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अब घाटा सहने के मूड में नहीं तेल कंपनियां, कर्नाटक चुनाव ख़त्म होते ही धमाके की तैयारी में

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 May 2018, 17:30 IST

कर्नाटक में 12 मई को विधानसभा चुनाव ख़त्म हो जायेंगे, ऐसे में देश की बड़ी तेल कंपनियों पर सरकार के उस दबाव की समयसीमा भी ख़त्म हो जाएगी जिसकी वजह से 23 अप्रैल से तेल की कीमतें स्थिर रहीं. इंटरनेशनल बाजार में फ़िलहाल क्रूड के दाम 71.4 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुके हैं. सूत्रों की मानें तो इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम निगम (एचपीसीएल) जैसी सरकारी कंपनियों को कीमतें न बढ़ाने से नुकसान उठाना पड़ रहा है.

कीमत बढ़ा सकती हैं कंपनियां 

कंपनियों के नुकसान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पेट्रोल और डीजल पर तेल कंपनियों का औसत मार्केटिंग मार्जिन 1 अप्रैल को 3.5 रूपये प्रति लीटर से 1.9 रूपये प्रति लीटर तक आ गया है. एक रिपोर्ट की मानें तो देश की बड़ी तेल कंपनियों ने 13 मई से पेट्रोल-डीजल के दाम में बड़ी बढ़ोतरी करने की तैयारी कर ली है. 12 मई को कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान खत्‍म होने के बाद तेल कंपनियां 13 मई से पेट्रोल-डीजल के दाम में तुरंत वृद्धि कर सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक कीमतों में 4 रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोत्तरी हो सकती हैं. कच्चे तेल की कीमतों में हर 1 डॉलर की वृद्धि के से चालू खाता घाटे पर लगभग 1 अरब डॉलर का असर पड़ता है. केंद्र सरकार वर्तमान में पेट्रोल पर 19.48 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 15.33 रुपये प्रति लीटर का उत्पाद शुल्क लेती है.

अक्टूबर में सरकार ने उत्पाद शुल्क में 2 रुपये की कटौती की थी, जिसके बाद माना गया कि इससे सालाना आधार पर सरकार को 130 अरब रुपये से ज्यादा का राजस्व नुकसान हुआ. नवंबर 2014 और जनवरी 2016 के बीच 13 महीने की अवधि में केंद्र ने नौ बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया. इंटरनेशनल बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर केंद्र ने राज्यों से पेट्रोल और डीजल पर वैट को कम करने के लिए कहा है. हालांकि इसका पालन खुद बीजेपी शासित राज्यों ने ही नहीं किया.

फिलहाल देश की राजधानी दिल्‍ली में पेट्रोल 74.63 रुपए प्रति लीटर और डीजल 65.93 रुपए प्रति लीटर पर बिक रहा है. सरकार ने जून 2010 में पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण मुक्‍त करते हुए इसे बाजार के हवाले कर दिया था. वहीं डीजल को अक्‍टूबर 2014 में सरकार के नियंत्रण से आजादी दी गई. तब से ईंधन की कीमतें अंतरराष्‍ट्रीय कीमत के अनुरूप घटती या बढ़ती रहती हैं.

गुजरात चुनावों के दौरान मार्केटिंग मार्जिन पर कंपनियां के 1.5 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा की गिरावट आयी थी. केयर रेटिंग्स की एक रिपोर्ट की मानें तो सालाना 1,575 मिलियन बैरल कच्चे तेल के आयात पर कीमतों में 1 डॉलर की वृद्धि से भारत के वार्षिक आयात बिल में 100 अरब रुपये की वृद्धि होगी. जो सरकार के लिए चिंता का एक प्रमुख कारण है.

एनर्जी विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने सहयोगी वेबसाइट पत्रिका को बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के हालात भी ठीक नहीं हैं अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतें 77 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई हैं. तनेजा के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों का असर भारतीय बाजार पर दिखने में तीन सप्ताह का समय लगता है। वहीं दूसरी ओर भारतीय तेल कंपनियों ने भी तीन हफ्तों से डायनिमिक प्राइसिंग नहीं की है. इस लिहाज से यह तय माना जा रहा है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी संभव है.

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First published: 12 May 2018, 15:44 IST
 
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