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हड़ताल से क्या रुक पाएगा बैंकों के विलय का फैसला!

अभिषेक पराशर | Updated on: 31 July 2016, 8:26 IST
QUICK PILL
  • यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन की तरफ से आहुत हड़ताल की वजह से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा लेकिन मोबाइल बैंकिंग और एटीएम जैसी बैंकिंग सुविधाओं पर कोई असर नहीं हुआ.
  • चेक, नकदी जमा और बैंक शाखाओं से नकद निकासी जैसी सुविधाओं के नहीं होने से लोगों को परेशानी हुई.
  • सार्वजनिक बैंकों के बढ़ते एनपीए और उनकी खराब हालत को देखते हुए सरकार की योजना 27 पीएसयू बैंकों के एकीकरण और विलय की है.
  • 2008 और 2010 में सरकार स्टेट बैंक ऑफ इंदौर और स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र का विलय कर चुकी है. उस वक्त भी सरकार के इस फैसले का विरोध हुआ था लेकि न वह अपने फैसले को लागू करने में सफल रही.

सहयोगी बैंकों के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के साथ विलय किए जाने के प्रस्ताव और आईडीबीआई के निजीकरण के खिलाफ सार्वजनिक बैंक के कर्मचारियों के देशव्यापी हड़ताल से आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा. 

यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन की तरफ से बुलाई गई हड़ताल की वजह से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा. मोबाइल बैंकिंग और एटीएम जैसी बैंकिंग सुविधाओं पर कोई असर नहीं हुआ लेकिन चेक, नकदी जमा और बैंक शाखाओं से नकदी निकसी जैसी सुविधाओं के नहीं होने से लोगों को परेशानी हुई.

जारी बयान में ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉयज एसोसिएशन ने हड़ताल को सफल बताते हुए कहा, 'हमारा प्रदर्शन सफल रहा और इसमें करीब 10 लाख बैंक कर्मचारियों ने शिरकत की.' बयान में कहा गया है कि सार्वजनिक बैंकों के हड़ताल से करीब 20,000 करोड़ रुपये का लेन-देन प्रभावित हुआ है.

सार्वजनिक बैंकों के बढ़ते एनपीए और उनकी खराब हालत को देखते हुए सरकार की योजना 27 पीएसयू बैंकों के एकीकरण और विलय की है ताकि इन्हें पांच और छह बड़े बैंकों में बदला जा सके.

हारी हुई लड़ाई

सरकार का प्रस्ताव स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, केरला, कर्नाटक, राजस्थान और हैदराबाद के करीब 1,137 शाखाओं को स्टेट बैंक में मिलाने का है. साथ ही सरकार की योजना आईडीबाई बैंक के निजीकरण की है. केंद्र सरकार मौजूदा बैंक में अपनी हिस्सेदारी को 51 फीसदी से कम करना चाहती है. 

इससे पहले 2008 और 2010 में सरकार स्टेट बैंक ऑफ इंदौर और स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र का विलय कर चुकी है. उस वक्त भी सरकार के इस फैसले का विरोध हुआ था लेकिन वह अपने फैसले को लागू करने में सफल रही.

यूनियन सरकार की उस योजना का विरोध कर रहे हैं जो बदलते वक्त की जरूरत है. इस बीच स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य ने कहा कि अगले साल मार्च तक एसबीआई के साथ  पांच साहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक का विलय पूरा कर लिया जाएगा. 

एसबीआई वेल्थ मैनेजमेंट प्रॉडक्ट एसबीआई एक्सक्लूसिफ के मौके पर उन्होंने कहा, 'लोगों को यह समझना होगा कि बदलाव जरूरी है. कई मौके पर हड़ताल हुए हैं लेकि न हमें उन्हें बताना होगा और बातचीत के लिए साथ लाना होगा.' 

ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच का अनुमान है कि 2019 तक बासल 3 की बाध्यता को पूरा करने के लिए भारतीय बैंकों को 90 अरब डॉलर की जरूरत होगी. इनमें से अधिकांश हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए जरूरी होगा. 

2016 में सरकार अपनी योजना के तहत बैंकों में 22,900 करोड़ रुपये की पूंजी डाल चुकी  है. एक अनुमान के मुताबिक सरकार की तरफ से बैंकों को दी गई अतिरिक्त पूंजी उनकी जरूरत के लिहाज से बेहद कम है. 

आईसीआरए के अनुमान के मुताबिक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को इस अवधि में कम से कम 40,000 से 50,000 करोड़ रुपये की जरूरत होगी. 

देश की अर्थव्यवस्था और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की फंडिंग में पीएसयू बैंकों की भूमिका निजी बैंकों के मुकाबले बड़ी है. निजी बैंकों का बैलेंस शीट न केवल मजबूत है बल्कि उनका एनपीए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मुकाबले कम है.

मसलन सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक एसबीआई का ही उदारहण ले लेते हैं. सरकार पिछले 9 सालों में करीब बैंक में 1.15 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डाल चुकी है. मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार की योजना बैंकों को 25,000 करोड़ रुपये देने की थी और इसके तहत 22,900 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी कर दी गई है और इसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया 7,575 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है. 

हालांकि यह रकम बैंक की पूंजी जरूरत और बासल 3 की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है. बैंक का एनपीए करीब 12 फीसदी है, जो चिंताजनक स्थिति है. 

मौजूदा वित्त वर्ष 2016-17 में सरकार की योजना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 25,000 करोड़ रुपये देने की है.

आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, 'मौजूदा वृहद आर्थिक स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि मार्च 2017 में एनपीए बढ़कर 8.5 फीसदी हो सकता है. अगर भवष्यि में स्थिति में सुधार नहीं होता है तो बैंकों का सकल एनपीए 9.3 फीसदी तक जा सकता है.'

रिपोर्ट के मुताबिक 2015-16 में बैंकों के एनपीए में करीब 80 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. मार्च 2016 में बैंकों का कुल एनपीए सितंबर 2015 के 2.8 फीसदी के मुकाबले बढ़कर 4.6 फीसदी हो गया. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल एनपीए 6.1 फीसदी रहा जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 4.6 फीसदी रहा.

डिफॉल्टर्स हैं समस्या

ऑल इंडिया बैंकिंग एम्प्लॉयज एसोसिएशन का कहना है कि 'एकीकरण कर बड़े बैंकों को रखने के तर्क का कोई मतलब नहीं है. एसोसिएशन ने कहा कि हमें बेहतर तरीके से चलने वाले बैंक की जरूरत है जिसकी क्षमता बेहद मजबूत हो. बड़े बैंक हमारी जरूरत नहीं है. बड़े बैंक का यह मतलब नहीं होता कि वह मजबूत भी होगा.'

जारी बयान में कहा गया है कि बैंकों का एनपीए करीब 13 लाख करोड़ रुपये है और इसका अधिकांश हिस्सा कॉरपोरेट और बिजनेस हाउसेज के पास है. सरकार को बैंकों का एकीकरण करने की बजाए इस रकम को निकालने पर ध्यान देना चाहिए.

एसोसिएशन ने कहा, 'वित्त मंत्री के मुताबिक देश में कुल 8,167 डिफॉल्टर्स हैं और इन पर बैंकों का करीब 76,685 करोड़ रुपये बकाया है. हमें डिफॉल्टर्स के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की शुरुआत करनी चाहिए. लेकिन सरकार उनके कर्ज को बट्टा खाते में डालकर उनके साथ शाही बर्ताव कर रही है. यह जनता की जमा पूंजी की बड़ी लूट और इसे तत्काल रोका जाना चाहिए.'

First published: 31 July 2016, 8:26 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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