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क्या भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था 8 से 10 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकती है?

नीरज ठाकुर | Updated on: 29 February 2016, 8:06 IST

वर्ष 2016-17 के लिये भारत की आर्थिक समीक्षा में देेश के दीर्घकालिक विकास के 8 से 10 प्रतिशत की दर से वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है.

यह दर बीते दो दशकों से देश के विभिन्न वित्तमंत्रियों के लिये सपने की तरह रही है. वर्ष 2007-08 के दौरान सिर्फ पी चिदंबरम ऐसे वित्तमंत्री रहे जो इस आंकड़े पास उस समय पहुंचने में सफल रहे थे. तब भारत 9.6 प्रतिशत की दर से विकास कर रहा था.

हालांकि इसके बाद से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट का निरंतर दौर जारी है जिससे भारत भी अछूता नहीं रहा है. इसी गिरावट का नतीजा है कि भारत वर्तमान में 7 से 7.5 प्रतिशत के बीच की विकास दर तक सीमित रहा है और यह आंकड़ा भी विवादों से अछूता नहीं रहा है.

10 फीसदी की विकास दर बीते दो दशकों से देश के विभिन्न वित्तमंत्रियों के लिये सपने की तरह रही है


मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन द्वारा तैयार किये गए आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं के दम पर भारत के लिये दो अंको वाली विकास दर हासिल करना असंभव नहीं है. इनकी मदद से भारत तेजी से अपने विकास को गति देते हुए जल्द ही चीन को कड़ी टक्कर दे सकता है, जो लोकतंत्र की गैरमौजूदगी के चलते समय के साथ पीछे छूटता जा रहा है.

क्या लोकतंत्र वास्तव में आर्थिक विकास का प्रमुख कारक होता है?


जिन अर्थशास्त्रियों से कैच न्यूज ने बातचीत की उनका मानना है कि किसी भी देश के आर्थिक विकास और लोकतंत्र के बीच कोई सीधा ताल्लुक नहीं है.

सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च में वरिष्ठ फैलो राजीव कुमार कहते हैं, ‘‘कई देश जिनमें लोकतंत्र नहीं है वे भी विकास करने मे कामयाब रहे हैं जिससे स्पष्ट है कि आर्थिक विकास किसी एक विशेष राजनीतिक व्यवस्था या फिर संस्थागत ढांचे पर निर्भर नहीं है.’’

कुमार आगे बताते हैं, ‘‘उदाहरण के लिये आप चीन या ताईवान जैसे देशों को ले सकते हैं. इन दोनों ही देशों की राजनीतिक व्यवस्था के बावजूद प्रति व्यक्ति आय में बहुत उच्च वृद्धि दर्ज हुई है.’’

आॅक्सस रिसर्च एंड इन्वेस्टमेंट्स के प्रबंध निदेशक सुरजीत भल्ला का भी मानना है कि, ऊंची विकास दर के लिए लोकतंत्रिक अर्थव्यस्था को प्रोत्साहन देना जरूरी है, दरअसल अतिश्योक्ति है.

भल्ला कहते हैं, ‘‘इस विषय पर पर्याप्त अनुभवजन्य साक्ष्य उपलब्ध हैं. आप इंडोनेशिया, सिंगापुर या चीन की तानाशाही की तुलना अफ्रीका या लैटिन अमरीका जैसे लोकतंत्रों के साथ कर सकते हैं. लोकतंत्र के मुकाबले तानाशाही अधिक विकास करने में सफल रही है.’’

ऊंची विकास दर के लिए लोकतंत्रिक अर्थव्यस्था को प्रोत्साहन देना जरूरी है, दरअसल अतिश्योक्ति है


पूर्व योजना आयोग के सदस्य रहे अभिजीत सेन भी मानते हैं कि सिर्फ लोकतंत्र के आधार पर उच्च विकास दर को पाना बहुत मुश्किल है.

इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट आॅफ डेवलपमेंटल रिसर्च में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर आर नागराज लोकतंत्र और आर्थिक विकास को लेकर छोटा सा जवाब देते हैं, ‘‘लोकतंत्र और आर्थिक विकास के बीच संबंध को लेकर अस्पष्टता है. हो सकता है कि बेहद मजबूत और अलोकतांत्रिक देश उच्च विकास दर पाने में सफल रहें लेकिन ऐसी व्यवस्था कई बार बिल्कुल क्षणिक भी होती है जबकि लोकतंत्र कहीं बेहतर और संवेदनशील तरीके से असहमति और आलोचनाओं का सामना करते हुए राष्ट्रीय विकास के एजेंडा पर आम सहमति बनाने में मदद करता है. नतीजतन लोकतंत्र टिकाऊ और न्यायोचित अर्थिक विकास को पाने की कुंजी है.’’ हालांकि वे भी आर्थिक सर्वेक्षण के ‘‘लोकतंत्रिक उच्च आर्थिक वृद्धि’’ के तर्क से सहमत नहीं हैं.

दो अंकों की स्थायी विकास दर हासिल करने का क्या तरीका है?

सेन कहते हैं, ‘‘आखिरी बार भारत 10 प्रतिशत की विकास दर को पाने के सबसे नजदीक तब आया था जब भारत की पूंजी निर्माण दर 35 प्रतिशत और घरेलू बचत 34 प्रतिशत थी. हाल के दिनों में यह दोनों ही लगातार नीचे की तरफ आये हैं जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने समस्याएं खड़ी हुई हैं.’’

वे आगे कहते हैं कि ऐसे माहौल को तैयार करना जिसमें कंपनियां अधिक निवेश करने के लिये प्रोत्साहित हों इस समस्या को दूर करने का एकमात्र तरीका है.

सेन का कहना है कि एक बड़ी संख्या में नकदी नाॅन परफाॅर्मिंग एसेट्स (एनपीए) के रूप में फंसी पड़ी है और इस गतिरोध से पार पाने के लिये सरकार को कुछ कंपनियों को बंद करने जैसे कड़े कदम उठाने पड़ेंगे.

सितंबर 2015 तक भारतीय बैंकिंग के क्षेत्र में 3.15 लाख करोड़ रुपये की राशि की पहचान एनपीए के रूप में की जा चुकी थी. हालांकि अगर इस संख्या मे पुनगर्ठित ऋण को भी जोड़ लिया जाए तो यह रकम बढ़कर 10 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो जाती है.

सेन कहते हैं, ‘‘फंसे हुए पैसे को दोबारा बाजार में आने देने के लिये सरकार को कुछ कंपनियों और परियोजनाओ को बंद करने के बारे में सोचना ही होगा.’’

से 10 प्रतिशत की विकास दर को हासिल करने के लिये भारत को अपनी निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार लाना होगा

कुमार का कहना है, ‘‘8 से 10 प्रतिशत की विकास दर को हासिल करने के लिये भारत को अपनी निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार लाना होगा. दुनिया का कोई भी देश निर्यात के एक बड़े केंद्र के रूप में स्वयं को स्थापित किये बिना इस प्रकार की विकास दर को पाने में सफल नहीं हुआ है.’’

एनडीए की सरकार के कार्यकाल में भारतीय निर्यात के क्षेत्र को भारी मंदी के दौर से गुजरना पड़ा लेकिन इस बार तो मंदी का यह दौर बीते 14 महीनों से लगातार जारी है. 2008 में आई वैश्विक अर्थिक मंदी के बाद भारतीय निर्यात नौ महीनों की गिरावट के बाद संभलने में कामयाब रहा था.

हालांकि भारत सरकार निर्माण के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के प्रयासों के तहत मेक इन इंडिया कार्यक्रम के साथ सामने आई है लेकिन यह भी निवेशकों को लुभाने में नाकामयाब ही रहा है. भारत सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार 2015 के जनवरी से दिसंबर के मध्य ही नए निवेश के प्रस्तावों में 23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.

भल्ला का कहना है कि सरकार को कई वर्षों से अधर में लटके हुए वस्तु एवं सेवा कर बिल (जीएसटी) को अविलंब लागू करना चाहिये. लेकिन मौजूदा राजनीतिक स्थितियों पर नजर डालें तो सरकार के लिये ऐसा कर पाना लगभग नामुमकिन ही लगता है.

जबतक सरकार देश के लोकतांत्रिक ढांचे के बीच इस सभी परिवर्तनों को लाने में कामयाब नहीं होती तब तक इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि देश मौजूदा 7 प्रतिशत की दर वाली अर्थव्यस्था से 10 प्रतिशत प्लस वाली अर्थव्यवस्था में तब्दील हो पाएगा.
First published: 29 February 2016, 8:06 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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