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बजट 2018: जनता की उम्मीदें कैसे पूरा करेगी मोदी सरकार, ये हैं बड़ी चुनौतियां

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 January 2018, 13:59 IST

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण से बजट सत्र की शुरुआत हो गई. सुबह करीब 11 बजे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सेंट्रल हॉल में संयुक्त सत्र को संबोधित कर इसकी शुरुआत की. बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई इसके बाद सेंट्रल हॉल भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा. बजट सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सभी देशवासियों को त्योहारों और गणतंत्र दिवस की बधाई दी.

राष्ट्रपति ने आसियान देशों के प्रमुखों की उपस्थिति की भी तारीफ की. उन्होंने कहा कि मेरी सरकार सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति को मजबूत करने का काम कर रही है. इसके साथ ही सरकार के लिए नई चुनौतियों का आगाज हो गया. आइए आपको भी बताते हैं आने वाले साल में सरकार के लिए क्या है चुनौतियां-

 

युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना

साल 2014 के लोकसभा चुनावों की रैलियों में नरेन्द्र मोदी ने सत्तारूढ़ मनमोहन सरकार के मुकाबले अपने कार्यकाल के दौरान प्रति वर्ष 1 करोड़ नई नौकरी पैदा करने का वादा किया था. लेकिन देश में नई नौकरी पैदा करने की रफ्तार मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान 2015 में निचले स्तर पर पहुंच गई जब महज 1 लाख 35 हजार नई नौकरियां पैदा की गई. जबकि 2014 के दौरान 4 लाख 21 हजार नौकरियां पैदा हुई थी और 2013 में यह आंकड़ा 4 लाख 19 हजार से अधिक रहा.

वहीं प्रति वर्ष लगभग 1 करोड़ नए लोग देश में नौकरी लेने के लिए कतार में खड़े हो जाते हैं. इस चुनौती के चलते बजट 2018-19 मोदी सरकार के लिए आखिरी मौका है जहां वह इस समस्या का हल निकालने की कवायद कर सकते हैं. माना जा रहा है कि केन्द्र सरकार श्रम युक्त सेक्टर में नई नौकरियां सृजन करने पर कंपनियों के लिए नए इन्सेंटिव का ऐलान भी कर सकती है जिससे वह ज्यादा से ज्यादा नौकरियां सृजन करने का काम करें.

 

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें

सरकार की एक बड़ी समस्या कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर है. 2014 में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तब कच्चे तेल के नरम भाव ने मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था की खुशहाली के पक्के इंतजाम किए थे. 2014-15 में कच्चे तेल का सालाना औसत भाव 84.16 डॉलर प्रति बैरल था. 2015-16 में यह गिरा और फिर कुछ और गिरकर 45.17 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया.

2016-17 में इनमें बढ़ोत्तरी हुई. ये बढ़कर 47.56 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा. 2017-18 में अब तक इन भावों का औसत रहा है 54.17 डॉलर प्रति बैरल. एक आशंका यह है कि कच्चा तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर तक जा सकता है. अगर यह आशंका सच साबित होती है, तो फिर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत समस्याएं आनी हैं.

 

किसानों को मिले अच्छी कीमत

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बजट सत्र के अपने अभिभाषण में कहा कि उनकी सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने पर काम कर रही है. लेकिन यह आमदनी दोगुनी कैसे होगी, यह सवाल खासा महत्वपूर्ण है.

किसानों की आमदनी दोगुनी करने के मुद्दे पर सरकार ने एक कमेटी बनाई है जिसका नाम है-दलवई कमेटी. उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आमदनी दोगुनी करने के लिए ये कारक महत्वपूर्ण हैं- एक विकसित मार्केटिंग व्यवस्था, जिससे किसान को नवीनतम जानकारियां मिल पाएं. एकीकृत बाजार हो. बेचने के माध्यम अधिक से अधिक से हों. ये कैसे हासिल हों, इस सवाल का जवाब इस बजट को देना है. किसान फसल उपजा भी ले, पर उसके अच्छे भाव ना मिलें, तो किसान की सफलता एक तरह से नकारात्मक ही साबित होती है.

