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मिल बैठे हैं दो यार: गडकरी ने दिया पुराने साथी को 8000 करोड़ का ठेका

आदित्य मेनन | Updated on: 6 August 2016, 7:56 IST

हाल ही में 29 जुलाई को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राजस्थान और गुजरात में छह लेन का एक सड़क प्रोजेक्ट बनाने को लेकर आइडियल रोड बिल्डर्स (आईआरबी) को 2100 करोड़ रुपये का ठेका दिया है.

गडकरी के मंत्रालय के अधीन आने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की इस परियोजना के तहत उदयपुर से लेकर राजस्थान-गुजरात सीमा के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर 114 किलोमीटर के रास्ते को छह लेन का बनाया जाना प्रस्तावित है.

ठेका मिलने के बाद आईआरबी ने गौरवान्वित होते हुए कहा कि परियोजना की अगर बात की जाए तो आईआरबी के निर्माण आॅर्डर वाले बहीखाते में इस परियोजना की लागत अगले चार साल में बढ़ कर 10,000 करोड़ तक पहुंच सकती है. इसका फायदा यह होगा कि कम्पनी की निर्माण आॅर्डर बुक अगले तीन-चार सालों तक शानदार दिखेगी.

इस परियोजना सहित आईआरबी के पास कथित तौर पर निर्माण-संचालन-स्थानांतरण (बीओटी) आधारित 21 परियोजनाएं हैं. इनमें से 13 अभी निर्माणाधीन हैं.

गौरतलब है कि आईआरबी का उस व्यक्ति विशेष के साथ घनिष्ठ संबंध हैं, जिनका मंत्रालय उक्त प्राधिकरण को यह ठेके जारी करता है, यानी सड़क परिवहन राजमार्ग एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी के साथ.

गडकरी-आईआरबी संबंधः 3 तथ्य

पहला, गडकरी के पुत्र निखिल वर्ष 2009 से 2011 के बीच आईआरबी की एक सब्सिडरी कंपनी आइडियल एनर्जी प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के निदेशक रहे हैं और उनके इस कंपनी में शेयर हैं.

दूसरा, आईआरबी के संस्थापक दत्तात्रेय पांडुरंग महिष्कर ने ग्लोबल सेफ्टी विजन नामक एक फर्म के माध्यम से गडकरी के पूर्ति समूह को 164 करोड़ रुपए का ऋण दिया था.

तीसरा, टाइम्स आॅफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक आईआरबी और महिष्कर के पूर्ति समूह में 68.4 लाख के शेयर हैं. इस रिपोर्ट में 2010-11 के रिकाॅर्ड का उल्लेख है.

ये सारी बातें जगजाहिर हैं और न तो गडकरी और न ही आईआरबी ने कभी इस बारे में कोई आपत्ति जताई. महिष्कर ने पूर्ति समूह को 164 करोड़ के ऋण देने की बात स्वीकारी है तो गडकरी ने ऋण लेना स्वीकार कर उनकी बात पर मुहर लगा दी.

लेकिन दोनों ही पक्षों ने सफाई दी कि यह अतीत की बात है और ऐसा तब हुआ जब गडकरी किसी सार्वजनिक पद पर नहीं थे. जो कुछ भी हो, सच्चाई यह है कि गडकरी और महिष्कर परिवार के बीच आज भी व्यापारिक संबंध हैं जब गडकरी केंद्रीय मंत्री हैं.

आईआरबी की आइडियल एनर्जी प्रोजेक्ट्स लिमिटेड में एक पूर्णकालिक निदेषक गणेश माधव गडरे पूर्ति समूह की महत्वपूर्ण हस्ती हैं और पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड (पीपीएसएल) में नामित निदेशक हैं. वर्तमान में गडकरी के सुपुत्र निखिल पीपीएसएल के निदेशक हैं.

क्या सड़क और राजमार्ग मंत्री के परिवार का देश की अग्रणी सड़क निर्माण कंपनी के साथ व्यापारिक संबंध उचित है?

गडकरी के वरदहस्त में फली-फूली आईआरबी

राजस्थान और गुजरात के बीच बनाया जाने वाला छह लेन का राजमार्ग ही एक मात्र प्रोजेक्ट नहीं है, जो गडकरी के राज में आईआरबी को मिला हो. सितम्बर 2014 में आईआरबी को मुंबई से पुणे के बीच यशवंत राव चव्हाण एक्सप्रेसवे के संचालन और रख-रखाव तथा पुराने मुंबई-पुणे राजमार्ग पर अतिरिक्त कार्य का ठेका मिला. इस पूरे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 2,187 करोड़ रूपए है.

