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राज कपूर के स्पॉटब्वॉय से शोमैन बनने तक का पूरा सफ़र

कैच ब्यूरो | Updated on: 14 December 2016, 16:08 IST
(एजेंसी)

हिंदी सिनेमा के पहले शोमैन राजकपूर का जन्म 14 दिसंबर 1924 को अविभाजित भारत के पेशावर में हुआ था. पेशावर आज पाकिस्तान का हिस्सा है.

रंगमंच और फिल्मों के जानेमाने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर जन्मे राज कपूर अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे. उन्होंने अपने जीवन में तीन राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड्स और ग्यारह फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किए.

राजकपूर की माता का नाम रामसरणी देवी था. हिंदी सिनेमा में कपूर खानदान की शुरुआत पृथ्वीराज कपूर से हुई और आज की तारीख में कपूर खानदान हिंदी सिनेमा में सबसे बड़ा फ़िल्मी खानदान है.

राज कपूर ने 17 साल की उम्र में रंजीत मूवीकॉम और बांबे टॉकीज फिल्म प्रोडक्शन कंपनी में स्पॉटब्वॉय का काम शुरू किया.

पृथ्वीराज कपूर ने राज कपूर से कहा कि राजू नीचे से शुरुआत करोगे तो एक दिन जरूर अव्वल दर्जे तक पहुंचोगे.

पृथ्वीराज कपूर के सबसे बड़े बेटे

राज कपूर पृथ्वीराज कपूर के सबसे बड़े लड़के थे. उनके शम्मी कपूर और शशि कपूर ने अभिनय की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई.

देश विभाजन के बाद राजकपूर का परिवार भारत आ गया और 1930 में देहरादून से अपनी प्रारभिक शिक्षा प्राप्त की. राजकपूर ने अपने पिता पृथ्वीराज कपूर से बचपन में पश्तो भाषा भी सीखी थी.

राजकपूर बचपन से ही स्कूल के बात अपना अधिकतर समय अपने पिताजी के साथ बिताते थे, वो फिल्मों में क्लेपर ब्वॉय या ट्रोली पुलर का काम किया करते थे.

राजकपूर ने केदार शर्मा के साथ सहायक के रूप में भी काम किया था. इसके अलावा बॉम्बे टॉकीज की कई फिल्मों में राजकपूर ने बतौर सहायक निर्देशक भी काम किया. वो पिता के पृथ्वी थिएटर और बॉम्बे टॉकीज दोनों के लिए साथ में काम करते थे.

पृथ्वीराज कपूर अपने पुत्र राज कपूर को बतौर सहायक की तनखाह के रूप में 201 रुपये महीना दिया करते थे.

'नीलकमल' में ऐसे मिला लीड रोल

राज कपूर को अपनी पहली फिल्म में लीड रोल मिलने के पीछे एक कहानी है. राज कपूर उन दिनों केदार शर्मा के लिए क्लैपर ब्वॉय का काम किया करते थे और केदार शर्मा “विष कन्या” फिल्म बना रहे थे.

बताया जाता है कि एक दिन शाम को इस फिल्म के दृश्य को फिल्माना था लेकिन राजकपूर को वहां पहुंचने में देरी हो गयी. उस समय उनकी आदत थी वो थिएटर में जाते ही पहले कांच में खुद को देखते थे फिर बालों को संवारते थे.

उस दिन राज कपूर की इस हरकत पर देरी हो जाने की वजह से केदार शर्मा ने गुस्सा में उन्हें थप्पड़ मार दिया. इस पर राजकपूर ने न तो कोई प्रतिक्रिया दी और न ही एक शब्द कहा.

केदार शर्मा को अपने इस काम पर बहुत बुरा लगा और अगली सुबह वो राजकपूर के पास गये और उन्हें अपनी अगली फिल्म “नीलकमल ” में हीरो का रोल देने का वादा किया. शर्मा ने राजकपूर को जब हीरो के रोल का ऑफर दिया तो वो खूब रोये.

पहली अभिनेत्री मधुबाला

राजकपूर ने 1947 में केदार शर्मा की “नील कमल” बतौर हीरो अभिनय किया जिसमें उनकी हिरोइन मधुबाला थीं.

इसके बाद सन 1948 में राजकपूर ने अपना खुद का स्टूडियो आरके स्टूडियो की स्थापना की. आरके फिल्म्स के बैनर तले उन्होंने अपनी पहली फिल्म "आग" बनाई और उसके साथ ही कपूर उस दौर के सबसे कम उम्र के फिल्म निर्देशक बन गये.

वो इस फिल्म में निर्माता और निर्देशन के साथ-साथ मुख्य अभिनेता भी थे. इस फिल्म में उनके नर्गिस, कामिनी कौशल और प्रेमनाथ भी थे. ये फिल्म काफी सफल रही.

इसके बाद 1949 में उन्होंने महबूब खान की फिल्म "अंदाज" में काम किया था जो बतौर अभिनेता उनकी पहली सफल फिल्म थी.

इसी साल के अंत में उन्होंने बतौर निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के रूप में अपनी पहली सफल फिल्म "बरसात" रिलीज की. आरके बैनर की पहली सफल फिल्म "बरसात" के बाद राजकपूर ने 50 के दशक में हिंदी सिनेमा को कई हिट फिल्में दी.

'आवारा' से छा गए राज कपूर

50 के दशक में उन्होंने आरके फिल्म्स की धमाकेदार फिल्म “आवारा” बनाई. इस फिल्म में भी राज ने निर्माता और निर्देशन के साथ-साथ मुख्य हीरो की भूमिका भी निभाई.

इस फिल्म में पहली बार असली बाप -बेटे की जोड़ी के रूप में पृथ्वीराज कपूर और राजकपूर नजर आये. उनके पिता के अलावा इस फिल्म में बाल कलाकार के रूप में उनके छोटे भाई शशि कपूर ने भी काम किया था. इस फिल्म में राजकपूर के साथ नर्गिस एक बार फिर रोमांटिक जोड़ी के रूप में नजर आये.

फिल्म "आवारा" ने राजकपूर को न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में स्टार बना दिया. रूस, तुर्की, अफ़ग़ानिस्तान और चीन में लोगों की जुबान पर गीतकार शैलेंद्र का लिखा और मुकेश के द्वारा गाया गया “आवारा हूं” गाना छा गया था.

उस समय से रूस के लोग भारत में दो ही व्यक्तियों के नाम जानते थे, पहला पंडित जवाहरलाल नेहरु और दूसरा राजकपूर का.

इस फिल्म की सफलता के बाद जब उन्होंने विदेश का दौरा किया तो लाखों लोगों की भीड़ उनको देखने के लिए जमा हो गयी.

इस फिल्म से राजकपूर और नर्गिस की रोमांटिक जोड़ी के अलावा मुकेश की आवाज को भी प्रसिद्ध कर दिया. इस तरह फिल्म "आवारा" उस समय की सबसे सफल फिल्मों से एक थी.

फिल्म "आवारा" की अपार सफलता के तीन साल बाद 1953 में फिर आरके बैनर के तले राजकपूर ने अपनी फिल्म “आह ” बनाई. राजकपूर ने यह फिल्म भी नर्गिस के साथ की. ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उतना कमाल नहीं कर पाई.

नरगिस के साथ लव अफेयर

1954 में उन्होंने सामाजिक सरोकार पर आधारित फिल्म “बूट पॉलिश” बनाई. ये आरके बैनर की पहली फिल्म थी, जिसमें राजकपूर लीड हीरो के रूप में नजर नहीं आये थे. इस फिल्म ने भी फिल्मफेयर अवार्ड जीता था.

1955 में राजकपूर एक ओर हिट फिल्म “श्री 420 ” लेकर आये, जिसमें उन्होंने “”भारतीय चार्ली चैपलिन ” की छवि को हिंदी सिनेमा पर उतारा. इस फिल्म में मुकेश द्वारा गाये जाना वाला गीत “मेरा जूता है जापानी ” स्वतंत्र भारत के लिए एक देशभक्ति गीत के रूप में उभरा था.

1956 में एक बार फिर राजकपूर ने सामाजिक सरोकार पर आधारित फिल्म “जागते रहो ” बनाई. इस फिल्म की शूटिंग केवल रात को ही हुयी थी और पूरी फिल्म में राजकपूर कुछ नहीं बोलकर भी कई बातें कह जाते हैं.

ऐसा कहा जाता है कि लगातार कई फिल्में साथ करने की वजह से राजकपूर और नर्गिस में नजदीकियां बढ़ गयी थीं.

तब नर्गिस ने राजकपूर के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन राजकपूर ने मना करते हुए कहा कि “मैं अपनी पत्नी को अभिनेत्री नहीं बना सकता हूं और अपनी अभिनेत्री को अपनी पत्नी नहीं बना सकता हूं“.

उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन में अन्य अभिनेताओं की तरह दरारें नहीं आने दी थी, जबकि स्क्रीन पर उनके रोमांस का मुकाबला भी नहीं था.

नर्गिस ने इस फिल्म के बाद राजकपूर के साथ कभी काम नहीं किया और अभिनेता सुनील दत्त से शादी कर ली. जिन्होंने महबूब खान की फिल्म "मदर इंडिया" के सेट पर लगे भयानक आग से उनकी जान बचाई थी. इस तरह हिंदी सिनेमा में एक रोमांटिक जोड़ी का अंत हो गया.

छह साल में बनाई 'मेरा नाम जोकर'

50 के दशक में राजकपूर के अन्य प्रसिद्ध फिल्में "चोरी चोरी", "फिर सुबह होगी", "अब दिल्ली दूर नही", "दो उस्ताद" और "अनाड़ी" जैसी सफल फिल्में भी की थीं, जिसमें सामाजिक संदेश छुपा हुआ था.

60 के दशक में राज कपूर ने पहली सुपरहिट फिल्म “जिस देश में गंगा बहती है ” दी. इस फिल्म में वो एक भले आदमी का किरदार निभाते हैं ,जो डाकुओं की टोली में फंस जाता है.

इस फ़िल्म में पद्मिनी और प्राण उनके सह कलाकार थे. इस फिल्म में मुकेश द्वारा गाये गये सभी गाने सुपर हिट हुए और लोगों की जुबान पर आज भी छाये हुए हैं. इस फिल्म ने कई फिल्म फेयर अवार्ड भी जीते थे, क्योंकि ये भी फिल्म एक सामाजिक संदेश पर आधारित थी. जिसमें राजकपूर ने डाकुओं को गलत रास्ता छोड़ने के लिए तैयार कर लेते हैं.

इस फिल्म के बाद उन्होंने "छलिया", "नजराना", "आशिक", "एक दिल के सौ अफसाने" और “दिल ही तो है” फिल्मों में काम किया.

साल 1964 में राजकपूर ने फिर आरके बैनर के तले एक और सुपरहिट फिल्म “संगम “बनाई, जिसको उन्होंने खुद निर्मित और निर्देशित किया.

इस फिल्म में उनके सह कलाकार उस जमाने के जुबली कुमार यानी राजेन्द्र कुमार थे, जबकि हिरोइन वैजयंतीमाला थीं.

ये फिल्म एक लव ट्रायंगल थी, जिसमें राजकपूर, वैजयंतीमाला से प्यार करते हैं जबकि वैजयंतीमाला राजेन्द्र कुमार से प्यार करती हैं फिल्म "संगम" राजकपूर की पहली रंगीन फिल्म थी और बतौर सफल अभिनेता उनकी अंतिम फिल्म थी.

इसके बाद 60 के दशक में उनकी कुछ और सफल फिल्मे भी आयी जिनमे "अरॉउंड द वर्ल्ड" (1966), "सपनों के सौदागर" (1968) जैसी फिल्में थीं, लेकिन ये फिल्में पर्दे पर उतनी सफल नहीं रहीं.

साल 1970 में राजकपूर ने अपने जीवन की सबसे प्रिय फिल्म “मेरा नाम जोकर” बनाई. इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक खुद राजकपूर ही थे. इस फिल्म को बनाने में राजकपूर को छह साल लग गये थे.

इस फिल्म ने उन्होंने अपने पुत्र ऋषि कपूर को भी बाल कलाकार के तौर पर काम दिया था, जिन्होंने फिल्म में राजकपूर के बचपन का किरदार निभाया था.

फिल्म "मेरा नाम जोकर" बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप रही, जिसके कारण राजकपूर को भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा था. जबकि यही फिल्म पहली रिलीज के कुछ सालों बाद जब दोबारा सिनेमा घरों में लगी, तो काफी सफल रही थी.

'राम तेरी गंगा मैली' आखिरी फिल्म

1971 में राजकपूर ने अपने बड़े बेटे रणधीर कपूर को फिल्मों में उतार और उनके लिए “कल आज कल ” फिल्म बनाई. इस फिल्म में कपूर खानदान की तीनों पीढियों को एक साथ काम किया. साथ ही साथ रणधीर कपूर की होने वाली पत्नी बबीता ने भी काम किया.