 

गांवों और खेती में दिखे विकास की चमक

साल 2014 में देश में सरकार बनाने के बाद मोदी सरकार ने गांवों के विकास की बात की थी. सरकार ने गांवों में विकास की धारा पहु्ंचाने के लिए सांसद आदर्श ग्राम योजना शुरू की थी. प्रधानमंत्री ने विज्ञान भवन में हुए बड़े समारोह में आदर्श ग्राम योजना का शुभारंभ किया था. इस योजना का लक्ष्य था कि 2019 तक सभी सांसद अपने क्षेत्र के 3 गांवों को आदर्श ग्राम बनाएंगे.

लेकिन समय बीतते ही यह योजना खटाई में चली गई. एक साल तक तो सांसदों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन इसके बाद यह योजना भी धूमिल हो गई. गांवों और खेती में विकास की वह चमक देखने को नहीं मिल रही है जो चमक कमोबेश शहरी इलाकों में देखने को मिल जाती है.

खेती किसानी के आंकड़े यह हैं कि 2017-18 के दौरान कृषि में सिर्फ 2.1 प्रतिशत के विकास की संभावना है. 2017-18 में समूची अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.5 प्रतिशत रहने की संभावना है. यह विकास दर ही कम मानी जा रही है खेती की विकास दर तो इसकी भी एक तिहाई से कम है.

संकेत साफ हैं कि खेती किसानी अर्थव्यवस्था के साथ चल नहीं पा रही है. किसानों को उनकी उपज के सही भाव नहीं मिल पा रहे हैं. किसान हताशा में धरने प्रदर्शन कर रहे हैं. कई बार ये हिंसक भी हो जाते हैं. पर समस्या का हल मिल नहीं रहा है. कृषि मंत्री ने भी संसद में स्वीकार किया कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है. यानी सरकारी व्यवस्थाएं कागज पर चौकस हैं, जमीन पर उन्हें अभी भी ठोस तरीके से उतरना बाकी है.

 

राजस्व कर बढ़ाना मुख्य चुनौती

मोदी सरकार ने पिछले साल जुलाई में देश में नई टैक्स नीति जीएसटी लागू की है. अनुमान था कि जीएसटी आने के बाद राजस्व कर में बढ़ोत्तरी होगी लेकिन अभी तक का रिकॉर्ड देखें तो जीएसटी से सरकार को कुछ खास राजस्व प्राप्त नहीं हुआ है. दिसंबर और जनवरी महीने की 24 तारीख तक सरकार ने 86,703 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया है.

जीएसटी कलेक्शन में करीब दो महीनों बाद तेजी देखने को मिली है. हालांकि इसके बाद भी चुनौती बनी हुई है. ऐसे में सरकार इस बजट में कर से अपनी आय बढ़ाने पर फोकस कर सकती है.

 

तीन तलाक के अलावा भी महिलाओं की उम्मीदें

बजट 2018 से महिलाओं कि भी खासी उम्मीदें हैं. इस बजट सत्र में तीन तलाक के अलावा भी कुछ बेसिक जरूरतें हैं जिन पर महिलाओं का ध्यान हैं. पिछले बजट में सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए 'निर्भया फण्ड' कि घोषणा कि थी, पर आज भी स्तिथि में कोई बदलाव नही देखा का सकता है. स्तिथि पहले कि ही जैसे है. पैसे की कमी और समायोजित प्लानिंग का न होना इसकी असफलता का एक बड़ा कारण है.

सरकार एक तरफ जहां सफाई और स्वास्थ्य को प्रमोट कर रही है, ऐसे में सेनेटरी नैपकिन्स से जीएसटी को हटाना चाहिए जिसके कि हर महिला तक इसकी पहुच बनाई जा सके. महिलाओं को कुछ टैक्स रिबेट भी मिलनी चाहिए. महिलाएं परिवार के खर्चों के लिए जिम्मेदार हैं अगर वे कर लागू करना चाहते हैं, तो वे इसे लक्जरी वस्तुओं पर कर सकते हैं, दैनिक वस्तुओं पर नहीं.

मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान

मानसिक स्वास्थ्य हमारे देश का सबसे उपेक्षित क्षेत्र है. अधिकांश पश्चिमी देशों में मानसिक स्वास्थ्य पर बजट का 4 प्रतिशत खर्च होता है जबकि भारत में केवल 0.4 प्रतिशत खर्च किया जाता है. अधिकांश सेवाएं निजी तौर पर संचालित होती हैं और कोई भी सरकारी निगरानी या दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है. सरकार को एक विस्तृत मानसिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के लिए बहुत अधिक धनराशि आवंटित करनी चाहिए.

First published: 29 January 2018, 13:28 IST
 
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