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महाराष्ट्र में होंगे मुंबई-पुणे जैसे कई दूसरे कारोबारी केंद्र

अश्विन अघोर | Updated on: 15 January 2016, 8:28 IST
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र सरकार मुंबई-पुणे के अलावा राज्य के कई दूसरे टीयर-2 और टीयर-3 शहरों को विदेशी निवेश के लिए तैयार करने की योजना बना रही है.
  • राज्य के कुछ कारोबारी सरकार की इस योजना को लेकर आशावान हैं तो कुछ को लगता है कि सरकार बस बड़े बड़े दावे कर रही है.

मुंबई-पुणे इलाक़ा महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है लेकिन अब इस इलाक़े में विकास का पहिया थमता नज़र आ रहा है. चाहे वो ज़मीन हो, जनसंख्या हो या बुनियादी ढांचा इस इलाक़े में सभी पर बहुत ज्यादा दबाव है.

इस दबाव का असर रोजमर्रा के शहरी जीवन और उद्योग-धंधों पर भी नज़र आने लगा है. हाल ही में कई उद्योग गुजरात या दूसरे राज्यों में चले गये.

राज्य सरकार से यहां के दूसरों शहरों को भी कारोबारी केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग लंबे समय से हो रही है. अब जाकर सरकार ने इसकी सुध ली है.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस का दफ्तर राज्य के टीयर-2 और टीयर-3 शहरों की सूची बना रहा है. राज्य सरकार फरवरी के पहले हफ़्ते में होने वाले 'मेक इन इंडिया वीक' में इन शहरों को विदेशी निवेश परियोजनाओं के लिए अनुकूल शहरों के रूप में पेश करेगी. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 फ़रवरी को मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में इसका उद्घाटन करेंगे.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 फ़रवरी को मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में मेक इन इंडिया वीक का उद्घाटन करेंगे

अपनी योजना को सार्वजनिक करते हुए फणनवीस ने कहा, "हम राज्य में होने वाले मेक इन इंडिया सप्ताह के दौरान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के तहत अधिक से अधिक निवेश अपने यहां लाना चाहते हैं. शहरों और क्षेत्रों को चिह्नित करने का काम पहेल ही शुरू हो चुका है. हमने इसके लिए कोर कमेटी भी बनायी है."

फणनवीस के मुख्यमंत्री बनने के बाद से महाराष्ट्र में 66 हज़ार करोड़ रुपये का विदेशी निवेश हुआ है. भारत में निवेश करने में रूस, जर्मनी, चीन, अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड और जापान जैसे देश शामिल हैं.

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फणनवीस ने बताया, "महाराष्ट्र विदेशी निवेशकों के बीच सबसे लोकप्रिय है. फॉक्सकॉन, जनरल मोटर्स, माइक्रोसॉफ्ट, क्राइसलर, ब्लैकस्टोन, शिंडलर और कोका कोला जैसी कंपनियों ने मुंबई-पुणे कॉरिडोर में स्थित अपने प्लांटों के लिए राज्य सरकार के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किया है. इनमें सबसे बड़ा निवेशक फॉक्सकॉन है. उसने 35 हज़ार करोड़ का निवेश किया है. अब वक़्त टीयर-2 और टीयर-3 शहरों को कारोबारी केंद्र के रूप में विकसित करने का है."

औरंगाबाद, नासिक, नागपुर, जलगांव, अमरावती, सोलापुर, थाणे और नवी मुंबई इस योजना का हिस्सा हैं. राज्य सरकार इन सभी शहरों और क़स्बों को निर्माण, ऑटोमोबाइल, रक्षा, एयरोस्पेस, सूचना प्रोद्यौगिकी, टेक्सटाइल और फूड प्रोसेसिंग के संभावित केंद्र के रूप में पेश करेगी.

प्रस्तावित मुंबई-औरंगाबाद-नागपुर सुपर एक्सप्रेसवे इस पूरी योजना में अहम भूमिका निभाएगा.

राज्य के एक वरिष्ठ नौकरशाह ने कैच को बताया, "एक्सप्रेसवे का काम पूरा हो जाने के बाद मुंबई और नागपुर के बीच 800 किलोमीटर लंबी दूरी महज 12 घंटे में तय की जा सकेगी. इससे मुंबई और दूसरे शहरों के बीच सामान की आवाजाही आसान हो जाएगी."