इसी वर्ष जनवरी माह में आईआरबी को जम्मू-कश्मीर में 'जॉजिला पास' सुरंग बनाने का ठेका मिला. इसकी अनुमानित लागत 10,050 करोड़ रुपये आंकी गई. इसे भारत की सबसे महंगी सड़क परियोजना माना जा रहा है. 14.08 किलोमीटर लंबी यह सुरंग दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी सुरंग मानी जा रही है.

रिपोर्ट के अनुसार नीलामी के शुरुआती दौर में केवल कुछ ही भागीदार थे जैसे आईएल एंड एफएस ट्रांसपोर्टेशन लिमिटेड और एचसीसी लिमिटेड, लेकिन प्रक्रिया जब अंतिम चरण तक पहुंची तब आईआरबी एकमात्र बोलीदाता बचा रह गया.

जैसे ही आईआरबी को यह ठेका मिला, कांग्रेस पार्टी ने गडकरी पर आईआरबी का पक्ष लेने का आरोप लगाना शुरू कर दिया. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय सतर्कता आयोग को पत्र लिख कर जांच की मांग की है.

हालांकि गडकरी ने कांग्रेस के इन आरोपों से इनकार कर दिया था लेकिन दबाव में आकर उन्होंने दो माह के भीतर ही आईआरबी को दिया ठेका निरस्त कर दिया और फिर से बोली प्रक्रिया के आदेश जारी कर दिए. गडकरी ने अचानक यह फैसला लिया और इसके पीछे कोई खास कारण भी नहीं बताया.

कुछ लोगों का मानना है कि गडकरी के इस फैसले का गहरा कूटनीतिक महत्व है, वह यह कि कोई गडकरी पर पक्षपात का आरोप न लगा सके.

जाॅजिला सुरंग प्रोजेक्ट का ठेका रद्द होना यह दिखाता है कि गडकरी इन अटकलों पर विराम लगाना चाहते हैं कि आरआईबी उनके अधीन बड़े प्रोजेक्ट में एक बड़ा हिस्सा लेने को प्रयासरत है. यह सच है आईआरबी अब उतना फायदा नहीं उठा पा रही, जितना इसने 1995 से 1999 के बीच उठाया था, तब गडकरी महाराष्ट्र में सार्वजनिक निर्माण विभाग मंत्री थे. पर महिष्कर हर सूरत-ए-हाल में लाभ की स्थिति में ही हैं. देखें कैसे:

गडकरी की नई सड़क नीति से महिष्कर को मिला लाभ

कम ही राजनेता होते हैं जो सड़क निर्माण नीति से इस कदर वाकिफ होते हैं, जैसे कि नितिन गडकरी. महाराष्ट्र के पीडब्लूडी मंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य में बीओटी निर्माण को नए आयाम दिए. इसके अलावा वाजपेयी सरकार में राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क प्राधिकरण के प्रमुख के तौर पर उन्होंने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी महत्वपूर्ण योजना देश को दी.

इस साल जनवरी माह में मंत्रिमंडल ने सड़क निर्माण के लिए हाइब्रिड एन्युइटी माॅडल (हैम) को मंजूरी दी. भले ही इसका पहला प्रारूप योजना आसोग द्वारा 2006 में विकसित किया गया हो लेकिन इस माॅडल और इसके क्रियान्वयन के पीछे फिर से गडकरी का ही हाथ माना जाता है.

हैम के तहत सरकार प्रोजेक्ट की लागत का 40 प्रतिशत अंश देती है और एक निश्चित अवधि के बाद प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने के लिए उसे डेवलपर को सौंप दिया जाता है.

माॅडल की घोषणा करते हुए गडकरी ने बताया निजी कंपनियां पीपीपी आधारित माॅडल में भागीदारी के लिए तैयार नहीं थी, क्योंकि उनका विश्वास खत्म हो गया था (पिछली सरकारों में). इसलिए निजी भागीदारी को प्रोत्साहन देने के लिए हमने यह हाइब्रिड माॅडल अपनाया है, जहां उनके जोखिम में भी हम भागीदार होंगे.

