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छत्तीसगढ़: सरकारी अस्पतालों की कीमत पर निजी अस्पतालों को शह

शिरीष खरे | Updated on: 15 April 2016, 22:11 IST
QUICK PILL
  • छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने खर्चे से 452 प्राइवेट अस्पतालों को ईलाज के लिए अनुबंधित किया है. इनमें 151 प्राइवेट अस्पताल अकेले राजधानी रायपुर में हैं.
  • सरकार के आंकड़ों की मानें तो स्वास्थ्य क्षेत्र में गरीब परिवारों के लिए चलाई जा रही स्वास्थ्य बीमा योजना के जरिए कुल फंड का 70 प्रतिशत पैसा प्राइवेट अस्पतालों को भुगतान हो रहा है.
  • बड़े ब्रांडों के प्राइवेट अस्पताल सरकार की विभिन्न योजनाओं का सीधा फायदा पा रहे हैं. इस चक्कर में सरकारी अस्पतालों की स्थिति दिनोंदिन और बदतर होती जा रही हैै.

हाल फिलहाल में अगर हम छत्तीसगढ़ में हुए कुछ बड़े चिकित्सा हादसों की बात करें तो ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा. नवंबर, 2014 में बिलासपुर जिले में सामूहिक नसबंदी अभियान की गड़बड़ी में कई महिलाओं की मौत हो गई. इसके बाद बीमार तमाम महिलाओं को सरकारी अस्पताल की बजाय निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया. 

इसी तरह नक्सली हमलों में घायल जवानों का ईलाज भी अब निजी अस्पतालों में ही होता है. जैसे कि नारायणपुर और बीजापुर जिलों में हुईं कई मुठभेड़ों में घायल सैनिकों को रायपुर के निजी अस्पताल लाया गया.

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बात चाहे राज्य की स्वास्थ्य नीति की हो या किसी स्वास्थ्य योजना की, किसी बड़े हादसे के मरीजों का ईलाज हो, अफसर की मामूली जांच हो या किसी बच्चे के दिल का ऑपरेशन. इन सबके इलाज के लिए छत्तीसगढ़ सरकार प्राइवेट अस्पतालों का पता दिखा रही है. 

अच्छी स्वास्थ्य सेवा की आड़ में सरकार अपने बजट से करोड़ों रुपए प्राइवेट अस्पतालों पर खर्च कर रही है. छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के पूर्व संस्थापक सदस्य डॉ. वीआर रमन का कहना है, "यदि बड़े अधिकारी भी अपना ईलाज प्राइवेट में कराएंगे तो सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे और गलत संदेश जाएगा."

यदि बड़े अधिकारी भी अपना ईलाज प्राइवेट में कराएंगे तो सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे और गलत संदेश जाएगा

राज्य सरकार पर तमाम योजनाओं के जरिए प्राइवेट अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं. तथ्यों पर नजर फेरें तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 38 लाख से ज्यादा स्मार्टकार्ड जारी किए गए हैं. इस योजना में गरीब परिवार को 30 हजार रूपए तक का सालाना स्वास्थ्य बीमा किया जाता है.

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आकड़ों के मुताबिक रायपुर में इस बीमा योजना के तहत नामांकित 90 फीसदी लोग प्राइवेट अस्पतालों में अपना ईलाज कराते हैं. जाहिर है कि मरीजों की संख्या के अनुपात में सरकार बीमा कंपनी द्वारा प्राइवेट अस्पतालों को राशि भुगतान करा रही है. 

नतीजा यह कि अकेले बीमा योजना के मार्फत राज्य सरकार अपने फंड से 70 प्रतिशत पैसा हर साल प्राइवेट सेक्टर को भुगतान कर रही है

जन स्वास्थ्य सहयोग कार्यकर्ता डॉ. योगेश जैन के मुताबिक, "सरकार सरकारी पैसे के जरिए प्राइवेट का सेटअप खड़ा करवा रही है. दो साल पहले पीएससी की लैबों को प्राइवेट करने की कोशिश हुई थी, लेकिन विरोध के बाद सरकार ने ऐसा नहीं किया. 

एक गरीब राज्य में नित नए और बड़े प्राइवेट अस्पताल खुलते जा रहे है और सरकारी खजाने से जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा जिस तरह प्राइवेट अस्पतालों पर लुटाया जा रहा है उससे सेहत का बड़ा बाजार तैयार हो गया है."

