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72 घंटे तक बॉर्डर पर अकेले लड़ता रहा ये जांबाज और मारे थे 300 चीनी सैनिक, देशभक्ति से लबरेज फिल्म हो रही है आज रिलीज

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 January 2019, 12:27 IST

सरहद की हिफाजत करते हुए शहीद हुए जांबाज योद्धा जसवंत सिंह रावत को आज भी कोई नहीं भूला है और आज भी कहा जाता है कि वो अपनी सीमा पर तैनात होकर देश की रक्षा कर रहे हैं. इस महावीर वीर योद्धा पर बनी फिल्म '72 आवर्स: मारटायर हू नेवर डायड' आज रिलीज हो रही है. फिल्म की कहानी शहीद जसवंत सिंह रावत के उन 72 घंटो पर आधारित होगी. जब उन्होंने 1962 के युद्ध में चीन की विशाल सेना से अकेले लोहा लिया था और 300 से ज्यादा दुश्मन के सैनियों को मार गिराया था.

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फिल्म '72 आवर्स: मारटायर हू नेवर डायड' की लगभग शूटिंग उत्तराखंड में की गई है और फिल्म का टीजर सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड कर रहा हैं. ये फिल्म 1962 युद्ध में अमर हुए जसवंत सिंह रावत की कहानी है जिसकी वीरता को दुश्मन देश ने भी सम्मान दिया. इस फिल्म में आपको 1962 में भारत और चीन युद्ध की गौरवगाथा देखने को मिलेगी.

इस फिल्म का डायरेक्शन अविनाश ध्यानी ने किया है और उन्होंने ही फिल्म में जसवंत सिंह का रोल भी अदा किया है. इस फिल्म की शूटिंग चकराता, गंगोत्री, हर्सिल और हरियाणा के रेवाड़ी में की गई है. अविनाश ने इस फिल्म को लेकर कहा,"ये फिल्म एक ऐसे योद्धा की कहानी है जिसने अकेले 72 घंटो कर दुश्मन के सोनिकों को रोक के रखा था." फिल्म की कहानी अविनाश ने लिखी है और इसका प्रोडक्शन जेएसआर के बैनर तले किया गया है.

 

बता दें कि भारत-चीन युद्ध के दौरान जसवंत सिंह की 4वीं गढ़वाल रेजीमेंट में तवांग जिले के नूरांग पोस्ट पर तैनात थे और चीन से हर मोर्चे पर भारत कमजोर पड़ रहा था. नूरांग पोस्ट पर तैनात जसवंत सिंह की बटालिन को पीछे हटने का आदेश मिला लेकिन जसवंत अपने दो साथियों के साथ पोस्ट पर ही रुक गए. तीनों ने चीनी सैनिकों के एक बंकर पर हमला कर उनकी मशीन गन छीन ली. जसवंत सिंह ने जब देखा कि चीन की पूरी डिवीजन ने हमला कर दिया है उन्होंने अपने साथियों को वहां से चले जाने के लिए कहा और अकेले ही 72 घंटों तक अलग-अलग जगह से दुश्मन पर गोलियां चलाते रहे. इस लड़ाई में जसवंत सिंह का साथ सैला और नूरा नाम की दो स्थानीय युवतियां दे रही थीं.

 

जिस स्थान पर शहीद जसवंत सिंह शहीद हुए थे वहां पर उनके नाम पर एक भव्य मंदिर बनाया गया है और पूरे इलाके का नाम जसवंतगढ़ के नाम से जाना जाता है. सेना की एक टुकड़ी वहां 12 महीने तैनात रहती है जो कि हर वक्त उनके खाने, कपड़े और सोने का प्रबंध करती है. हर साल 17 नवंबर को वहां पर एक खास प्रोग्राम किया जाता है.

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First published: 18 January 2019, 12:10 IST
 
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