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बजट 2018 : चौथे साल में किसानों से किया अपना वादा पूरा करेगी मोदी सरकार!

सुनील रावत | Updated on: 30 January 2018, 16:10 IST

आगामी बजट में किसान मोदी सरकार से बहुत उम्मीदें लगाए हुए हैं. सरकार के आर्थिक सर्वे में यह बात भी सामने आयी है कि कई वर्षों से सरकारों की गलत नीतियों का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ा है. सरकारों ने एमएसपी में वृद्धि, बिजली सब्सिडी और उच्च कृषि ऋण जैसे लोकलुभावन वादों से वोट प्राप्त किया. सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है कि 1960 के बाद से वास्तविक कृषि विकास औसत 2.8 प्रतिशत है.

किसानों को दिए जाने वाले ऋण की राशि वर्ष 2009-10 में 4.1 लाख करोड़ से बढ़कर 2016-17 में 9.46 लाख करोड़ हो गई. कुल ऋणों के प्रतिशत के रूप में दीर्घकालिक ऋणों का हिस्सा 1990-91 में 75 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में 39 प्रतिशत हो गया.

पिछले 30 वर्षों में भारत के वाटर टेबल में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है, उत्तर भारत में इसकी कमी सबसे अधिक चिंता का कारण है. छत्तीसगढ़, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में फसल विविधीकरण में तेजी से गिरावट आई है. फसल विविधीकरण का सूचकांक (जहां मूल्य 0 से 1 से अधिक के बीच है और वैश्वीकरण से अधिक मूल्य) ओडिशा में वर्ष 2014-15 में 0.740 से 1994-95 में 0.340 हो गया.

2016 के आर्थिक सर्वे के अनुसार भारत का किसान साल में मात्र 20,000 रुपये कमाता है. ये उसकी कमाई का औसत है. महीने का दो हज़ार भी नहीं कमाता है. 2002-2003 और 2013-13 के बीच किसानों की आमदनी 3.6 प्रतिशत बढ़ी है.

पंजाब के लिए यह 0.71 से घटकर 0.65 और हरियाणा में 0.83 से 0.77 के बीच रहा. जबकि ओडिशा के मामले को अतिरिक्त बारिश के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, पंजाब और हरियाणा का मामला पूरी तरह से मूल्य और खरीद का समर्थन है.

 

चावल और गेहूं जुनून

1983-84 और 2015-16 के बीच भारत में चावल उगाने का क्षेत्र 31 प्रतिशत से बढ़कर 35 प्रतिशत और गेहूं का हिस्सा 18.8 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हो गया है. गौरतलब है कि पंजाब में गेहूं और धान राज्य के खेती योग्य जमीन का 83 प्रतिशत कवर करते हैं.

कुछ सालों से गेहूं और चावल की खेती में बढ़ोतरी का कारण बेहतर समर्थन मूल्य रहा है. पिछले दशक में चावल और गेहूं के मामले में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि बहुत तेज हुई है. 1990 के दशक में इन दो फसलों में हर साल एमएसपी में वृद्धि करीब 20-40 रुपये प्रति क्विंटल थी. जबकि पिछले 10 वर्षों में यह 50-150 रुपये प्रति क्विंटल था.

भारत में 50 प्रतिशत कृषि अभी भी सिंचाई पर निर्भर है, यह सिर्फ दो / तीन फसलों पर अपने पानी का एक अच्छा हिस्सा खर्च नहीं कर सकता.
अगर सब्सिडी वाली शक्ति और मूल्य का समर्थन जारी रहेगा, तो कोई भी चुनिंदा फसलों में पानी या बुवाई का गैर-जिम्मेदार उपयोग नहीं कर सकता है.

उत्तर-कर्नाटक और मध्य महाराष्ट्र और तेलंगाना सहित देश के कई शुष्क क्षेत्रों में ऊब और कपास का बोअरवेलों से पानी का उपयोग करके बड़े पैमाने पर बोया जाता है.

राज्य सरकारों से सब्सिडी वाली ऊर्जा के परिणामस्वरूप पानी का बेरहम उपयोग हुआ है, जैसे यूरिया सब्सिडी है, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी की गुणवत्ता में यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल और मिट्टी में गिरावट आई है.

हालांकि सरकार ने हाल ही में पंजाब और हरियाणा सहित राज्यों में फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने शुरू कर दिया है, इसे समग्र रूप से होना चाहिए। यह मोटे अनाजों की बुवाई के लिए किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

First published: 30 January 2018, 15:57 IST
 
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