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खेत संकट पर बोले नाबार्ड प्रमुख: ऋण प्रवाह में नहीं हुआ सुधार

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 26 January 2016, 20:18 IST

कृषि क्षेत्र ने इस साल खराब प्रदर्शन किया. बेमौसम बारिश और कम से कम 10 राज्यों में सूखे के कारण खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई. इस गंभीर संकट ने पंजाब जैसे ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध राज्यों में भी किसानों को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया. 

किसानों की आत्महत्या के प्रमुख कारणों में से एक बढ़ता ऋण है. बैंकों और राज्य संस्थानों से आसान ऋण के अभाव में किसानों को साहूकारों से कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है. इन ऋणों पर इतना ज्यादा ब्याज होता है कि किसानों द्वारा इसको चुकाना लगभग असंभव ही होता है, और जब उनकी फसल चौपट हो जाए तब तो वो कभी चुकाने के बारे में सोच भी नहीं सकते.

ऐसे संकट से छुटकारा दिलाने के लिए ही नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट या नाबार्ड बना है. प्राथमिक रूप से गांवों में वित्तीय सहायता देने वाले भारत के इस केंद्रीय बैंक का मुख्य कार्य विभिन्न कृषि गतिविधियों और ग्रामीण भारत के लिए अन्य शुरुआतों के लिए ऋण सहायता सुनिश्चित करना होता है.

जाहिर है कि नाबार्ड बैंक इनमें पीछे रह गया है. बैंक के चेयरमैन हर्ष कुमार भनवाला के साथ कैच संवादादाता विशाख उन्नीकृष्णन ने बात की.

2015-16 में कृषि ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया. आप के मुताबिक इसके लिए प्रमुख कारण क्या थे?

खरीफ खाद्यान्न उत्पादन जो एक सामान्य वर्ष में अनुमानित 130 मिलियन टन होता है, वर्ष 2015-16 में यह 124 मिलियन टन ही रहा. यह वर्ष 2014-15 में 126 लाख टन उत्पादन की तुलना में थोड़ा कम है.

इस वर्ष कृषि के खराब प्रदर्शन का मुख्य कारण सूखा था. बारिश की कमी लगातार दूसरे वर्ष खेती के लिए नुकसानदायक रही. मध्य दिसंबर 2015 तक उत्तर-पूर्व मानसून में 20 फीसदी जबकि दक्षिण-पश्चिम मानसून में 14 फीसदी की कमी रही. इसके साथ ही कुछ राज्यों में बाढ़ ने भी फसलों को क्षतिग्रस्त किया. 

कई विशेषज्ञों द्वारा तर्क दिया जाता है कि इस स्थिति ने फसल बीमा योजना में फेरबदल की तत्काल आवश्यकता है. वास्तव में कई किसानों तक अभी भी आसान ऋण की पहुंच नहीं हो पायी है. इसका क्या समाधान है?

कवरेज बढ़ाने के लिए फसल बीमा योजना में फेरबदल करने की जरूरत के बारे में कोई दो राय नहीं है. एनएसएसओ के 70वें दौर के परिणाम बताते हैं कि कृषि पर निर्भर परिवारों का बहुत छोटे सा हिस्सा अपनी फसलों का बीमा करवाता है. धान या गेहूं जैसी प्रमुख फसल उगाने वाले बमुश्किल 5 फीसदी घरों द्वारा बीमा करवाया जा रहा है. इसका मुख्य कारण जागरूकता का अभाव बताया गया था.

दूसरे मुद्दे के रूप में फसल बीमा भी शामिल है. इके तहत बिना ऋण वाले किसानों की कवरेज करना शामिल है. हमें एक साथ ही कवरेज के विस्तार की सार्वभौमिक योजना बनाने और फसल बीमा कवर के लिए किसानों को शिक्षित करने पर काम करना है. इनोवेशन के जरिये इसमें मदद की जा सकती है.

हमने इन बाधाओं से कुछ दूर करने के लिए कई इनोवेशन शुरू भी किए हैं. उदाहरण के लिए किसान क्रेडिट कार्ड और रुपे कार्ड ने एक बड़ी हद तक लेन-देन की लागत कम भी की है. इसके साथ ही इससे पूर्ण ब्याज लागत को कम करने में मदद भी मिली है.

स्वयं सहायता समूह और संयुक्त देयता समूह भी बैंकों और किसानों दोनों के लिए लेन-देन की लागत कम करने में मददगार साबित हुए हैं. इससे साथियों के दबाव और समूह की सक्रियता से बैंकों को उच्च वसूली का अतिरिक्त लाभ मिलता है.

किसान उत्पादक संगठनों या एफपीओ से (जो किसानों की उपज को एकजुट करने में सक्षम है) बाजार में किसानों की मोलतोल की शक्ति में सुधार और बेहतर कीमतें सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है.

हालांकि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

कृषि विकास को पुनर्जीवित करने में आपके हिसाब से प्रमुख चुनौतियां क्या हैं?

जमीन पर हर दिन बढ़ते दबाव के रूप में सबसे बड़ी चुनौती उत्पादकता बढ़ाने की है. हमारे पास एक सीमित जमीन है जिसे बढ़ाया नहीं जा सकता, तब भी इसी से बढ़ते उद्योगों और भारी तादाद में लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त उत्पादन की जरूरत है. चुनौती यह है कि हमारे पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादक क्षमता बरकरार रखते हुए यह कैसे किया जाए.

विभिन्न फसलों की कम अंतरराष्ट्रीय कीमतों जैसे आर्थिक कारकों की मुश्किल भी हमारे किसानों पर मार कर रही है. इसे दूर करने के लिए क्या किया जा सकता है?