उसके बाद साल 1973 में उन्होंने अपने बेटे ऋषि कपूर को फिल्मों में बतौर हीरे उतारा और फिल्म बनाई “बॉबी”. यह फिल्म नवोदित अभिनेत्री डिंपल कपाडिया की भी पहली फिल्म थी. इस फिल्म की लव स्टोरी ने ऋषि कपूर और डिम्पल कपाड़िया को को रातों-रात स्टार बना दिया.

इस फिल्म के बाद साल 1975 में राजकपूर अपने पुत्र रणधीर कपूर के साथ फिल्म "धरम-करम" में काम किया. इसके बाद साल 1978 में फिल्म "सत्यम शिवम सुन्दरम" बनाई. जिममें उनके छोटे भाई शशि कपूर ने मुख्य अभिनेता और जीनत अमान ने अभिनेत्री के तौर पर काम किया था.

70 के दशक में महिलाओ पर आधारित फिल्मे बनाने का सिलसिला जो उन्होंने शुरू किया था वो 80 के दशक तक चलता रहा. 1982 में अपने पुत्र ऋषि कपूर और पद्मिनी कोल्हापुरी को लेकर फिल्म "प्रेम रोग" बनाई. इस फिल्म ने पद्मिनी कोल्हापुरी भी भी स्टार बना दिया.

साल 1985 में उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर को लेकर फिल्म “राम तेरी गंगा मैली ” बनाई. राजीव कपूर की यह एकमात्र सफल फिल्म रही. बतौर निर्माता और निर्देशक राजकपूर की आखिरी फिल्म “राम तेरी गंगा मैली ” रही.

साल 1988 में उन्होंने अपनी मौत से पहले फिल्म "हिना" का काम शुरू किया. जिसमे उनके पुत्र ऋषि कपूर और पाकिस्तानी कलाकार ज़ेबा बख्तियार मुख्य भूमिका में थे.

राजकपूर की मौत के बाद रणधीर कपूर ने इस फिल्म को पूरा किया और साल 1991 में इस फिल्म को रिलीज किया. भारत-पाक रिश्तों पर बनी ये फिल्म राजकपूर की ड्रीम प्रोजेक्ट थी, जिसे देखने के लिए वो जीवित नहीं रहे.

2 जून 1988 को निधन

राजकपूर ने 1946 में कृष्णा मल्होत्रा से शादी की थी, जिनके पिताजी राजकपूर के पिता के मामा थे. इस तरह वैसे तो दूर के रिश्ते की कजिन थीं, लेकिन उस समय परिवार के आस-पास ही रिश्ते देखे जाते थे. उनकी शादी अरेंज मैरिज थी, जिसे उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने तय किया था.

1946 में जब उनकी शादी हुयी तो एक मैगज़ीन में शादी के बाद राजकपूर के करियर के खत्म होने की बात कही, लेकिन राजकपूर ने इन बातों को गलत साबित करते हुय ना केवल एक बेहतरीन कलाकार बल्कि एक अच्छे पति भी बने.

राजकपूर की पत्नी कृष्णा ने भी अपने परिवार को बखूबी सम्भाला और राजकपूर के करियर में कभी बाधा नहीं बनी.

कृष्णा कपूर के भाई राजेद्र नाथ, प्रेम नाथ और नरेंद्रनाथ भी बाद में अभिनेता बने और उनकी बहिन उमा ने प्रसिद्ध विलन प्रेम चोपड़ा से शादी की.

बताया जाता है कि राजकपूर अपने अंतिम दिनों में अस्थमा से पीड़ित थे और 63 वर्ष की उम्र में 2 जून 1988 को उनका निधन हो गया. जिस समय उनको अस्थमा के अटैक के लिए एम्स में भर्ती किया गया था.

उस समय वो दिल्ली दादा साहब फाल्के अवॉर्ड लेने के लिए आये हुए थे. अस्थमा की वजह से वो एक महीने तक भर्ती रहे, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका.

भारत सरकार ने राज कपूर को मनोरंजन जगत में उनके अपूर्व योगदान के लिए 1971 में पद्मभूषण से विभूषित किया था.

First published: 14 December 2016, 16:08 IST
 
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