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गिरते दाल के दाम से किसानों को महफूज रखने की तैयारी है?

नीरज ठाकुर | Updated on: 12 September 2016, 7:31 IST

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में केंद्र की एनडीए सरकार को पूरे देश में दाल के ऊंचे भावों के कारण भारी कीमत चुकानी पड़ी थी. विपक्ष की पार्टियों ने सरकार पर ‘अरहर मोदी’ के नारे से हमला बोला, ताकि वह अरहर की दाल के भावों में आए उछाल पर ध्यान दे सके, जो उस समय 200 रुपए प्रति किलोग्राम के भाव से बिक रही थी.

अंतत: अच्छे मानसून और किसानों द्वारा ज्यादा बुवाई से दालों के भाव गिरने लगे, यहां तक कि कुछ जगहों पर 40 रुपए प्रति किलो तक कीमत में गिरावट आई. तूर की दाल के थोक भाव में 30 से 90 रुपए तक गिरावट दर्ज हुई. मराठवाड़ा में अच्छे उत्पादन का भावों पर भारी असर रहा. महाराष्ट्र दालों का उत्पादन करने वाला मुख्य राज्य है, और जुलाई और अगस्त में हुई वर्षा ने किसानों को बुवाई क्षेत्र बढ़ाने में मदद की.

महाराष्ट्र के कृषि विभाग के अनुसार, 2016 में तूर दाल की बुवाई 123 फीसदी, और मंूग और उड़द की क्रमश: 115 और 124 फीसदी बढ़ गई. कुल मिलाकर दाल का बुवाई क्षेत्र जो पिछले साल पूरे देश में 99.14 लाख हेक्टेयर था, बढक़र 110.08 लाख हेक्टेयर हो गया.

किसानों ने बोवाई क्षेत्र क्यों बढ़ाया?

खुदरा भावों में तेजी वृद्धि के कारण किसान इस फसल का बुवाई क्षेत्र बढ़ा रहे हैं, जो 150 रूपए किलो तक हो गए थे. अधिक बुवाई ने व्यापारियों को अपना स्टॉक मार्केट में बेचने को विवश किया, जिससे भावों में अचानक जबरदस्त कमी आई.

किसानों पर नकारात्मक प्रभाव

ग्राहकों के नजरिए से देखें, तो दालों के भाव गिरना अच्छी बात है, पर मंूग की दाल के भावों में जबरदस्त गिरावट से कई किसानों की आय पर विपरीत असर पड़ता है. उत्पादन में वृद्धि से मंूग की दाल के भाव, जिस कीमत पर सरकार खरीदती है, बाजार में उससे भी कम हो गए.

पिछले कुछ सालों में दाल के अस्थिर भावों ने किसानों को दाल की बुवाई करने से रोका. मुनाफे के लिए उन्होंने गन्ने को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी थी. यदि सरकार दालों के भाव गिरने से रोकने में विफल रहती है, तो बहुत संभव है कि अगले साल दाल के बाजार में दूसरा संकट पैदा हो जाएगा.

सरकारी कदम

सरकार के लिए यह जरूरी है कि वे किसानों को इस बात के लिए आश्वस्त करे कि दालों के भावों में आई अचानक गिरावट से उनका नुकसान नहीं होगा. इसके मद्देनजर सरकार ने गुरुवार नौ सितंबर को सरकारी खरीद करने वाली तीन एजेंसियों- नेशनल एग्रीकल्चरल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लि, स्मॉल फार्मर्स एग्रिकल्चरल-बिजनेस कंसॉर्शियम, और फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया- को सभी उत्पादक राज्यों में किसानों से तीनों दालें- तूर, उड़द और मूंग सीधे खरीदने के निर्देश दिए, ताकि सस्ती कीमत पर दाल की आपूर्ति करने के लिए उनका सुरक्षित भंडारण कर सकें.

First published: 12 September 2016, 7:31 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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