मुंबई-औरंगाबाद-नागपुर सुपर एक्सप्रेसवे बनने के बाद मुंबई और नागपुर के बीच 800 किमी की दूरी महज 12 घंटे में तय की जा सकेगी

सरकार के लिए इस योजना को अमलीजामा पहनाना आसान नहीं होगा. राज्य के अधिकारी भी इसे स्वीकार करते हैं. वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, "सरकार को इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचे का विकास करना होगा ताकि निवेशक आकर्षित हों. इसमें वक़्त लगेगा. भूमि अधिग्रहण सबसे मुश्किल काम है. टीयर-2 और टीयर-3 हमें एक नई औद्योगिक नीति भी बनानी होगी."

विदेशी निवेश के मामले में महाराष्ट्र को मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक और राजस्थान से कड़ी टक्कर मिल रही है. इन राज्यों ने पहले से ही इससे जुड़ी उदार आर्थिक नीति बना रखी है.

वरिष्ठ नौकरशाह कहते हैं, "इन राज्यों में भूमि अधिग्रहण काफी आसान है और बिजली भी सस्ती है. महाराष्ट्र की नई औद्योगिक नीति में इन दोनों बातों का विशेष ध्यान रखना होगा."

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महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने कहा कि राज्य को इस पूरी प्रक्रिया को किफायती बनाना होगा क्योंकि राज्य में ज़मीन के लिए दिया जाने वाला मुआवज़ा केंद्र सरकार द्वारा तय दर से करीब पांच गुना ज्यादा है.

देसाई ने कहा, "हम राज्य के किसी भी हिस्से में निवेश लाने के लिए मददगार किसी भी तरह के सुझाव का स्वागत करेंगे."

कुछ एंटरप्रेन्योर ने राज्य सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है. मुंबई स्थित कारोबारी सुनील जोशी कहते हैं, "मुंबई के आसपास के इलाक़े नए कारोबार के लिहाज से सैचुरेट हो चुके हैं. मझगांव डॉक और जवाहरलाल नेहरू पोर्ट के कारण हर कोई मुंबई के करीब रहना चाहता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में हालात काफी बदल गए हैं. वक़्त की सख्त जरूरत है कि अब छोटे शहरों को कारोबारी केंद्रों के रूप में विकसित किया जाए."

डीएस कुलकर्णी को लगता है कि सरकार के पास कारोबार की बुनियादी जरूरतों को समझने की सलाहियत ही नहीं है

जोशी कहते हैं, "मैं ख़ुशी-ख़ुशी नागपुर, औरंगाबाद जैसे किसी शहर में जाने के लिए तैयार हूं बशर्ते वहां से 10-12 घंटे में मुंबई से गुड्स ट्रांसपोर्ट करना संभव हो."

लेकिन सभी कारोबारी इस योजना को लेकर उत्साहित नहीं हैं. डीएसके ग्रुप के डीएस कुलकर्णी को लगता है कि सरकार के पास कारोबार की बुनियादी जरूरतों को समझने की सलाहियत ही नहीं है.

कुलकर्णी कहते हैं, "सरकार लंबे लंबे वादे कर रही है. ये केवल निवेशकों को बेवकूफ बनाने की कोशिश है. एक कारोबारी के रूप में मुझे कुशल श्रमिकों, अच्छे बुनियादी ढांचे और बंदरगाह से करीबी जरूरी है. मेरा सामान बंदरगाह तक पांच घंटे के अंदर पहुंचना जरूरी होता है. आयातित कच्चा माल भी इतने ही देर में मेरे कारखाने तक पहुंच जाना चाहिए. सरकार को औरंगाबाद, नागपुर और अमरावती जैसे शहरों में निवेश लाने के लिए पहले इन चीजों का विकास करना होगा."

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कुलकर्णी को लगता है कि राज्य सरकार को 100 किलोमीटर की दूरी पर क़स्बे विकसित करना चाहिए और उनके बीच 12-लेन का हाईवे बनाना होगा ताकि यातायात सुगम हो सके.

कुलकर्णी कहते हैं कि असली समस्या कुशल श्रमिकों की कमी है. वो कहते हैं, "मुझे अहमदनगर जैसी जगह पर दिक्कत होती है जो पुणे से केवल 150 किलोमीटर दूर है. इसकी वजह ये है कि अहमदनगर में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, जिसकी वजह से लोग कम तनख्वाह में भी पुणे में काम करना पसंद करते हैं."

First published: 15 January 2016, 8:28 IST
 
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