अब तक सड़क निर्माण परियोजनाओं में तीन प्रकार के प्रारूप अपनाए जाते रहे हैं. ये हैं-

चुंगी कर आधारित बीओटीः इसके तहत कोई ठेका लने वाला डेवलपर राजमार्ग बनाता है और संचालित भी करता है. इस मार्ग पर चलने वालों से वह चुंगी कर वसूली करता है.

बीओटी परिलाभः डवलेपर राजमार्ग बनाता है, इसे कुछ निश्चित अवधि तक चलाता है. फिर सरकार को सौंप देता है, जो कि डेवलपर को रियायत अवधि के लिए भुगतान करती है.

अभियांत्रिकी, खरीद और निर्माण(ईपीसी): इसके तहत डवलेपर सड़क परियोजना का निर्माण सरकारी पैसे से करता है.

बीओटी माॅडल के तहत लगने वाली ऊंची पूंजी और जोखिम की समस्या के आंशिक समाधान के लिए हैम माॅडल लाया गया, हालांकि शुरुआती कुछ महीनों में कई फर्में हैम पर भरोसा नहीं कर पाई और इसके तहत आने वाली परियोजनाओं की बोली प्रक्रिया से दूर ही रही. इसलिए कई शुरुआती निविदाओं में केवल 3-4 भागीदार ही आगे आए.

यद्यपि अब हैम के तहत प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है लेकिन बड़े डवलेपर अब भी इससे दूर हैं. उदाहरण के लिए, लारसन एंड टूब्रो ईपीसी परियोजनाओं के ठेके में रुचि दिखा रही है. यानी कि उन परियोजनाओं में जो पूरी तरह सरकार की ओर से वित पोषित है.

आईआरबी भी हैम परियोजनाओं से दूर ही रही और अपना सारा ध्यान बीओटी परियोजनाओं पर ही लगाया. मिंट ने आईआरबी इन्फ्रास्ट्रक्चर के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक वीरेन्द्र महिष्कर के हवाले से कहा है कि बहुत कड़ी होड़ मची है और बोली लगाने का कोई तुक नहीं है. इस सेक्टर की हमेशा की समस्या है- जब भी सरकार बहुत सी परियोजनाएं लेकर आती है हम सारे ठेकेदार बुरी तरह से उसके पीछे भागते हैं और सब गड़बड़ हो जाता है.

बड़े दिग्गजों के हैम माॅडल से दूर रहने के कारण उन कंपनियों को बड़ा फायदा हुआ जिन्होंने इसके तहत परियोजनाओं को हाथ में लेने की हिम्मत दिखाई. संभवतः सर्वाधिक लाभ एमईपी इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट लिमिटेड और स्पैनिश कंपनी संजोस के संयुक्त उपक्रम को मिला.

अपनी वेबसाइट पर एमईपी ने गर्व के साथ घोषणा कर रखी है कि उसने हैम माॅडल वाली 8 परियोजनाओं के लिए बोली लगाई और उनमें से 6 के ठेके उसे मिले. आज की तारीख में उसके पास 3836.99 करोड़ रुपए के आॅर्डर हैं और उसे अगले 3 साल में 1059.97 किलोमीटर सड़क मार्ग बनवाना है.

एमईपी के पीछे कौन है! इसके निदेशकों की सूची में आईआरबी संस्थापक दत्तात्रेय पांडुरंग महिष्कर, उनकी पत्नी सुधा दत्तात्रेय महिष्कर, बेटे जयंत दत्तात्रेय महिष्कर और जयंत की पत्नी अनुया जयंत महिष्कर के नाम हैं.

संयोग से जयंत महिष्कर आईआरबी के निदेशक हैं और आइडियल एनर्जी एंड पावर लिमिटेड के प्रबंध निदेशक भी. इसी कम्पनी में गडकरी के बेटे निखिल एक अंशधारक और निदेशक है.

यह विचित्र ही है कि एमईपी जैसी कंपनी, जिसके निदेशकों में से चार तो महिष्कर ही हैं, को लगातार हैम माॅडल के प्रोजेक्ट मिल रहे हैं, दूसरी ओर आईआरबी के वीरभद्र महिष्कर विरोधाभासी बयान दे रहे हैं कि नई नीति के तहत बोली लगाने का कोई औचित्य नहीं है. हो सकता है ऐसा वक्तव्य उन्होंने इसलिए दिया हो ताकि उन अटकलों पर विराम लगाया जा सके कि गडकरी आईआरबी का साथ दे रहे हैं.

एमईपी को मिले ये छह हैम प्रोजेक्ट हैं:

  • अरावली कैंट फोर लेन राजमार्ग परियोजना (महाराष्ट्र)
  • परियोजना की लागत 592.98 करोड़ रुपए
  • कैंट-वेक्ड फोर लेन परियोजना (महाराष्ट्र)
  • परियोजना की लागत 805.59 करोड़ रुपए
  • महुवा-कागवादर फोर लेन परियोजना (गुजरात)
  • परियोजना लागत 604.68 करोड़ रुपए
  • नागपुर सिटी रिंग रोड पैकेज प्रथम
  • परियोजना लागत 531 करोड़ रुपए
  • नागपुर सिटी रिंग रोड प्रोजेक्ट द्वितीय
  • परियोजना लागत 639 करोड़ रुपए
  • तलाजा महुवा फोर लेन परियोजना (गुजरात)
  • परियोजना लागत 643.05 करोड़ रुपए

इसका मतलब यह हुआ कि आरआईबी को भले ही गडकरी की नई नीति से फायदा न हुआ हो लेकिन महिष्करों को तो हुआ ही है.

गडकरी प्रभाव?

सरकारी इंजीनियर दत्तात्रेय महिष्कर ने 1977 में आईआरबी की स्थापना की थी. शुरू में कम्पनी ने कल्याण-डोम्बीवली में छोटे काम हाथ में लिए फिर 1980 के दशक में बृहन्मुम्बई नगरपालिका से मिले सिविल कार्य किए. कम्पनी को बमुश्किल ही कोई बड़ा प्रोजेक्ट मिलता था. कंपनी के दिन 1995 के बाद फिर गए जब गडकरी महाराष्ट्र सरकार में सार्वजनिक निर्माण मंत्री बने.

आईआरबी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी अनुसार, उस अवधि में कम्पनी को मिले कुछ प्रोजेक्ट हैं:

  • पुणे-जलगांव रोड में सुधार का कार्य (8.75 करोड रुपए)
  • नागपुर सिटी के चारों ओर दो लेन का राजमार्ग बनाना (4.14 करोड रुपए)
  • मालेगांव-महेकर रोड का सुधार कार्य (21करोड रुपए)
  • बालापुर-पुतुर रोड में सुधार कार्य (4.5 करोड़ रुपए)
  • ठाणे-भिवाड़ी बाईपास(104 करोड़ रुपए)
  • खम्बात की घाट बीओटी परियोजना (45 करोड रुपए)
  • भिवंडी वाडा बीओटी प्रोजेक्ट (9.45 करोड रुपए)
  • कमां पायगौन बीओटी प्रोजेक्ट (14.4 करोड़ रुपए)

1999 में महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा गठबंधन की सरकार गिरने के बाद से आईआरबी को मिलने वाले सरकारी ठेकों में उल्लेखनीय कमी देखी गई हालांकि इसे बीओटी के प्रोजेक्ट मिलते रहे. खैर तब तक आईआरबी एक नामी कम्पनी बन चुकी थी और इसे भाजपा शासित गुजरात और राष्ट्रीय प्रोजेक्ट मिलते रहे.

जोजिला परियोजना के हाथ से छूट जाने को अगर छोड़ दिया जाए तो महिष्कर आज देश की अग्रणी आधारभूत कम्पनियों के मालिक हैं. जहां तक बीओटी परियोजनाओं का सवाल है आईआरबी पहले स्थान पर आती है. इसके अलावा अब महिष्करों का संबंध एमईपी के माध्यम से संजोस के साथ भी हो गया है, जो लाॅरेल अबु धाबी म्यूजियम, एलैन हॉस्पिटल, अबु धाबी, काठमांडू हवाई अड्डा, वेलेंसिया में स्ट्रैच रिजर्वायर और नवी मुंबई मेट्रो के मेट्रो लाइन एक के स्टेशन के निर्माण जैसे बड़े प्रोजेक्टों में लगी है.

गडकरी और महिष्कर इस रास्ते पर चलते हुए काफी दूर निकल आए हैं.

First published: 6 August 2016, 7:56 IST
 
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