अंतरराष्ट्रीय कीमतों का निर्धारण मांग और आपूर्ति की परस्पर क्रिया द्वारा होता है. जैसे घरेलू खपत की तुलना में चावल और गेहूं के रूप में प्रमुख खाद्यान्नों के हमारे निर्यात सीमित हैं. ऐसे में घरेलू सहायता वाले उपाय महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं.

इनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में समर्थन मूल्य के संचालन के कवरेज का विस्तार भी शामिल है. वर्तमान में कुछ राज्यों को छोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य से लाभ पाने वाले कृषि परिवारों की हिस्सेदारी बहुत कम है.

नाबार्ड ने इस स्थिति को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?

देखिए यह नाबार्ड का प्रमुख कार्य नहीं है. हालांकि हम हर संभव मंच पर इन मुद्दों के बारे में सभी हितधारकों को जानकारी से रूबरू कराते रहते हैं.

आपने नाबार्ड द्वारा "किसान उत्पादक संगठनों" के बनाने और उन्हें समर्थन के बारे में पिछले एक साक्षात्कार में उल्लेख किया था. वास्तव में यह कैसे मदद करेगा?

सबसे बड़ी चुनौती है कि किसान को पेशेवर बनाया जाए. जिससे वह खेती को रोजाना व्यस्त रहने वाले एक कार्य के रूप में नहीं बल्कि एक आर्थिक गतिविधि के रूप में समझे जो उसे आर्थिक रूप से समृद्ध बना सकती है. किसानों की गरिमा को इस तरह बढ़ाया जाना चाहिए ताकि वे अपने बच्चों में भी खेती को एक कैरियर के रूप में लेने की इच्छा पैदा कर सकें. दूसरे शब्दों में किसानों के आत्म-सम्मान की रक्षा की जाए और इसे बढ़ाया जाना चाहिए.

किसान के आत्म सम्मान को बढ़ाने का एक तरीका यह भी है कि उन्हें आर्थिक रूप से आजाद कर दिया जाए. यह तभी संभव हो सकता है जब खरीदारी और बिक्री के दौरान बाजारों में उनकी सौदेबाजी की शक्ति बेहतर बनाई जाए. 

राजग सरकार अनिवार्य रूप से भूमिहीन किसानों के लिए वित्त पोषण के अवसरों को खोलने के लिए एक "भूमि पट्टे पर देने का कानून" पर काम कर रही है. क्या इससे कृषि क्षेत्र को बढ़ावा मिल सकता है?

यह बहुत जरूरी है कि वास्तविक काश्तकारों समेत किसानों तक लाभ, योजनाएं और ऋण की पहुंच सुनिश्चित की जाए. सरकार, रिजर्व बैंक और नाबार्ड  की ओर से गंभीर प्रयासों के बावजूद काश्तकारों के लिए ऋण प्रवाह में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है.

इस बीच नाबार्ड संयुक्त देयता अवधारणा का लाभ उठा रहा है ताकि समूहों को बढ़ावा दिया जा सके. इसमें काश्तकारों को शामिल किया जा सकता है जिससे ऋण प्रवाह के लिए भूमि स्वामित्व संबंधी बाधाओं को कम किया जा सके.

मैं यहां कहना चाहूंगा कि गलत तरीके से भूमि रिकॉर्ड रखे जाने के कारण भूमि मालिकों को भी आसानी से ऋण नहीं मिल पाता. इसलिए भू-अभिलेखों का डिजिटाइजेशन एक प्राथमिकता होनी चाहिए.

क्या ब्याज दर सब्सिडी की योजना एक अच्छा विकल्प हो सकती है?

लोग इस तरह की योजनाओं के खिलाफ हैं हालांकि कुछ लोग आर्थिक सहायता की मांग कर रहे हैं. एक ऐसी ही योजना को लंबी अवधि का ऋण कहते हैं. वर्तमान में ब्याज सहायता अल्पकालिक फसल के ऋण के लिए ही उपलब्ध है.

वित्तीय समावेशन पर आरबीआई के कार्यकारी समूह ने दीपक मोहंती की अध्यक्षता में हाल ही में इसे चरणबद्ध ढंग से बाहर करने की सिफारिश की थी. कहा गया था कि आर्थिक सहायता से पूंजी निर्माण में कमी लाने के अलावा दुरुपयोग और धन के गलत जगह जाने की संभावना बढ़ जाती है. 

क्या आपको लगता है कि समर्थन मूल्य में वृद्धि करने से इस गंभीर स्थिति से निपटा जा सकता है?

किसानों के सामने आने वाली तमाम समस्याओं में से समर्थन मूल्य केवल का विशेष प्रकार की समस्या का ही समाधान है. इससे जमकर पैदावार होने की स्थिति में उनकी उपज के लिए न्यूनतम दरों की गारंटी सुनिश्चित की जाती है. हम विपणन को बढ़ावा देकर और जब तक दाम नहीं बढ़ जाते खाद्यान्न का स्टॉक करके इस मूल्य जोखिम से किसानों की रक्षा कर सकते हैं

और किसानों को बिना परेशानी के खाद्यान्न का स्टॉक रखने के लिए हम भंडारण सुविधाओं को बनाने में मदद कर रहे हैं. इसके अंतर्गत गोदामों में रखे उनके हिस्से से संबंधित स्टॉक पर ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड धारकों के लिए आर्थिक सहायता शामिल है. 

First published: 26 January 2016, 20:18 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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