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पूरे छत्तीसगढ़ में ऐसे प्राइवेट अस्पतालों की संख्या है 452. योजनाओं के तहत मरीजों को ईलाज के लिए तरह-तरह से प्राइवेट अस्पतालों में भेजा जा रहा है. नतीजा यह कि अकेले बीमा योजना के मार्फत राज्य सरकार अपने फंड से 70 प्रतिशत पैसा हर साल प्राइवेट सेक्टर को भुगतान कर रही है.

अहम बात है कि राज्य सरकार के अनुबंधित ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल शहरों में ही हैं. जैसे 151 प्राइवेट अस्पताल अकेले राजधानी रायपुर और 81 बिलासपुर में है. वहीं, नारायणपुर और बेमेतरा में एक-एक, जशपुर और कोरिया में दो-दो, मुंगेली, कोण्डागांव और बस्तर में तीन-तीन और सुकमा जैसे पिछड़े इलाकों में महज छह प्राइवेट अस्पताल अनुबंधित हैं. 

इस बारे में स्वास्थ्य क्षेत्र की कार्यकर्ता सुलक्षणा नंदी का मत है, "जब सबकुछ प्राइवेट में होगा तो कोई डॉक्टर सरकारी में काम क्यों करेगा. प्राइवेट अस्पताल गांव नहीं जाएंगे तो पूरी व्यवस्था व्यापारिक हो जाएगी और ग्रामीणों के साथ गरीब भी बाहर हो जाएंगे."

बाल हृदय सुरक्षा योजना के तहत राज्य सरकार छोटे बच्चों को हृदय संबंधित गंभीर बीमारियों से मुक्ति दिलाती है. यह योजना भी चार बड़े प्राइवेट अस्पतालों के भरोसे चलती है. सवाल है कि राज्य सरकार जितना पैसा प्राइवेट पर खर्च करती है उससे सरकारी अस्पताल में ही बाल हृदय चिकित्सा विभाग नहीं बना सकती. 

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विशेषज्ञों के मुताबिक राज्य के बाहर कई राज्यों में यह सुविधा मुहैया है. जितना पैसा सरकार लगातार खर्च कर रही है, करीब उतना ही खर्च करके सरकारी अस्पतालों में हृदय चिकित्सा विभाग की व्यवस्था बनाई जा सकती है.

खास तौर पर पैरामेडिकल और मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देना चाहिए. सरकार के पास अकेले प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए पर्याप्त संसाधान नहीं हैं

छत्तीसगढ़ की तीन चौथाई आबादी गांवों में रहती है, जिसका बड़ा हिस्सा सड़क मार्ग से नहीं जुड़ा है, लिहाजा सेहत की सरकारी योजनाओं को प्राइवेट अस्पतालों के जरिए चलाया गया तो एक बड़े तबके की स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहने की आशंका बढ़ जाती है.

दूसरी समस्या यह है कि निजी अस्पतालों का एक मकसद मुनाफा कमाना होता है और इसीलिए गांव उनकी वरीयता सूची से बाहर भी है. छत्तीसगढ़ राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र के कार्यकारी डायरेक्टर प्रबीर चटर्जी तहते हैं, "प्राइवेट पर खर्च करने से प्राइवेट का तो प्रचार होगा, लेकिन सरकारी अस्पताल पीछे छूटते जाएंगे."

दूसरी तरफ, प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अजय चंद्राकर का कहना है, "व्यक्तिगत तौर पर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में निजीकरण के पक्ष में हूं. खास तौर पर पैरामेडिकल और मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देना चाहिए. सरकार के पास अकेले प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने के लिए पर्याप्त संसाधान नहीं हैं. प्राइवेट अस्पतालों को शामिल करने से राज्य का स्वास्थ्य सुधरेगा."  

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एक सरकारी डॉक्टर यदि प्राइवेट अस्पताल से जुड़े तो यह परेशानी की वजह मानी जाती है. कहा जाता है कि वह पैसा सरकार से लेता है तो काम प्राइवेट का कैसे कर सकता है. दलील दी जाती है कि जनता की सेहत के लिए उस डॉक्टर का पूरा ध्यान सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर ही रहना चाहिए. 

इसके बावजूद छत्तीसगढ़ सरकार खुद ही पूरी तरह प्राइवेट अस्पतालों की शरण में चले जाने की तैयारी कर चुकी है.

First published: 15 April 2016, 22:11 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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