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पीपीएफ ब्याज दरों के बहाने 'बचत संस्कृति' पर सरकारी हमला?

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 18 June 2016, 14:02 IST

भारत में 'बचत' करने की अपनी एक संस्कृति है. यह एक ऐसा आन्दोलन है जो बिना किसी सरकारी प्रयास के खड़ा है. और आज से नहीं सैकड़ों-हजारों सालों से खड़ा है. आदमी अपने को और अपने परिवार को 'बुरे दिनों' से बचाने के लिए बचत करता है और फिर यही बचत उसके बच्चों के काम आती है, पीढ़ियों के काम आती है. सदियों पहले यह सोने-चांदी की खरीद के रूप में थी. फिर उसके साथ नकदी भी घरों में रखी जाने लगी और फिर देश में जब डाकघर और बैंक खुले तो वह उनमें जमा होने लगी.

आज भी आप ग्रामीण क्षेत्रों में जाएंगे तो वहां के डाकघरों में गरीब से गरीब आदमी का बचत खाता मिल जाएगा. भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार आज देश में डेढ़ लाख से ज्यादा डाकघर हैं. क्योंकि भारत में डाकघर डेढ़ सौ सालों से हैं इसलिए उनमें पीढ़ियों का विश्वास है. शायद यही कारण है कि भारतीय परिवार बचत की जो राशि बैंक, डाकघर, फिक्स्ड डिपॉजिट, म्युचुअल फण्ड और शेयर मार्केट में डालते हैं, उसका 60 प्रतिशत हिस्सा अकेले डाकघरों में होता है.

भारतीय परिवारों की बचत राशि का 60 फीसदी हिस्सा अकेले डाकघरों में होता है

लेकिन अब लगता है, भारत सरकार, भारत में बचत की संस्कृति को खत्म करना चाहती है. जड़ से ही मिटाना चाहती है. तभी तो बचत के सबसे बड़े रास्ते 'पब्लिक प्रॉविडेंट फण्ड एकाउंट' की ब्याज दरों पर तीन माह में दूसरा बड़ा हमला करने की तैयारी कर रही है सरकार. अभी एक अप्रैल को ही पीपीएफ की ब्याज दरें 8.70 प्रतिशत से 8.10 प्रतिशत की गई थी.

अब जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक तिमाही समीक्षा में सरकार इसे घटाकर 7.75 प्रतिशत करना चाह रही है. यानी तीन माह में 0.95 प्रतिशत की कमी. और यह कमी तब है जब अप्रैल में ही सरकार डाकघरों के माध्यम से होने वाली अन्य तमाम बचत योजनाओं (सुकन्या समृद्धि योजना, राष्ट्रीय बचत पत्र, किसान विकास पत्र, वरिष्ठ नागरिक बचत योजना, मासिक आय योजना, फिक्स्ड डिपॉजिट और रेकरिंग डिपॉजिट) पर ब्याज की दरों में अच्छी खासी कमी कर चुकी थी.

बचत की ब्याज दरों पर सरकारी हमले को क्या माना जाए? क्या सरकार बचत की जगह खर्च की उपभोक्तावादी संस्कृति को पनपाना चाहती है? या फिर डाकघरों को पैंदे बिठा कर वह आम आदमी की बचत को शेयर बाजार की 'जुआबाजी' की ओर भेजना चाहती है.

उदारीकरण के दौर में विस्तार पाए शेयर बाजार में आज भी आम भारतीय का भरोसा नहीं है. हर्षद मेहता, रामालिंगम राजू और विजय माल्या जैसों के हजारों-लाखों करोड़ के आर्थिक घोटाले देखकर उसकी हिम्मत ही नहीं पड़ती जिन्दगी भर की अपनी कमाई शेयर बाजार में लगाने की.

खबरों के मुताबिक तिमाही समीक्षा में केंद्र सरकार पीपीएफ की ब्याज दर घटाकर 7.75 फीसदी करना चाहती है

वह बड़े-बड़े सेठों की बजाय भारत को बचाने के लिए बचत करना चाहता है. पिछले 8 सालों में आई विश्व की दो मंदी हमारे सामने है. दुनिया भर को उन्होंने गिरा दिया. आज विश्व की सबसे बड़ी ताकत बने बैठे अमेरिका को उसने जड़ से हिला दिया. उसके 60 प्रतिशत बैंक दिवालिए हो गए लेकिन भारत को गिराना तो दूर ये मंदी हिला भी नहीं पाई. क्यों? क्योंकि भारत के पास, भारतीयों की बचत की ताकत थी. हमारी राष्ट्रीय बचत दर 30 प्रतिशत है.

चीन भी नहीं हिला क्योंकि उसकी बचत दर हमसे भी ज्यादा 48 प्रतिशत है. अमेरिका कांप गया क्योंकि उसकी बचत दर केवल 2 प्रतिशत ही है. अमेरिका सहित तमाम यूरोपीय देश 'कर्ज लो और घी पीयो-जब तक जीयो, सुख से जीयो' की चार्वाक संस्कृति में भरोसा रखते हैं. जबकि भारतीयों का भरोसा उतने ही पैर पसारने में है, जितनी लम्बी उनकी चादर है.

भारतीयों के लिए 'अच्छे दिन' के वादे के साथ सत्ता में आई सरकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि, भारतीयों का भरोसा अभी भी सरकार और सरकारी संस्थाओं में है. तभी वह बचत के लिए डाकघर और बैंकों की तरफ भागती है. वह कई गुणा रिटर्न की जगह तय रिटर्न से संतोष कर लेती है. 

एक जमाने में इंदिरा विकास पत्र और किसान विकास पत्र, 60 माह में रकम दोगुना कर देते थे. आज यह अवधि 100 माह से ज्यादा है, (110 माह होने जा रही है) तब भी गरीब आदमी उसी में पैसा लगा रहा है. ऐसे में सरकार की पूरी कोशिश इस भरोसे को तोड़ने की बजाय बनाए रखने की होनी चाहिए. यदि बचत पर ब्याज की दर को कुछ वर्ष पहले के 10 प्रतिशत पर नहीं भी ला पाए तो 48 साल में सबसे नीचे 8 प्रतिशत से कम तो नहीं करना चाहिए. 

'काला धन' नहीं ला पाए, उसे बाद में देख लिया जाएगा, उसे विकास के लिए भारतीयों की बचत के इस समन्दर को बढ़ाना चाहिए. 'अच्छे दिन' भारतीय बचत के सहारे ही आएंगे. इसलिए बेहतर हो सरकार उसे इस पर पूरा ब्याज दे और विदेशी कर्ज लेने के बजाय उस राशि को देश के विकास में काम लेती रहे.

First published: 18 June 2016, 14:02 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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