Home » बॉलीवुड » Actress Swara Bhaskar slams Sanjay Leela Bhansali in scathing open letter against deepika padukone film Padmaavat says I Felt Reduced to a V
 

'पद्मावत' पर भड़की इस एक्ट्रेस ने भंसाली से क्यों कहा, 'वजाइना के बाहर भी एक जिंदगी है'

आदित्य साहू | Updated on: 28 January 2018, 12:46 IST
 
महिलाओं की इज्जत वजाइना से शुरू होती है वजाइना पर खत्म? इसका दर्द एक महिला होकर स्वरा भास्कर को ही महसूस हो सकता है. हमारे समाज ने शुरुआत से ही महिलाओं की इज्जत को वजाइना से जोड़ दिया है.
 
फिल्में समाज का आइना होती हैं. लेकिन हमारी फिल्मों में भी ज्यादातर यही दिखाया जाता रहा है कि अगर किसी लड़की का रेप हो गया तो उसकी इज्जत चली गई. अब वह जीने का हकदार नहीं. अब उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए. यही सब फिल्में देखकर हम बड़े हुए हैं. हमें परोसा ही यही गया है कि इससे ज्यादा हम सोच न पाएं.

21वीं सदी में बनाई पद्मावत में भी भंसाली ने यही दिखाने की कोशिश की.

स्वरा की भंसाली से नाराजगी इस बात को लेकर है जो उन्होंने फिल्म में महिलाओं को 'वजाइना' के तौर पर सीमित कर दिया है. दरअसल, फिल्म के आखिर में रानी पद्मावती खुद को इज्जत की रक्षा के लिए जला लेती हैं. जिसे लेकर स्वरा भास्कर ने उनको ओपन लेटर लिखा है.. पढ़िए-

‘सर, महिलाओं को रेप का शिकार होने के अलावा जिंदा रहने का भी हक है.

पुरुष का मतलब आप जो भी समझते हों- पति, रक्षक, मालिक, महिलाओं की सेक्शुअलिटी तय करने वाले, उनकी मौत के बावजूद महिलाओं को जीवित रहने का हक है. महिलाएं चलती-फिरती वजाइना नहीं हैं. हां महिलाओं के पास यह अंग होता है लेकिन उनके पास और भी बहुत कुछ है. इसलिए लोगों की पूरी जिंदगी वजाइना पर केंद्रित, इस पर नियंत्रण करते हुए, इसकी हिफाजत करते हुए, इसकी पवित्रता बरकरार रखते हुए नहीं बीतनी चाहिए.

वजाइना के बाहर भी एक जिंदगी है. बलात्कार के बाद भी एक जिंदगी है. भंसाली की फिल्म ऑनर किलिंग, जौहर, सती जैसी कुप्रथाओं को महिमांडित करती है. यह फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और सती और जौहर आदि कुप्रथाएं हमारे समाज का ही हिस्सा रही हैं. फिल्म की शुरुआत में सती-जौहर प्रथा के खिलाफ डिस्क्लेमर दिखा कर निंदा कर देने भर का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इसके आगे तीन घंटे तक राजपूत आन-बान-शान का महिमंडन चलता है.'

वजाइना के बाहर भी एक जिंदगी है. बलात्कार के बाद भी एक जिंदगी है. भंसाली की फिल्म ऑनर किलिंग, जौहर, सती जैसी कुप्रथाओं को महिमांडित करती है. यह फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और सती और जौहर आदि कुप्रथाएं हमारे समाज का ही हिस्सा रही हैं. फिल्म की शुरुआत में सती-जौहर प्रथा के खिलाफ डिस्क्लेमर दिखा कर निंदा कर देने भर का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इसके आगे तीन घंटे तक राजपूत आन-बान-शान का महिमंडन चलता है.'

First published: 28 January 2018, 12:46 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी