Home » बिज़नेस » Catch Hindi: budget 2016 notes 7 for arun jaitley on realistic growth rate
 

बज़ट 2016-17: विकास दर के मामले में जेटली को बनना होगा यथार्थवादी

नीरज ठाकुर | Updated on: 26 February 2016, 20:22 IST
QUICK PILL
वित्त मंत्री अरुण जेटली 29 फरवरी को साल 2016-17 का बज़ट पेश करेंगे. कैच \r\nन्यूज समाज के हर तबके की आकांक्षाओं के अनुरूप बज़ट पर विशेष शृंखला पेश \r\nकर रहा है. ताजा कड़ी में अगले वित्त वर्ष की विकास दर के संभावित लक्ष्य का विश्लेषण.

भारत को दुनिया की सबसे तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यस्था कहा जाता है. साल 2015-16 के लिए सरकार ने 7.6 प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य रखा था. माना जा रहा है कि आगामी वित्त वर्ष के लिए वो 8 या 8.5 प्रतिशत की विकास दर का लक्ष्य रख सकते हैं.
 
लेकिन क्या भारत इस लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम है? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत को उम्मीद की किरण बताया था. क्या ये किरण इस रफ्तार से आगे बढ़ पाएगी?

विवादित विकास दर


ऊंची विकास दर का लक्ष्य रखना अरुण जेटली की मजबूरी है. जिस अर्थव्यवस्था से पंजी का पलायन हो रहा हो उसमें लोगों का उत्साह बनाए रखना के लिए ऐसा करना जरूरी है. इससे सरकार को अंतरराष्ट्रीय निवेश को लुभाने में मदद मिलेगी.

पढ़ेंः जेटली को स्वास्थ्य बजट में इन 5 बिंदुओं पर गौर करना चााहिए

वित्त मंत्री ने वित्त वर्ष 2015-16 में पहले 8-8.5 प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य रखा था लेकिन मिडटर्म आर्थिक समीक्षा में उसे 7.5 प्रतिशत कर दिया गया. साल के आखिरी तिमाही में उसकी फिर से समीक्षा करके इसे 7.6 प्रतिशत किया गया.

सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों का बैंकिंग सेक्टर के 70 प्रतिशत बाजार पर कब्जा है

पिछले कुछ समय में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से जुड़े आंकड़ों पर काफी विवाद हुुआ है. कई अर्थशास्त्रियों ने सरकारी आंकड़ों पर सवाल उठाए. कुछ विशेषज्ञों नेे तो इसकी तुलना चीनी सरकार के आंकड़ों की हेराफेरी के तौर-तरीकों से भी कर दी.

बैड लोन है सरकारी नीतियों के लिए झटका


बज़ट से पहले जेटली ने विभिन्न मंचों से ये जाहिर किया कि सरकार ग्रामीण अर्थव्यस्था को बेहतर बनाने के लिए ढांचागत विकास पर ज्यादा राशि खर्च करेगी.

निजी क्षेत्र द्वारा निवेश के अभाव में सार्वजनिक क्षेत्र का खर्च काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. मौजूदा वित्त वर्ष में पिछले एक दशक की सबसे कम राशि इस मद में खर्च हुई.

ऐसे में सवाल ये है कि पैसा आएगा कहां से? क्या भारतीय बैंक जेटली की मंशाओं को पूरा करने के लिए फंड देंगे?

पढ़ेंः अरुण जेटली के इस बज़ट से भारतीय किसानों को क्या चाहिए

भारतीय बैंकिंग सेक्टर में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों(पीएसबी) का दबदबा है. सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों का बैंकिंग सेक्टर के 70 प्रतिशत बाजार पर कब्जा है. मीडिया में आई खबरों के अनुसार इन सितंबर, 2015 तक सार्वजनिक बैंकों पर 3.14 लाख करोड़ का नॉन-पर्फार्मिंग एसेट(एनपीए) का बोझ था. यानी इन बैंकों के एनपीए में 25.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. सितंबर, 2014 तक इन बैंकों में 2.5 लाख करोड़ एनपीए था.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इन कारणों से भारत के सार्वजनिक बैंक पिछले साल की आखिरी तिमाही तक 12 हजार करोड़ रुपये के घाटे में थे.

एनपीए बैंकों से लिए गए वो लोन होते हैं जिनका लेनदार द्वारा ब्याज या मूलधन नहीं चुकाया गया हो. एनपीए की कुल राशि 2015-16 वित्त वर्ष के प्लान्ड एक्सपेंडिचर का 65 प्रतिशत है.

सितंबर, 2015 तक सार्वजनिक बैंकों पर 3.14 लाख करोड़ का नॉन-परफार्मिंग एसेट का बोझ था

रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के अनुसार भारतीय बैंकिंग सेक्टर पर बढ़ते दबाव का असर अगले दो-तीन सालों मेें कमाई और कर्ज चुकाने की क्षमता पर पड़ेगा.

भारत सरकार ने साल 2016 तक 2019 के बीच बैंकिंग सेक्टर में 70 हजार करोड़ रुपये पूंजी निवेश का लक्ष्य रखा है. लेकिन आईसीआरए के अनुसार ये राशि पर्याप्त नहीं होगी.

पढ़ेंः नॉन परफार्मिंग एसेट को दुरुस्त कर अपनी परफार्मेंस सुधार सकते हैं जेटली

आईसीआरए ने अपने बैंकिंग सेक्टर आउटलुक में कहा, "अगर सरकार वित्त वर्ष 2016 से 2019 के बीच 70 हजार करोड़ रुपये के पूंजी निवेश तक खुद को सीमित रखेगी तो इससे विकास बाधित होगा. इससे उसके ऊपर आर्थिक दबाव बढ़ेगा."

भारतीय बैंकिंग सेक्टर जिस स्थिति से गुजर रहा है उसे देखते हुुए ऐसा नहीं लगता कि भारत सरकार उनसे ली जाने वाली राशि बढ़ाकर बुनियादी ढांचे पर खर्च करे.

दूसरी बड़ी समस्याएं


सरकार को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें भी लागू करनी है. जिससे सरकार एक लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

'वन रैंक वन पेंशन' को लागू करने से भी सरकार पर 7,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा.

आर्थिक जानकार हर चर्चा में सरकार को राय दे रहे हैं कि उसे बुनियादी ढांचे के विकास में ज्यादा खर्च करना चाहिए. मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों की हालत से लगता है कि वो किसी नए प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी वहन नहीं कर पाएंगे.

भारत की कर्ज में डूबी शीर्ष कंपनियों में आठ इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की हैं. इन कंपनियों पर कुल 7.32 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है. इनमें से ज्यादातर कंपनियां मौजूदा परियोजनाएं पूरा करने और कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं है.

पढ़ेंः गरीबों को नुकसान पहुंचाए बिना कैसे हो सब्सिडी का बेहतर प्रबंधन

अगर सरकार बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र में आक्रामक रूप से खर्च करेगी तो उसके मिड-टर्म वित्तीय स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ेगा.

एचएसबीसी की रिपोर्ट की अनुसार बढ़ती मुद्रास्फिति और सुस्त विकास दर से भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के कर्ज के अनुपात में इस साल बढ़ोतरी होगी. साल 2013-14 के 65.5 प्रतिशत से बढ़कर साल 2014-15 में ये 67 प्रतिशत हो गया था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि "सार्वजनिक क्षेत्र में ज्यादा खर्च करने से भारत के 65 प्रतिशत के कर्ज अनुपात पर वापस आने में और ज्यादा वक्त लगेगा."

यथार्थवादी विकास दर की जरूरत


हो सकता है कि इन परिस्थितियों के मद्देनजर जेटली विकास दर का यथार्थवादी लक्ष्य तय करें. इससे सरकारी आकंड़ों की विश्वसनीयता बढ़ेगी. पिछले वित्त वर्ष में सरकार ऐसी वजहों से विवादों में पड़ी थी.

नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक फिनांस एंड पॉलिसी के विजिटिंग प्रोफेसर अजय छिब्बर कहते हैं, "वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती को देखते हुए अगले साल सरकार सात प्रतिशत की विकास दर हासिल कर ले तो भी सौभाग्य की बात है."

ऐसे में जेटली को चाहिए कि वो वही वादे करें जिन्हें निभा सकें. इसी से उनकी और सरकार दोनों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी.

First published: 26 February 2016, 20:22 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी