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पुण्यतिथि विशेष: सचिन दा 'मेरे साजन हैं उस पार'

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 October 2016, 16:31 IST
(एजेंसी)

भारतीय सिनेमा के महान संगीतकार सचिन देव बर्मन का निधन आज के दिन यानी 31 अक्टूबर, 1975 को मुंबई में हुआ था.बर्मन हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार और गायक थे. सचिन देव बर्मन को हिंदी सिनेमा में सचिन दा के नाम से जाना जाता था.

धुनों में गीतों को पिरोकर अमर कर देने वाले सचिन देव बर्मन का जन्म 1 अक्टूबर, 1906 को त्रिपुरा में हुआ था, जो आज बांग्लादेश में है.एस. डी. बर्मन के पिता त्रिपुरा के राजा ईशानचन्द्र देव बर्मन के दूसरे पुत्र थे. बर्मन के नौ भाई-बहन थे. एस. डी. बर्मन ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से बीए की शिक्षा प्राप्त की. 1933 से 1975 तक सचिन दा बंगाली और हिन्दी फ़िल्मों में सक्रिय रहे.

साल 1938 में बर्मन दा ने गायिका मीरा से विवाह किया और एक साल बाद पैदा हुए उनके विख्यात पुत्र राहुल देव बर्मन.

एस. डी. बर्मन कोलकाता के संगीत प्रेमियों में 'सचिन कारता', मुम्बई के संगीतकारों के लिये 'बर्मन दा', बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल के रेडियो श्रोताओं में 'शोचिन देब बोर्मोन', सिने जगत में 'एस.डी. बर्मन' और 'जींस' फ़िल्मी फ़ैन वालों में 'एस.डी' के नाम से प्रसिद्ध थे.

एस. डी. बर्मन के गीतों ने हर किसी के दिल में अमिट छाप छोड़ी है. एस. डी. बर्मन के गीतों में एक अलग सी विविधता थी. उनके संगीत में लोक गीत की धुन झलकती थी, वहीं शास्त्रीय संगीत का खुमार भी शामिल था.

संगीत में एस. डी. बर्मन की रुचि बचपन से ही थी और बर्मन ने इसके लिए विधिवत संगीत की शिक्षा भी ली थी.

एस. डी. बर्मन अपने पिता की मृत्यु के पश्चात घर से निकल गये और असम व त्रिपुरा के जंगलों में घूमे. जहां पर उनको बंगाल व आसपास के लोक संगीत के विषय में जानकारी मिली.

हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों में सचिन देव बर्मन ऐसे संगीतकार थे जिनके गीतों में लोकधुनों, शास्त्रीय और रवीन्द्र संगीत का स्पर्श था, वहीं एस. डी. बर्मन पाश्चात्य संगीत का भी बेहतरीन मिश्रण करते थे.

बर्मन ने अपना कैरियर 1930 के दशक के मध्य में कलकत्ता में संगीत निर्देशक के रूप में शुरू किया. एक गायक के रूप में उनकी पहली रिकॉर्डिंग बंगाल के क्रांतिकारी कवि क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की एक रचना थी.

एस. डी. बर्मन ने अपने जीवन के शुरुआती दौर में रेडियो द्वारा प्रसारित पूर्वोत्तर लोक संगीत के कार्यक्रमों में संगीतकार और गायक दोनों के रूप में काम किया.

एस. डी. बर्मन ने साल 1944 में फ़िल्मिस्तान के शशाधर मुखर्जी के आग्रह पर 'बर्मन अपनी इच्छा न होते हुए भी दो फ़िल्म, 'शिकारी' और 'आठ दिन' के लिए मुम्बई आए, लेकिन 'शिकारी' और 'आठ दिन' व बाद में 'दो भाई', 'विद्या' और 'शबनम' की सफलता के बाद भी दादा को पहचान बनाने में वक़्त लगा.

इस बात से हताश बर्मन वापस कोलकाता जाने लगे. उस समय अभिनेता अशोक कुमार ने उन्हें जाने से रोक लिया.

इसके बाद दादा ने फ़िर मोर्चा संभाला. 'मशाल' का संगीत सुपरहिट हुआ. उसके बाद सचिन दा ने सदाबहार अभिनेता देवानंद के 'नवकेतन बैनर' के लिए काम शुरुआत किया और फिल्म 'बाज़ी' के लिए संगीत दिया. जिसमें गुरूदत्त बतौर हीरो काम कर रहे थे.

साल 1951 की 'बाज़ी' हिट फ़िल्म थी और फिर 'जाल' (1952), 'बहार' और 'लड़की' के संगीत ने बर्मन दा की सफलता की नींव रखी.

बर्मन दा ने उसके बाद तो 1974 तक लगातार संगीत दिया. दर्जनों हिन्दी फ़िल्मों में कर्णप्रिय यादगार धुन देने वाले सचिन देव बर्मन के गीतों में जहां रूमानियत है, वहीं विरह और दर्शन की भी झलक मिलती है.

भारतीय सिनेमा जगत में सचिन देव बर्मन को सर्वाधिक प्रयोगवादी एवं संगीतकारों में शुमार किया जाता है. फिल्म 'प्यासा', 'गाइड', 'बंदिनी', 'टैक्सी ड्राइवर', 'बाज़ी' और 'अराधना' जैसी फ़िल्मों के मधुर संगीत के जरिए एसडी बर्मन आज भी हमारे दिलों पर छाए हुए हैं.

बर्मन ने ज्यादातर देवानंद की नवकेतन फ़िल्म्स (टैक्सी ड्राइवर, फ़टूश, गाइड, पेइंग गेस्ट, जुएल थीफ़ और प्रेम पुजारी), गुरुदत्त की (बाज़ी, जाल, प्यासा, काग़ज़ के फूल) और बिमल रॉय की (देवदास, सुजाता, बंदिनी) के लिए संगीत दिया.

बर्मन ने सबसे ज्यादा गीतकार साहिर लुधियानवी के गीतों को संगीतबद्ध किया. भारतीय सिनेमा के इतिहास में बर्मन और साहिर की जोड़ी ने दर्शकों को एक से बढ़कर एक गीत दिये.

इस जोड़ी ने सबसे पहले फ़िल्म 'नौजवान' के गीत ठंडी हवाएँ लहरा के आए... के जरिए लोगो का मन मोहा. इसके बाद ही गुरुदत्त की पहली निर्देशित फ़िल्म 'बाज़ी' के गीत 'तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना दे.'

इसके बाद साहिर लुधियानवी और एस. डी. बर्मन की जोड़ी ने ये रात ए चांदनी फ़िर कहाँ.., जाएँ तो जाएँ कहाँ.., तेरी दुनिया में जीने से बेहतर हो कि मर जाएँ.. और जीवन के सफर में राही.., जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला.. जैसे सुपरहिट गाने शामिल हैं, लेकिन गुरूदत्त की फिल्म 'प्यासा' के बाद यह जोड़ी अलग हो गई.

साहिर के अलावा बर्मन की जोड़ी गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के साथ भी ख़ूब जमी. एस. डी. बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी की जोड़ी ने 'माना जनाब ने पुकारा नहीं.., छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा.., है अपना दिल तो आवारा...,जैसे गीत शामिल रहे.

एस. डी. बर्मन को सिनेमा में उनके संगीत के योगदान के लिए कुल सात फिल्मफेयर और दो नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिले थे.

साल 1974 में सचिन दा को लकवे का आघात लगा और लगभग एक साल बाद 31 अक्टूबर, 1975 को बर्मन दादा संगीत की दुनिया को हमेशा के लिए सूना कर गए.

First published: 31 October 2016, 16:31 IST
 
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