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बजट 2016-17: शिक्षा के लिए वादे बहुत हैं, इरादे की दरकार है

सौम्या शंकर | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

नरेंद्र मोदी के शासन में उच्च शिक्षा टकराव का केंद्र बन गया है. और इस बार शिक्षा को वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट के नौ स्तंभों में से एक दर्शाया गया है.

इस वर्ष के शिक्षा बजट को जिन दो शब्दों ने परिभाषित किया, वे शब्द हैं - 'स्किल' और 'रिसर्च'. केंद्र सरकार प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की कीमत पर उच्च शिक्षा को सुधारना चाहती है.

अरुण जेटली ने पिछले वर्ष के बजट में शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित बजट में कटौती कर दी थी, लेकिन साथ ही उच्च शिक्षा के लिए आवंटित बजट में 22% की बढ़ोत्तरी भी कर दी.

बिल्कुल वही लय इस बार सोमवार को पेश किए गए बजट में भी नजर आई. 'मेक इन इंडिया' और 'डिजिटल इंडिया' जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों के बावजूद वित्त मंत्री का पूरा फोकस उच्च शिक्षा पर नजर आया.

शिक्षा के क्षेत्र में प्रमुख पांच निष्कर्ष बिन्दु इस प्रकार हैं:

1. 'वर्ल्ड क्लास' भारतीय संस्थान

दस सरकारी और दस निजी शिक्षण संस्थानों को “वर्ल्ड क्लास”बनाया जाएगा.

उच्च शिक्षण संस्थानों की सहायता कर उनकाे सशक्त बनाना हमारी वचनबद्धता है, ताकि वे विश्व स्तरीय शिक्षण और शोध संस्थान बन पाएं. विश्व स्तरीय शिक्षण और शोध संस्थानों के रूप में उभरने के लिए दस सरकारी और दस निजी उच्च शिक्षण संस्थानों को सशक्त बनाने लायक संसाधन उपलब्ध कराया जाएगा. इससे आम भारतीय की उच्च गुणवत्ता युक्त उच्च शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी. इसके लिए एक विस्तृत योजना का खाका तैयार किया जाएगा."

यह कदम शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका को मजबूत करेगा. लेकिन वित्त मंत्री ने अपने बजट में 330 राज्य विश्वविद्यालयों और 35,829 कॉलेजों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा. ये शिक्षण संस्थाएं 90% से अधिक विद्यार्थियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं और वर्तमान में जर्जर हाल में हैं.

याद रहे भारत का कोई शिक्षण संस्थान मुश्किल से दुनिया के शीर्ष-500 विश्वविद्यालयों की सूची में जगह बना पाता है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों में निम्न स्तर के शैक्षणिक स्तर, शैक्षणिक स्टाफ की कमी जैसी समस्याओं की भरमार है.

राज्य विश्वविद्यालय भी निम्न स्तर के प्रशासन, भ्रष्टाचार और फंड की कमी से जूझ रहे हैं इसका परिणाम होता है शिक्षा का स्तर नीचा होना.

सरकारी राज्य विश्वविद्यालयों की लगातार कम होते महत्व को बचाने उनमें जान डालने और सुधारों के लिए बजट में बड़ा सहारा देने की जरूरत थी.

2.उच्च शिक्षा के लिए वित्त में बढ़ोतरी

इस बजट में उच्च शिक्षा की वित्त संबंधी जरूरतों को पूरा करने लिए एक हजार करोड़ का अलग से प्रबंध है.

हम हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी के गठन का निर्णय ले चुके हैं, जिसके लिए आधार के तौर पर पहले एक हजार करोड़ रुपए का प्रबंध किया जाएगा. हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी एक गैर लाभकारी संस्थान होगा, जो बाजार से फंड जुटाने का काम करेगा और डोनेशन और कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉंन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड के माध्यम से उसमें वृद्धि करने का काम करेगा. इस फंड का उपयोग हमारे श्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों में बुनियादी ढांचे में सुधार हेतु किया जाएगा. इसका उपयोग अंदरूनी संग्रहण द्वारा किया जाएगा.

सरकार का यह कदम सरकारी विश्वविद्यालयों को बाजार की ताकतों के लिए खोल देगा. यह सिस्टम में नई ऊर्जा भरने का काम कर सकता है, लेकिन उच्च शिक्षा के व्यावसयीकरण का मुद्दा हर दिमाग में आएगा.

मोटे तौर पर, हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी उच्च शिक्षा के लिए छात्रों के लोन की जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित होगी.

3. सर्व शिक्षा अभियान और प्राइमरी एजुकेशन

पूरे देशभर में प्राथमिक शिक्षा के साधारणीकरण के बाद, हम अगला बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के रूप में. इसके तहत सर्व शिक्षा अभियान मद के तहत आवंटित बजट में एक हिस्सा इस दिशा में खर्च किया जाएगा. अगले दो साल में उन जिलों में 62 नए नवोदय विद्यालय खोले जाएंगे, जो अब तक बचे हुए हैं.”

