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क्या सचमुच पेट्रोल-डीजल के डी-रेगुलेशन से हुआ है फ़ायदा?

नीरज ठाकुर | Updated on: 22 December 2015, 20:40 IST
QUICK PILL
  • पिछले साल अक्टूबर में सरकार ने डीजल की कीमत को डी-रेगुलेट किया लेकिन फिर भी इसकी कीमतों में उम्मीद के मुताबिक कमी नहीं आई. पिछले एक साल में पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क छह बार बढ़ाया जा चुका है.
  • वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार वित्तीय घाटा पूरा करने के लिए टैक्स बढ़ा रही है. कुछ विशेषज्ञ भी सरकार के फैसले का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन बढ़ती महंगाई को देखते हुए डीजल का दाम अधिक रखना ठीक नहीं है.

अक्टूबर 2014 में एनडीए सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए डीजल की क़ीमतों को डी-रेगुलेट कर दिया. सरकार ने तब कहा था कि इसके बाद डीजल की क़ीमतें बाज़ार भाव से तय होंगी. घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत कम होने पर भारत में डीजल की क़ीमत 3.50 रुपये घटी थी.

जनवरी 2009 के बाद पहली बार डीजल की क़ीमत में कमी की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बयान दिया, "पिछले पांच सालों में डीजल की क़ीमत लगातार बढ़ती जा रही है. लेकिन कच्चे तेल की क़ीमत देखते हुए बाज़ार से जोड़ने के बाद पेट्रोल-डीजल की क़ीमत कम होंगी."

तो क्या जेटली ने जो कहा वह हुआ भी? बिल्कुल नहीं.

अक्टूबर 2014 में कच्चे तेल की क़ीमत क़रीब 82 डॉलर प्रति बैरल थी. उस समय दिल्ली में डीजल की क़ीमत 55.60 रुपये प्रति लीटर थी. तब से अब तक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में डीजल की क़ीमत 57 प्रतिशत कम हुई है लेकिन भारत में डीजल की क़ीमत (46.09 रुपये प्रति लीटर) में महज 16 प्रतिशत की कमी आयी है. वहीं पेट्रोल की क़ीमत में केवल 10 प्रतिशत की कमी आयी है.

पिछले एक साल में सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क छह बार बढ़ा चुकी है

लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमतों में कमी से हुआ फायदा कहां जा रहा है?

नवंबर 2014 से दिसंबर, 2015 के बीच केंद्र ने पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क छह गुना बढ़ा दिया है. टैक्स बढ़ाने से क़रीब 28 सौ करोड़ रुपये सरकारी खाते में आए.

16 दिसंबर को सरकार ने पेट्रोल पर 0.30 रुपये और डीजल पर 1.17 रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया.

सरकार ने कहा कि इससे जो राशि जमा होगी उसे विकास कार्यों में ख़र्च किया जाएगा. जेटली ने 16 दिसंबर को संसद में कहा, "इसका लाभ ग्राहकों तक पहुंच रहा है, लेकिन विकास कार्यों के लिए भी पैसे की ज़रूरत है."

जेटली ने अपने जोरदार भाषण में कहा, "उत्पाद शुल्क का 42 प्रतिशत हिस्सा प्रदेशों को मिलता है. इसके अलावा हर राज्य में वैट (वैल्यु एडेड टैक्स) लगता है. हमें इससे कोई शिकायत नहीं. राज्यों को भी पैसे की ज़रूरत होती है. हम सारा पैसा नेशनल हाईवे और ग्रामीण सड़कों को बनाने में खर्च कर रहे हैं."

अरुण जेटली ने कहा कि इस साल ख़र्च में कटौती किए बग़ैर राजकोषीय घाटा पूरा कर लिया जाएगा

क्या ये अर्थनीति सही है? इसका जवाब है, हां और ना.

अगर आपको देश के बढ़ते वित्तीय घाटे की चिंता है तो आपका जवाब होगा, हां और अगर आप इस देश के मध्यम वर्गीय नागरिक हैं जो बढ़ती क़ीमतों से बेहाल है तो आपका जवाब होगा, ना.

सरकार की आमदनी और राजस्व के बीच के अंतर को वित्तीय घाटा कहते हैं. कई अर्थशास्त्री इस बात से ख़ुश हैं कि कच्चे तेल की कीमतों में आई कमी से भारत अपने वित्तीय घाटे का लक्ष्य (जीडीपी का 3.9 प्रतिशत) पूरा कर सकता है.

अर्थशास्त्री राजीव कुमार सेंटर फ़ॉर पॉलिसी एंड रिसर्च से जुड़े हुए हैं. राजीव कहते हैं, "सरकार को होने वाले फ़ायदे को ख़ुदरा खपत पर नहीं खर्च करना चाहिए. इस पैसे का इस्तेमाल देश की अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने और बुनियादी ढांचा के विकास में जरूरी निवेश के लिए किया जा सकता है. जब कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ेंगी तो सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों को मौजूदा दर पर बनाए रखने के लिए उत्पाद शुल्क कम कर सकती है."

एक अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज़ फर्म के सीनियर कंसल्टेंट भी भारत सरकार की मौजूदा नीति का समर्थन करते हैं. वह कहते हैं, "सरकार को पैसे की जरूरत है और पेट्रोल और डीजल की कीमत को मौजूदा दर पर बनाए रखकर पैसा जमा करने में कोई बुराई नहीं है. जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ेगी तो सरकार टैक्स कम कर सकती है."

कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर सरकार टैक्स कम कर सकती  है

दूसरी तरफ़ विपक्षी  पार्टियां सरकार की इस नीति के ख़िलाफ़ हैं. दिसंबर के पहले हफ़्ते में पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने पर विपक्ष ने सरकार के ख़िलाफ़ राज्य सभा में स्थगन प्रस्ताव रखा.

जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम हैं तो सरकार के लिए वित्तीय घाटा पूरा करने का यह अच्छा मौक़ा है. लेकिन इसके साथ ही सरकार ने कच्चे तेल की क़ीमतें बढ़ने के बाद मूल्य बढ़ाने का अधिकार खो दिया है.

कच्चे तेल की क़ीमतें पिछले कुछ समय से कम हैं. क़रीब एक दशक की कोशिश करने बाद सरकार डीजल की कीमतों को डी-रेगुलेट कर सकी. आगामी सराकरों को को भविष्य में कच्चे तेल की क़ीमतें बढ़ने का बोझ उठाना होगा.

जेटली ने पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमत को बहस से बाहर रखकर भी ग़लती की. डीजल का प्रयोग गुड्स और खाद्य पदार्थों के परिवहन के लिए प्रयोग किए जाने वाले रेल, ट्रक और व्यावसायिक गाड़ियों में प्रयोग किया जाता है. डीजल की क़ीमत का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है.

बेहतर ये होता कि सरकार डीजल की कीमत में ज्यादा कम करती क्योंकि पेट्रोल गाड़ियों का ज़्यादातर निजी प्रयोग किया जाता है. अगर ऐसा किया गया होता तो महंगाई कम होती और लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती.

डीजल का दाम कम होता तो महंगाई कम बढ़ती. माल ढुलाई के लिए ज़्यादातर डीजल वाहनों का प्रयोग होता है

नवंबर में महंगाई की दर पिछले 14 महीनों में सबसे अधिक 5.4 प्रतिशत थी. जेटली को पता है कि खाद्य वस्तुएं महंगी होने का अर्थ है कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर रघुराम राजन की तरफ से ब्याज दरों में कटाैती करने में देरी होगी.

मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए जेटली के विपक्ष की मांग मानने के कम ही आसार है. उनके लिए विपक्षी दलों को ख़ुश करने से ज़्यादा जरूरी खर्च में कटौती किए बिना वित्तीय घाटे को पूरा करना है.

ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत और कम हुई तो जेटली फिर से उत्पाद शुल्क बढ़ाने में शायद न हिचकें.

केंद्र और राज्य सरकारों के लिए पेट्रोलियम पदार्थ राजस्व का बड़ा जरिया रहे हैं. इसीलिए सरकार पेट्रोलियम पदार्थों को प्रस्तावित जीएसटी(सेवा एवं उत्पाद कर) विधेयक से बाहर रखना चाहती है.

ऐसे में ये कहना महज छलावा है कि देश में पेट्रोलियम पदार्थों को डी-रेगुलेट कर दिया गया.

First published: 22 December 2015, 20:40 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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