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30 डॉलर बैरल से नीचे तेल: क्या हैं इसके मायने

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 21 January 2016, 8:27 IST
QUICK PILL
  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरती जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय\r\nमें 10 डॉलर\r\nप्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर\r\nतक गिर सकती हैं.
  • अंतरराष्ट्रीय\r\nप्रतिबंधों के हटने के बाद\r\nईरान भी अपना तेल दुनिया को\r\nबेच सकता है. इससे\r\nकीमतों में और ज्यादा गिरावट\r\nके आसार हैं.

तेल की कीमत 30 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे गिर जाने के मनोवैज्ञानिक झटके ने अटकलों को हवा देनी शुरू कर दी है. बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के आंकड़े भी यही इशारा कर रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें और नीचे गिरेंगी.

कुछ लोगों का कहना है कि तेल उत्पादन करने वाले गैर-सऊदी और गैर-खाड़ी सहयोग संगठन (जीसीसी) के देश अगर अपने उत्पादन में कटौती नहीं करते हैं और पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) की आपात बैठक नहीं बुलाते हैं तो कच्चे तेल की कीमतें आने वाले समय में 10 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर तक गिर सकती हैं.

पूर्व पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने 'कैच' को बताया, ‘प्रत्येक तेल उत्पादक देश अब अपने हाल पर है. उनमें से हर एक को अब अपने हितों के मुताबिक नीतियां तय करनी होंगी.’

ओपेक दरअसल तेल उत्पादक देशों का संघ है. यह कमोडिटी बाजार पर निगरानी, सदस्य देशों का तेल उत्पादन कोटा आदि की निगरानी करता है और साथ ही बिक्री मूल्य भी तय करता है.

तेल की कीमतों में मौजूदा गिरावट की वजहें:

अमेरिका में तेल और गैस के भारी भंडार की खोज के चलते उसको लगने लगा है कि उसकी जरूरतें खुद से पूरी हो सकती है, आयात की जरूरत नहीं है.

चीन की अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती (6.5 जीडीपी ग्रोथ) के चलते तेल की मांग में कमी आई है.

उत्पादन में कटौती नहीं करने की सउदी की जिद.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के हटने के बाद ईरान भी अपना तेल दुनिया को बेच सकता है. इससे कीमतों में और ज्यादा गिरावट के आसार हैं.

किस के लिए इसके क्या मायने हैं

लंबे समय से हजारों की संख्या वाला सउदी राजपरिवार जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए एक मोटा हिस्सा जनता को सरकारी रियायत के रूप में देता आया है. यह छूट सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं के रूप में सउदी जनता को मिलती है. इसका नुकसान यह हुआ है कि देश का बजट घाटा खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है.

अधिक मात्रा होने के बावजूद सउदी का तेल राजस्व सिकुड़ता जा रहा है. अगर जनता को मिल रही सुविधाओं और रियायतों में कटौती होती है तो आने वाले समय में जनता का राजशाही से मोहभंग भी हो सकता है. इसके चलते देश में सामाजिक अशांति औऱ विद्रोह भड़कने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

कच्चे तेल की कीमतें आने वाले समय में 10 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर तक गिर सकती हैं

ईरान भी कमोबेश इसी रास्ते चल रहा है. लंबे समय से विदेशी प्रतिबंधों के कारण ईरान विदेशी मुद्रा और व्यापार से कटा रहा है. उसके ऊपर विदेशी राजस्व जुटाने के साथ युवाओं की एक बड़ी आबादी को रोजगार मुहैया करवाने की भी जिम्मेदारी है. राष्ट्रपति हसन रुहानी को मिली सत्ता में इन्हीं युवाओं का योगदान है.

रूस एक अलग संकट से घिरा हुआ है. हथियार और तेल, रूस के दो प्रमुख निर्यात हैं. तेल की कीमत घटी है, वहीं बाजार में रूसी हथियारों के खरीददार भी घटे हैं.

मौजूदा परिदृश्य

औद्योगिक युग के कल-कारखाने तेल के बिना नहीं चल सकते. लेकिन औद्योगिक युग के बाद वाले इस दौर में तेल का महत्व कल-कारखानों से आगे भू-सामरिक, भू राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे तक बढ़ गया है. अधिकांश तेल वहीं मिलता है, जिन्हें दुनिया के नक्शे में सबसे ज्यादा अशांत और संघर्ष वाला क्षेत्र कहा जाता हैं.

