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क्या ओपेक अंततः अमरीका से तेल कीमतों की लड़ाई जीत रहा है?

नीरज ठाकुर | Updated on: 6 May 2016, 22:55 IST

वर्ष 2014 के मध्य में ओपेक (पेट्रोलियम पदार्थ निर्यात करने वाले देशों का संगठन) और दुनिया भर की तेल कंपनियों, जिनकी अगुवाई अमेरिका कर रहा था, के बीच मतभेद शुरू हो गया था. इस मनमुटाव के पीछे रणनीति थी तेल की कीमतों को जितना नीचे हो सके उतना लाते हुए उत्पादन को एक ऐसे स्तर पर बनाए रखना जहां से अपने प्रतिद्वंदी को दिवालिया होने के लिये मजबूर किया जा सके.

लेकिन मौजूदा दौर को देखकर ऐसा लगता है कि अब समय बदल गया है. ऐसा समय आ गया है जब कई अमेरिकी कंपनियां मैदान छोड़कर भाग रही हैं और खुद को दिवालिया घोषित कर रही हैं.

रॉयटर्स की एक खबर के मुताबिक करीब 59 अमरीकी तेल और गैस कंपनियां इस सप्ताह मिडस्टेट्स पेट्रोलियम और अल्ट्रा पेट्रोलियम में क्रेडिटर प्रोटेक्शन दाखिल करने के बाद दिवालिया हो चुकी हैं.

अमेरिका, रूस और सउदी अरब को पछाड़कर तेल और गैस का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया

अमेरिका में आई शेल गैस क्रांति दुनियाभर की तेल आपूर्ति के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में कारगर साबित हुई है. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के 2014 के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका, रूस और सउदी अरब को पछाड़कर तेल और गैस का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया.

हालांकि अमेरिकी शेल गैस क्रांति के साथ सबसे बड़ी समस्या उसकी उत्पादन की लागत को लेकर थी. वर्ष 2014 में माना जाता था कि गैस के उत्पादन के लिये फ्रेकिंग तकनीक से उत्पादित होने वाली शेल गैस की कीमत 60 डाॅलर प्रति बैरल के आसपास थी, और अमेरिका और ओपेक के बीच तेल और गैस को लेकर चले इस मतभेद के दौरान कच्चे तेल के दाम जनवरी 2016 में गिरकर 28 डाॅलर प्रति बैरल पर आ गए जो 2003 के बाद सबसे कम है.

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ऐसे समय में जब कच्चे तेल के दाम 90-100 डाॅलर प्रति बैरल के आसपास थे और शेल गैस बाजार पर छाने को तैयार थी तब अमेरिकी तेल और गैस कंपनियों ने बेहद महंगी तेल की खुदाई के काम को करने के लिये कई बिलियन डाॅलर का कर्ज लिया.

ब्लूमबर्ग की सितंबर 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार 60 से अधिक उत्पादकों वाले ब्लूमबर्ग सूचकांक में आधे से अधिक कंपनियों का कर्जा उस स्तर तक आ गया था जो उनके कुल एंटरप्राइज मूल्य के 40 प्रतिशत के बराबर था.

अपने कर्ज और बांड की परिपक्वता को चुकाने में असमर्थ कई कंपनियां अब भुगतान की तारीखों को बदलवाते हुए उन्हें आगे बढ़वाकर ऋण का पुनगर्ठन करने के प्रयासों में हैं.

कच्चे तेल के दाम जनवरी 2016 में गिरकर 28 डाॅलर प्रति बैरल पर आ गए जो 2003 के बाद सबसे कम है

कुछ कंपनियां तो अपने लिए अतिरिक्त समय पाने में सफल रही हैं लेकिन अधिकतर अपने देनदारों को समझाने में असफल ही रही हैं.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार चेसापेक एनर्जी काॅर्प अपने तात्कालिक भुगतान वाले अधिकतर देनदारों को ऋण चुकाने की अवधि को आगे बढ़ाने के लिये समझाने में नाकाम रही है.

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तेल के लगातार गिरते दामों के चलते अमेरिकी शेल कंपनियां वर्ष 2015 में खुदाई की नई परियोजनाओं को रोकने के लिए मजबूर हुईं. बेकर ह्यूजेस के अनुसार नवंबर तक अमेरिका के रिंग्स की संख्या महीने-दर-महीने गिरकर 760 से 31 रिग्स तक आ गई.

क्या निकट भविष्य में कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे?

हालांकि पिछले करीब डेढ़ वर्ष में दुनियाभर में तेल की कीमतों को लेकर लगाए गए कयास गलत ही साबित हुए हैं लेकिन अमेरिका में तेजी से दिवालिया घोषित हो रही तेल कंपनियों की संख्या को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि बहुत ही जल्द तेल की कीमतों में जबर्दस्त उछाल देखने को मिलेगा.

कहां तक जा सकती हैं कीमतें?

पीडब्लूसी इंडिया में तेल और गैस के विशेषज्ञ दीपक माहुरकर कहते हैं, ‘‘डाटा और जानकारी शेयरिंग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है. कई दशक पहले की तुलना में अब शेयरधारकों के पास बाजार की अधिक जानकारी है और हमें दिल तोड़ने वाली प्रतिक्रियाएं शायद ही देखने को मिलती हों. इस बात की पूरी संभावना है कि अगर उच्च लागत वाली उत्पादन सुविधाओं को पीछे छोड़ा जाता है तो उसका प्रभाव आपूर्ति पर अवश्य पड़ेगा. अगर अगले 18 महीनों में कच्चे तेल की कीमतें 60 डाॅलर तक पहुंच जाती हैं तो उद्योग से जुड़े किसी भी व्यक्ति के आश्चर्य नहीं होगा.’’

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जरूरी नहीं है. 2014 में ऐसा माना जाता था कि शेल गैस और तेल का दाम तभी व्यवहार्य होगा जब कच्चा तेल 50 डाॅलर प्रति बैरल की दर पर बेचा जाए. बीते करीब डेढ़ वर्षों में अधिकतर कंपनियां एक ही क्षेत्र में कई कुओं की खुदाई कर अपनी उत्पादन लागत को कम करने में सफल रही हैं.

लेकिन इसके बावजूद कई कंपनियां दिवालिया भी हुई हैं और कई दिवालिया घोषित होने की कगार पर हैं. इसके बावजूद किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि लंबी अवधि में कच्चे तेल का मूल्य कहां तक जाएगा. और समूची दुनिया समेत भारत भी इस पर टकटकी लगाए हुए है.

First published: 6 May 2016, 22:55 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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