता था. इसमें कांग्रेस की सोनिया-राहुल का भी कम योगदान नहीं था. वह नंबर वन से हमेशा बात भी नहीं करती थीं, जबकि भाजपा के नंबर एक नीतीश कुमार को वह सम्मान देने लगे.

फिर वही पुराना खेल, जैसे चारा घोटाला में लालू फंस कर रह गए वैसे ही कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के सहयोग से सुशील कुमार मोदी भ्रष्टाचार विरोधी नेता बन गए. इस बार करीब-करीब लालू परिवार ही सामने था. उनके मंत्री पुत्र तेजस्वी यादव सामने थे.

भाजपा के लोगों के समान नीतीश उन्हें बर्खास्त नहीं कर सकते थे. भाजपा से समर्थन और सम्मान का भरोसा हो गया कि नीतीश खरगोश हो गए और भैंस अपना कीचड धोने के लिए पानी में नहाती रही. अब फिर से वे ऐसे नंबर वन हैं जो देश के नंबर वन से कभी भी बात कर सकते हैं.

First published: 28 July 2017, 18:34 IST
 
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