वर्तमान सदी के शुरुआती वर्षों में पश्चिम एशिया में वर्चस्व की लड़ाई में भी तेल एक बड़ी वजह बन गया है. मणिशंकर अय्यर के अनुसार, ‘यह बेहद जटिल दौर है. तेल को लेकर जो कुछ भी हो रहा है (भू-सामरिक, भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक) यह सब उसी का प्रभाव है.’

ईरान और सउदी अरब के बीच मौजूदा लड़ाई शिया और सुन्नियों के बीच सांप्रदायिक संघर्ष भर नहीं है बल्कि यह इस्लामी दुनिया में अपने वर्चस्व की लड़ाई भी है और संयोग से यह दो सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों के बीच शुरू हुई है.

भू-राजनीतिक असर

भले ही पश्चिमी हथियार और गोला बारूद के सबसे बड़े आयातक सउदी और जीसीसी के सदस्य देश हैं, लेकिन सुरक्षा की गारंटी के लिए उन्हें अमेरिका की दरकार रहती है. अमेरिकी नौसेना का 5वां जंगी बेड़ा लगभग स्थायी रूप से फारस की खाड़ी में तैनात रहता है. लंबे समय से कायम इस गठजोड़ की गिरहें अब ढीली पड़ रही हैं. तीन मुख्य कारणों से यह गठजोड़ अब बदलाव के दौर से गुजर रहा है.

पहला, अमेरिका ने बड़ी मात्रा में शेल तेल और गैस खोजने की तकनीकी ढूंढ़ निकाली है. इसके चलते वह अरब के तेल पर अपनी निर्भरता को संजीदगी के साथ कम कर रहा है.

दूसरा, अमेरिकी ऐसी किसी भी संघर्ष की संभावना को खत्म कर देना चाहते हैं जो उनके सामने दुनिया भर के कट्टरपंथी इस्लामी पेश कर सकते हैं. इन कट्टरपंथियों के मन में अमेरिका के प्रति गहरी घृणा घर करती जा रही है. वे अमेरिका को काफिरों के एक साम्राज्यवादी समूह के रूप में देखते हैं जो उनकी ‘पाक जमीन’ (सउदी अरब) पर कब्जा जमाए बैठा है.

चीन की अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती के चलते तेल की मांग में कमी आई है

और अंत में, ईरान के साथ संबंधों में नरमी आने से अमेरिका को यह सहूलियत मिली है कि वह इस क्षेत्र में इसराइल और सउदी अरब के अलावा एक और देश के साथ अपनी सुरक्षा जरूरतों को साक्षा कर सके. उम्मीद की जा रही है कि तेहरान जल्द ही कट्टर इस्लामवादियों की वजह से पैदा हो रही समस्याओं से निपटने के लिए अमेरिका के साथ कोई मसौदा तैयार करेगा.

पेट्रोलियम मामलों के विशेषज्ञ और रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (आईडीएसए) से जुड़े शिबोंती राय दढ़वाल का कहना है, ‘ईरान के खिलाफ अमेरिका के व्यापार और आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना तेल की राजनीति में एक और उलटफेर वाली पारी का प्रतीक है. उत्पादन में कटौती करने के लिए सउदी अरब और उसके अन्य अरब सहयोगी दलों पर दबाव बनाने के लिए ईरान, तेल-उत्पादक लैटिन अमेरिकी देशों जैसे वेनेजुएला और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी उत्पादकों की अगुवाई कर सकता है.’

देश के खिलाफ लंबे समय से चले आ रहे प्रतिबंधों के कारण विदेशी मुद्रा के मामले में ईरान का हाथ तंग कर दिया है. माना जा रहा है कि अब वह अपने ऊपर से हटाए गए प्रतिबंधों का फायदा उठाते हुए अपने वित्तीय संसाधनों को अधिकतम करने की कोशिश करेगा. वही दूसरी तरफ सऊदी अरब इस स्थिति से उबरने के लिए इसे एक अस्तित्वादी संघर्ष का रूप देने की कोशिश कर सकता है.

दढ़वाल का तर्क हैं, ‘संकट के इस दौर में सउदी अरब की कोशिश तेल बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा करने की है.'

दूसरी तरफ अमेरिका है जिसकी तेल और गैस की भूख अपने यहां बढ़े उत्पादन के चलते कम हो गई है. तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक चीन भी मंदी की मार से जूझ रहा है. लिहाजा आने वाले समय में तेल की मांग घटनी ही है.

First published: 21 January 2016, 8:27 IST
 
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