प्राथमिक शिक्षा का साधारणीकरण स्वागत योग्य कदम है. लेकिन इसको भारत में स्कूल छोड़ने की ऊंची दर से भी जोड़ा जाना चाहिए. सरकारी स्कूलों में शिक्षा की निम्न गुणवत्ता के नतीजे के रूप में छात्रों को स्कूलों में रखना मुश्किल होता है. एक तरफ जहां प्राइमरी स्कूलों में कुल नामांकन अनुपात उम्मीद से अधिक (101 प्रतिशत से भी अधिक) है, वहीं इनमें से लगभग एक तिहाई बच्चे आठवीं कक्षा तक स्कूल छोड़ जाते हैं.

जिन कारकों पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है वे हैं शिक्षा की गुणवत्ता, छात्रों को स्कूल से जोड़े रखने की दर और सरकारी स्कूलों में तैनात टीचिंग स्टाफ की क्वालिटी.

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान जैसी नीतिगत पहल की कमी के कारण बजट कुछ विशेष भरपाई नहीं कर पाया.

नए स्कूलों को फंड देने वाली प्राथमिक शिक्षा को प्रमुखता देते हुए सर्व शिक्षा अभियान को अधिक रकम का आवंटन स्वागत योग्य है.

स्मरण रहे पिछले बजट में इसी अभियान के बजट आवंटन में 22.14% की कटौती कर दी गई थी.

आज भी शिक्षकों के 6 लाख पद खाली पड़े हैं. सरकारी स्कूलों में से सिर्फ 63% में छात्र-शिक्षक अनुपात शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत तय मानदंडों के अनुरूप है, जो प्राइमरी में 30:1 और अपर प्राइमरी में 35:1 है.

4.डिजिटल करने का अभियान

छह करोड़ अतिरिक्त ग्रामीण घरों को कवर करने के लिए एक डिजिटल साक्षरता योजना शुरू की जाएगी.

हमें ग्रामीण भारत में डिजिटल साक्षरता फैलानी होगी. कुल 16.8 करोड़ ग्रामीण घरों में से कम से कम 12 करोड़ घरों में कंप्यूटर नहीं हैं और न ही उनमें डिजिटल साक्षर लोग होने की संभावना है. डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए हम पहले ही दो योजनाओं को मंजूरी दे चुके हैं - पहली है - नेशनल डिजिटल लिटरेसी मिशन और दूसरी है डिजिटल साक्षरता अभियान. अगले तीन साल में छह करोड़ और ग्रामीण घरों को कवर करने के लिए हम अब एक नई स्कीम लॉन्च करने की योजना बना रहे हैं जो डिजिटल लिटरेसी मिशन स्कीम होगी. योजना के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी अलग से दी जाएगी.”

5. प्रमाण पत्रों की डिजिटल तिजोरी

विद्यार्थियों की सहायता के लिए और उच्च शिक्षण संस्थान एवं रोजगारदाता आवेदक के प्रमाण पत्रों तक आसानी से पहुंच पाएं, इसके लिए एक डिजिटल तिजाेरी यानी डिजिटल डिपोजिटरी स्थापित करने का प्रस्ताव है. इसमें विद्यालय त्याग प्रमाण पत्र, कॉलेज की डिग्री, शैक्षणिक उपाधियों और अंक तालिकाओं को सिक्योरिटी डिपोजिटरी की तरह रखा जा सकेगा. इससे आवेदन करने वालों की वैधता जांचने, सुरक्षित सार-संभाल और आसानी से निकालने की सुविधा मिल सकेगी.”

6. हर तरफ उद्यमी

स्कूलों, कॉलेजों और बड़े स्तर पर ऑनलाइन कोर्सों के माध्यम से उद्यमिता प्रशिक्षण की शुरुआत की जाएगी.

“2,200 कॉलेजों, 300 स्कूलों, 500 सरकारी आईटीआई और 50 व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों में बड़े पैमाने पर ऑनलाइन कोर्सों के माध्यम से उद्यमिता शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाएगा. संभावित उद्यमियों, विशेषकर देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वालों को सलाहकारों और ऋण बाजारों से जोड़ा जाएगा ताकि वे उद्यमी बन सकें.”

पिछले बजट की तरह, आईआईटी एवं आईआईएम पर तिरछी नजर और अर्थव्यवस्था के लिए कुशल श्रमिक पैदा करने का नजरिया इस बार के बजट में भी साफ नजर आया. पिछले बजट की तर्ज पर ही 2016-17 में भी बजट आवंटन यह संकेत देता है कि सरकार का ध्यान सामाजिक विषयों की बजाय तकनीकी शिक्षा की ओर बढ़ रहा है.
First published: 2 March 2016, 8:36 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

संवाददाता, कैच न्यूज़. राजनीति, शिक्षा, कला, संस्कृति और फोटोग्रॉफी में रुचि.

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