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चीन के स्टॉक मार्केट में गिरावटः भारत के लिए मौका भी और मुसीबत भी

नीरज ठाकुर | Updated on: 11 January 2016, 8:12 IST
QUICK PILL
  • यह सप्ताह वैश्विक शेयर बाजारों में व्यापार के लिए भयानक साबित हुआ. इस दौरान दुनिया भर के निवेशकों के 1,67,500 अरब रुपये डूब गए.
  • यह माना जा रहा था कि दुनिया के शेयर बाजारों बहुत अस्थिरता बढ़ती जा रही है जिससे पैसों का नुकसान होता है.

यह सप्ताह वैश्विक शेयर बाजारों के लिए भयानक साबित हुआ. इस दौरान दुनिया भर के निवेशकों के 1,67,500 अरब रुपये डूब गए.

बृहस्पतिवार 7 जनवरी को चीनी शेयर बाजार में तबाही की प्रतिक्रिया में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज 500 अंक गिरते हुए 52 सप्ताह के निचले स्तर 28,825 पर पहुंच गया. चार सत्रों में चीन में दूसरी बार ट्रेडिंग को रोक दिया गया. शंघाई कंपोजिट सूचकांक भी 7.32 फीसदी यानी 245.95 अंक गिरावट के साथ 3,115.89 के स्तर पर पहुंच गया. 

जुलाई और अगस्त 2015 में भी चीन के बाजार में इसी तरह की गिरावट ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ाने में देरी के लिए मजबूर किया था. यह माना जा रहा था कि दुनिया के शेयर बाजारों में बहुत अस्थिरता बढ़ती जा रही है जिससे नुकसान होता है.

इसके बावजूद दुनिया भर के बाजारों में शुक्रवार को गिरावट देखने को मिली. यह समझना महत्वपूर्ण है कि क्यों चीनी बाजार में झटका आया और क्या यह आने वाले वक्त में भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.

विकास का चीनी मॉडल

इन वर्षों में चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात के दम पर तेजी से आगे बढ़ी है. हालांकि, वैश्विक मंदी के कारण उन्हें अब निर्यात से मदद नहीं मिल रही है. चीन के ऊपर निजी और सार्वजनिक क्षेत्र का 18,76,000 अरब रुपये का ऋण है. 

चीन को यह बात समझ में आ चुकी है कि घरेलू खपत के भरोसे अर्थव्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है

हालांकि चीन की सरकार ने अपने उत्पादों के लिए घरेलू मांग बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन खपत बढ़ाने के लिए लोगों में पर्याप्त क्रय शक्ति न होने से वह बुरी तरह विफल रही है. 1983 में 56 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच चुके घरेलू क्षेत्र (मजदूरी, वेतन और खपत) की मौजूदा वक्त में चीन के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 36 फीसदी हिस्सेदारी है.

चीन को यह बात समझ में आ चुकी है कि घरेलू खपत के भरोसे अर्थव्यवस्था को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है. इसलिए उसने अपने निर्यात को और अधिक सस्ता बनाने का फैसला किया है. इसी रणनीति के तहत चीन के केंद्रीय बैंक ने बृहस्पतिवार को अपनी मुद्रा युआन का एक बार फिर से अवमूल्यन करते हुए उसकी कीमतें 0.5 फीसदी तक घटा दीं. इसके बाद युआन मार्च 2011 के बाद से सबसे निचले स्तर पर जा चुका है. 

दुनिया में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की मांग में कमी की वजह से मंदी जैसी स्थिति बन रही है. ऐसे में युआन की कीमत घटाने के फैसले से दुनिया की सभी मुद्राओं पर दबाव बनेगा. खासकर एशिया की उन सभी अर्थव्यवस्थाओं पर जिनकी चीन से सीधी प्रतिस्पर्धा है.

खतरे की घंटी

तो क्या युआन की कीमतों में 0.5 फीसदी की कटौती बाजारों के लिए खतरे की घंटी है? या फिर यह मुद्रा युद्द का संकेत है. 

भारत की वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण चीन के इस फैसले के बाद सतर्क हो चुकी हैं. शुक्रवार को काउंसिल फॉर ट्रेड, डेवलपमेंट एंड प्रमोशन की पहली बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, "युआन के अवमूल्यन से निश्चित तौर पर चीन से आने वाले सामान की कीमतें सस्ती होंगी. सच्चाई यह है कि हमारा घाटा चीन की मजबूती के साथ बढ़ेगा."

2014-15 में भारत और चीन के बीच का कुल कारोबार 4844 अरब रुपये का रहा था और व्यापार घाटा 3283 अरब रुपये का.

कुछ पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने पहले से ही मुद्रा युद्ध का अंदेशा जताना शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि चीन की तरफ से अपनी मुद्रा को सस्ता किए जाने के बाद अन्य देशों पर भी अपनी मुद्रा की कीमत गिराने का दबाव होगा ताकि वह अपने निर्यात को बनाए रख सकें.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन की प्रोफेसर अल्का आचार्य के मुताबिक स्थिति उतनी भी खराब नहीं हुई है. उन्होंने कहा, "युआन को सस्ता किए जाने का असर कुछ अर्थव्यवस्थाओं पर निश्चित तौर पर दिखेगा. लेकिन यह कहीं से भी खतरे की घंटी नहीं है. करेंसी वार का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता."

2014-15 में भारत और चीन के बीच का कुल कारोबार 4844 अरब रुपये का रहा था और व्यापार घाटा 3283 अरब रुपये का

जेएनयू के सेंटर फॉर ईस्ट एशियन स्टडीज के प्रो. श्रीकांत कोंडापल्ली कहते हैं कि चीन के स्टॉक मार्केट में आई गिरावट की एक बड़ी वजह जून 2014 से जून 2015 के बीच आई तेजी है. इस अवधि में चीन के स्टॉक मार्केट में 150 फीसदी की तेजी आई और अब निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं. 

भारत के लिए मौका

जेएनयू में इंटरनेशनल ट्रेड के प्रो. मनोज पंत बताते हैं, "चीन के स्टॉक मार्केट में आई गिरावट भारत के लिए अच्छा संकेत है. अगर निवेशक चीन के बाजार से पैसा बाहर निकाल रहे हैं तो वे इसे किसी और बाजार में जरूर लगाएंगे. चीन के उलट भारत का अपना बड़ा घरेलू बाजार है. अगर भारत सात फीसदी की दर से आगे बढ़ना जारी रखता है तो इस पैसे का एक हिस्सा निश्चित तौर पर भारत में आएगा."

उन्होंने कहा, "भारत को चीन से आने वाले निवेश को इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाने के बारे में सोचना चाहिए. इंफ्रास्ट्रक्चर में होने वाले निवेश से नौकरियां मिलेंगी और बड़े पैमाने पर भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी."

First published: 11 January 2016, 8:12 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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