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Review of Reviews: बेहतरीन संगीत के साथ बेनूर कहानी है सोनाक्षी की 'नूर'

कैच ब्यूरो | Updated on: 21 April 2017, 13:36 IST

सोनाक्षी सिन्हा अपने अब तक के करियर में अलग-अलग तरह के रोल कर चुकी हैं. दंबग की में इंटेलिजेंट और शरीफ रज्जो अकीरा और फोर्स-2 में जबर्दस्त एक्शन करती नजर आई थीं. इस बार सोनाक्षी अपनी नई फिल्म नूर में एक जर्नलिस्ट बनकर आ रही हैं. इस बार वह लोगों से पूछताछ करती और खबरों के पीछे भागती नजर आने वाली हैं. सोनाक्षी की यह फिल्म 21 अप्रैल को रिलीज हो रही है.

आजतक: 
साल 2014 में पाकिस्तानी जर्नलिस्ट-राइटर सबा सैयद ने 'कराची यू आर कीलिंग मीं' नामक नॉवेल लिखा जो की बेस्टसेलर के रूप में भी सबके सामने आया. नॉवेल में कहानी 20 साल की जर्नलिस्ट आयशा की थी, जिसे 'नूर' फिल्म के जरिए सामने लाया गया है.

फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी कहानी है जो काफी बोरिंग है और बहुत ही धीरे धीरे चलती है , इसकी रफ़्तार तेज की जा सकती थी और साथ ही जिस नॉवेल पर आधारित यह फिल्म है उसमें कई सारे उतार चढ़ाव और थ्रिलिंग एलिमेंट्स होते हैं पर फिल्म को कोई और ही रूप दे दिया गया है जिसकी वजह से काफी फीकी फीकी सी कहानी बन गयी. कोई भी किरदार न्यायसंगत सा नजर नहीं आता और कई जगहों पर काफी खींची खींची कहानी लगती है.

एनडीटीवी: 
नूर की सबसे बड़ी ख़ूबी है फ़िल्म का विषय और संदेश जो ये कहता है कि किसी भी पत्रकार को पत्रकार होने के साथ-साथ इंसान होना भी ज़रूरी है और नाम और शौहरत कमाने के चक्कर में उसे इंसानियत का फ़र्ज नहीं भूलना चाहिए. ये फ़िल्म पत्रकारिता जगत के कुछ अनछुए पहलुओं को छूती है. इस फ़िल्म में एक और चीज़ जो तारीफ़ के क़ाबिल है वो है सोनाक्षी का अभिनय. एक बेपरवाह-बेबाक़ लड़की के किरदार को सोनाक्षी ने बखूबी निभाया है.

सबसे बड़ी इसकी ख़ामी है इसका स्क्रीनप्ले जो काफ़ी बिखरा हुआ है. फ़िल्म की शुरुआत का ज़्यादातर हिस्सा मोनोलॉग के ज़रिए सामने आता है, यानी नूर काफ़ी देर तक अपने किरदार के बारे में बताती रहती है जो कि लंबा और उबाऊ लगने लगता है. फ़िल्म काफ़ी देर तक मोमेंट्स के ज़रिए आगे बढ़ती है जिसकी वजह से कहानी धीमी पड़ जाती है और फ़िल्म का मुख्य विषय काफ़ी देर बाद सामने आता है.

बाॅलीवुड भास्कर : 
फिल्म का डायरेक्शन, लोकेशंस और कैमरा वर्क कमाल का है, डायरेक्टर ने शूट भी काफी अच्छा किया है. सिनेमैटोग्राफी बढ़िया है. वैसे, फिल्म की कहानी प्रसिद्ध नावेल पर आधारित है, लेकिन देखते वक्त काफी कमजोर लगती है. कहानी को और भी ज्यादा मजबूत और दिलचस्प बनाने की सख्त जरूरत थी. डायलॉग्स बढ़िया है पर कहानी देखते हुए एक वक्त के बाद बोरियत महसूस होने लगती है और मन में सवाल आता है की आखिर कब खत्म होगी ये फिल्म! फिल्म का क्लाइमेक्स तो और भी कमजोर है.

जर्नलिस्ट की जिंदगी पर और भी रिसर्च की जाती तो कहानी और भी दिलचस्प बनाई जा सकती थी. सोनाक्षी सिन्हा ने काफी अच्छी परफॉर्मेंस दी है, जिसमें फ्री फ्लो साफ नजर आता है. साथ ही कनन गिल, शिबानी दांडेकर, मनीष चौधरी, पूरब कोहली का काम सहज है. मराठी एक्ट्रेस स्मिता ताम्बे ने 'मालती' का किरदार बहुत ही उम्दा निभाया है. 

First published: 21 April 2017, 13:08 IST
 
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