Home » बिज़नेस » Bleak outlook: Note ban likely to cost India Rs 1,28,400 crore
 

नोटबंदी: चुनावों में इस्तेमाल होने वाले कालेधन पर इसका असर क्या होगा?

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 29 November 2016, 7:47 IST
(एएफ़पी )
QUICK PILL
  • नोटबंदी के फ़ैसले ने कालाधन खपाने और इस्तेमाल करने वालों को ज़ोर का झटका दिया है. 
  • मगर अगले कुछ महीनों मे उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि में विधानसभा के चुनाव होने हैं, वहां की चुनावी अर्थव्यवस्था बिना कालाधन के कैसे चल पाएगी?

बीते 8 नवम्बर की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक फ़ैसला लेते हुए बाज़ार में चल रहे 500 और 1,000 रुपए के नोटों को चलन से बाहर कर दिया. दावा किया गया कि यह फैसला भ्रष्टाचार से लड़ने की दिशा में एक कड़ा कदम है. इस कदम की कइयों ने तारीफ़ भी की जबकि विरोधी यह कहकर इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं कि इससे लोगों में घबराहट पैदा होगी. आम जनमानस और मौद्रिक बाज़ार में अनिश्चितता का माहौल पैदा होगा.

इस कदम का एक सकारात्मक पहलू यह है कि वर्तमान में बाज़ार में जो फर्ज़ी नोट चल रहे हैं, वह कुछ वक्त के लिए चलन से बाहर हो जाएंगे. लेकिन एक दिलचस्प सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिल रहा कि चुनावी फंडिंग का क्या होगा? 

यह हर कोई जानता है कि भारत में चुनाव 'चंदे' के सहारे होते हैं जिसमें कालाधन खपाया जाता है और यह बढ़ता भी है. हालांकि  अभी कोई साफ़ नहीं है कि आगे क्या होने जा रहा है. फ़िर भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर आंकड़ों में एक नज़र डालते हैं.

300 करोड़ रुपए

  • की नगदी चुनाव आयोग द्वारा 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान पकड़ी गई जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं था.
  • हैरानी इस बात की है कि विजेता प्रत्याशी ने चुनाव आयोग को खर्च का जो ब्योरा दिया है, उसमें कहा है कि उन्होंने खर्च की तय सीमा का केवल 58 फ़ीसदी ही खर्च किया.
  • औसतन हर सीट पर 55 करोड़ रुपए खर्च किए गए 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान.

200 करोड़ रुपए

  • की राशि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2015 के दौरान ज़ब्त की गई, मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक 
  • इस चुनाव के दौरान कुल 5,000 करोड़ रुपए खर्च किए गए.
  • इसी साल, 19 करोड़ रुपए जब्त किए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने. इस रकम का कोई लेखा-जोखा नहीं था.
  • कालाधान मतदाताओं को रिश्वत और चुनाव अभियानों में खर्च किया जाता है और अर्थव्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका बन जाती है.

30,000 करोड़ रुपए

  • सेन्टर फॉर मीडिया स्टडीज़ के एक अध्ययन के मुताबिक 30,000 करोड़ रुपए ख़र्च किए गए राजनीतिक दलों द्वारा 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान. 
  • 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह खर्च 2009 के लोकसभा चुनावों से तीन गुना ज्यादा था. भारत के इतिहास में यह सबसे खर्चीला चुनाव रहा और अमरीका में 2012 में हुए चुनाव के बाद विश्व में दूसरा खर्चीला चुनाव था.

0.35%

  • अनुमानित हिस्सा था जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह चुनावी खर्च.
  • 2014 में चुनाव आयोग ने संसद का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के खर्च की सीमा 70 लाख रुपए तक बढ़ा दी थी लेकिन चुनाव आयोग भी इस तथ्य़ से वाकिफ है कि कभी-कभी प्रत्याशी इस राशि से 50 गुना ज्यादा तक खर्च कर देते हैं.

20 करोड़ रुपए

  • 2012 में हुए एक सेमिनार में कांग्रेस और भाजपा दोनों के प्रत्याशियों ने यह स्वीकार किया था कि इन्होंने तय राशि से हज़ार गुना ज्यादा खर्च किया है.
First published: 29 November 2016, 7:47 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी