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एयर इंडिया की बदलती किस्मत निजीकरण की मांग को बेमानी कर देगी

नीरज ठाकुर | Updated on: 10 May 2016, 22:10 IST
QUICK PILL
  • एयर इंडिया तय समय से दो साल पहले ही मुनाफे की स्थिति में आ सकता है. एयर इंडिया के मुनाफे में आने की डेडलाइन 2021-22 थी लेकिन मीडिया में आई खबरों के मुताबिक माने तो कंपनी 2018-19 में ही मुनाफे में आ सकती है.
  • 9 सालों तक लगातार घाटे में रहने के बाद एयर इंडिया पहली बार 2015-16 में 8 करोड़ रुपये के मुनाफे में आई.

एयर इंडिया तय समय से दो साल पहले ही मुनाफे की स्थिति में आ सकता है. एयर इंडिया के मुनाफे में आने की डेडलाइन 2021-22 थी लेकिन मीडिया में आई खबरों के मुताबिक माने तो कंपनी 2018-19 में ही मुनाफे में आ सकती है.

9 सालों तक लगातार घाटे में रहने के बाद एयर इंडिया पहली बार 2015-16 में 8 करोड़ रुपये के मुनाफे में आई. एयर इंडिया के कायाकल्प के बारे में एक सवाल अक्सर उठाया जाता रहा है. क्या इस सरकारी कंपनी का निजीकरण कर देना चाहिए?

पूरा मामला दशक पुराना है. कई भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालय इस मामले में कई पेपर लिख चुके हैं. इन पेपर्स में एयर इंडिया का निजीकरण किए जाने की बजाए इसे मुनाफे में लाए जाने के सुझाव दिए गए हैं. 

साथ ही ऐसे लोगों की भी भरमार रही है जो एयर इंडिया को मुनाफा में लाए जाने के लिए इसकी हिस्सेदारी को निजी क्षेत्र के हाथों बेचे जाने की वकालत करते रहे हैं. लेकिन अब कंपनी मुनाफा कमाने को तैयार है. तो ऐसे में उन लोगों के लिए संदेश जाएगा जो एयर इंडिया का निजीकरण किए जाने की वकालत करते रहे हैं.

सीधे तुलना की बात करें तो एयर इंडिया जितना बुरा रहा है उतना ही अच्छा भी. अगर इसे बिना किसी राजनीतिक दबाव के पेशेवर तरीके से चलाया जाता तो आज एयर इंडिया की स्थिति किसी निजी एयरलाइंस कंपनी से ज्यादा बेहतर होती.

अतीत की गलती

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस की तरफ से करीब 44,000 करोड़ रुपये की लागत से 111 विमानों को खरीदने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण रहा.

निश्चित तौर पर यह एक खराब फैसला रहा क्योंकि 2008 में वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आई और इस दौरान तेल की कीमत आसमान छू रही थी. इस वजह से देश में काम कर रही किसी विमानन कंपनी के लिए मुनाफा कमाना असंभव था.

किसी विमानन कंपनी के लिए ईंधन की लागत उसके  कुल कॉस्ट का 60 फीसदी होताा है. ऐसी स्थिति में न केवल एयर इंडिया को बल्कि जेट एयरवेज, किंगफिशर एयरलाइंस और स्पाइसजेट को भी घाटा हुआ.

2011 में 111 विमानों को खरीदे जाने के फैसले की वजह से एयर इंडिया के नुकसान में बढ़ोतरी हुई

घाटे की वजह से विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर एयरलाइंस बंद हो गई. जेट एयरवेज और स्पाइसजेट को भी एयर इंडिया की तरह अपना काम करना पड़ा.

जेट और स्पाइसजेट को हालांकि पिछले एक साल से मुनाफा हो रहा है. एयर इंडिया के कायाकल्प का संकेत यह बताता है कि कंपनी को हो रहा घाटा इंडस्ट्री की खराब हालत की वजह से बढ़ रहा था और इसमें 111 विमानों को खरीदने का फैसला भी शामिल था. हालांकि आने वाले सालों में एयर इंडिया को इस फैसले से फायदा होने की उम्मीद है.

एक और बड़ा कारण है जिसकी वजह से हम यह समझ सकते हैं कि जब इंडिगो को छोड़कर सभी विमानन कंपनियां घाटे में थी तब एयर इंडिया को भी घाटा हो रहा था.

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक एयर इंडिया को इस वजह से भी घाटा हुआ कि क्योंकि सरकार ने निजी विमानन कंपनियों और इंटरनेशनल विमानन कंपनियों को मुनाफे  वाला रूट दिया. इस वजह से  एयर इंडिया के मुनाफे पर उल्टा असर पड़ा.

इतना ही नहीं एयर इंडिया को उन रुट पर भी विमान चलाने के लिए मजबूर किया जाता है जहां से कोई फायदा नहीं होता है. एयर इंडिया को पूर्वोत्तर, जम्मू और कश्मीर, पोर्ट ब्लेयर और लक्षद्वीप जैसे घाटे वाले रुट पर भी विमान उड़ाना होता है.

हम कह सकते हैं कि एयर इंडिया को होने वाले घाटे की एक वजह उसकी जिम्मेदारियां भी है. वहीं दूसरी तरफ निजी कंपनियों को उन रुट पर भी फ्लाइट ऑपरेट करने के दौरान घाटा होता है जहां कस्टमर्स की कमी नहीं होती है.

अब सवाल यह है कि अगर हम एयर इंडिया के निजीकरण का रास्ता चुनते हैं तो क्या सरकार उन इलाकों में एयर इंडिया को फ्लाइट ऑपरेट करने का आदेश दे पाएगी जहां उसे घाटा होता है.

अतीत से सबक

एयर इंडिया का प्रबंधन एविएशन इंडस्ट्री के आधुनिक पैरामीटर के मुताबिक अपने को ढालने की कोशिश करता रहा है. मसलन 2007 में एयर इंडिया के पास 30,000 से अधिक कर्मचारी थे. आंकड़ों में देखा जाए तो यह प्रति प्लेन 256 था. यह वैश्विक मानक से कहीं अधिक है. 

एयर इंडिया अपने राजस्व का पांचवां हिस्सा कर्मचारी लागत पर खर्च करता है जबकि अन्य कंपनियां अपने राजस्व का दसवां हिस्सा कर्मचारी लागत पर खर्च करती है.

मुनाफा बढ़ाने की रणनीति

कंपनी ने अपनी लोड फैक्ट में सुधार किया है. जनवरी 2015 में लोक फैक्टर 80 फीसदी से अधिक था. जनवरी 2016 में ऑन टाइम परफॉर्मेंस 65 फीसदी था जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 52.1 फीसदी था.

आगे हैं चुनौतियां

एयर इंडिया को स्थिर बनाए रखने के लिए सरकार अभी तक कंपनी में 30,000 से अधिक रकम डाल चुकी है. दिसंबर 2015 तक कंपनी का कर्ज 50,000 करोड़ रुपये से अधिक रहा है.

हालांकि इसके बावजूद कंपनी जेट एयरवेज और इंडिगो के हाथों अपनी बाजार हिस्सेदारी गंवा रही है. जनवरी 2016 में एयर इंडिया की बाजार हिस्सेदारी 16 फीसदी थी जबकि एक साल पहले यह हिस्सेदारी 35 फीसदी थी.

क्या घाटे से उबर पाएगी कंपनी

यह कठिन सवाल है क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों में विमानन कंपनी का कारोबार फायदे का नहीं रहा है. यहां तक कि भारत में भी 90 के बाद से कई विमानन कंपनियां अपने ऑपरेशन को बंद कर चुकी है.

देश में ऐसी कई सरकारी कंपनियां हैं जो निजी क्षेत्र से मुकाबला करते हुए उनसे बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं. एयर इंडिया भी ऐसी कंपनी बन सकती है. ऐसे में अगर किसी को लगता है कि एयर इंडिया को मुनाफा में लाने के लिए उसका निजीकरण जरूरी है तो उसे किसी निजी कंपनी को इन घाटे वाली रुटों पर चलने के लिए कहना चाहिए.

First published: 10 May 2016, 22:10 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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