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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संकेत शुभ नहीं है साल 2016 में

नीरज ठाकुर | Updated on: 8 June 2016, 23:33 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • भारत 2015 में चीन के मुकाबले तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में शुमार रहा है. हालांकि यह घरेलू खपत के आधार पर रहा है. लेकिन वृद्धि दर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था नौकरी के मौके पैदा करने में विफल रही है. 
  • भारत के निर्यात में लगातार 17वें महीने में गिरावट आई है. अगर 2016 में भारत का निर्यात कमजोर रहता है तो इससे आने वाले समय में नौकरियों की संख्या पर असर पड़ेगा.
  • वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह से हजारों निर्यात केंद्र को बंद करना पड़ सकता है, जो पिछले दो सालों से किसी भी तरह से खुद को संभालती रही हैं. 

वैश्विक अर्थव्यवस्था क्या एक बार फिर से मंदी की तरफ बढ़ रही है? इस बारे में अभी कहना जल्दबाजी होगा. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 2016 निश्चित तौर पर वैश्विक व्यापार के लिहाज से 2015 से बुरा होने जा रहा है. यह भारत के लिए बुरी खबर है.

भारत 2015 में चीन के मुकाबले तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था में शुमार रहा है. हालांकि यह घरेलू खपत के आधार पर रहा है. लेकिन वृद्धि दर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था नौकरी के मौके पैदा करने में विफल रही है. भारत के निर्यात में लगातार 17वें महीने में गिरावट आई है. अगर 2016 में भारत का निर्यात कमजोर रहता है तो इससे आने वाले समय में नौकरियों की संख्या पर असर पड़ेगा.

वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह से हजारों निर्यात केंद्र को बंद करना पड़ सकता है, जो पिछले दो सालों से किसी भी तरह से खुद को संभालती रही हैं. 

जेपी मॉर्गन ग्लोबल कंपोजिट पर्चेंजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) को ग्लोेबल ऑल इंडस्ट्री आउटपुट इंडेक्स के तौर पर जाना जाता है. यह ग्लोबल इकनॉमी में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर के लिए बेंचमार्क की तरह होता है और यह मई 2016 में तीन महीनों के निचले स्तर पर था. मई में यह 50 था.

रिपोर्ट में कहा गया है, 'ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हालत 2016 में ठीक नहीं रही है. प्रोडक्शन और नए ऑर्डर के लिहाज से विस्तार की दर लगभग स्थिर रही है. वहीं पिछले तीन सालों के दौरान नए एक्सपोर्ट बिजनेस में लगातार गिरावट आई है.' मैन्युफैक्चरिंग की खराब हालत का असर लेबर मार्केट में भी दिख रहा है.

ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर जा सकता है. ब्रिटेन में इस बारे में 23 जून को जनमत संग्रह होने जा रहा है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने एक और बड़ी चुनौती है. यूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन के बाहर होने का खतरा. ऐसा कहा जा रहा है कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर जा सकता है. ब्रिटेन में इस बारे में 23 जून को जनमत संग्रह होने जा रहा है.

ऑर्गनाइजेशन फॉर इकनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डिवेलपमेंट की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है, 'ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर जाने से वित्तीय बाजार में अस्थिरता पैदा होगी और साथ ही इस बारे में लंबे समय तक अनिश्चितता रहने से ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और दुनिया के अन्य देशों पर असर होगा.'

अब भारत के बारे में बात करते हैं. भारत के जीडीपी में मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट की हिस्सेदारी 17 फीसदी है. 2015-16 में भारत का निर्यात पिछले वित्त वर्ष के 310 अरब डॉलर से घटकर 281 अरब  डॉलर हो गया. 

एफआईईओ के प्रेसिडेंट एस सी रल्हान बताते हैं, 'वैश्विक अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को देखते हुए मुझे लगता है कि 2016 की स्थिति 2015 से बुरी होगी. जिन एक्सपोर्टर्स ने पिछले 17 महीनों से अपने कारोबार को किसी तरह से बनाया हुआ है, उन्हें अब इसे बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.'

2015 में श्रम मंत्रालय की तरफ से कराए गए सर्वे के मुताबिक इस साल केवल 1.35 नौकरियां सृजित की जा सकी

रल्हान ने कहा कि 2015 में अधिकांश निर्यात केंद्रों को अपने यहां से 10 फीसदी कर्मचारियों की छंटनी पड़ी. उन्होंने कहा कि भारत में बेरोजगारी को लेकर कोई भरोसेमंद आंकड़ा नहीं है लेकिन 2015 में श्रम मंत्रालय की तरफ से कराए गए सर्वे के मुताबिक इस साल केवल 1.35 नौकरियां सृजित की जा सकी जबबकि 2009 में यह आंकड़ा 12.56  लाख था. यह तब हुआ जब दुनिया वैश्विक मंदी की वजह से मुश्किलों में थी.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 में भारत की जीडीपी दर 7.6 फीसदी रही. सरकार को इस वजह से आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है कि उसने जॉबलेस ग्रोथ को बढ़ावा दिया है. इसकी सबसे बड़ी वजह देश के निर्यात में आई गिरावट है.

भारत से होने वाले अधिकांश निर्यात में एसएमई सेक्टर की हिस्सेदारी होती है जिसमें करीब 40 फीसदी कामगार लगेे हुए हैं. दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली इकनॉॅमी में नौकरियों की संख्या में होने वाली मामूली बढ़ोतरी 2016 के लिए ठीक संकेत नहीं है. 

केयर रेटिंग के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस बताते हैं कि  वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई मंदी का असर भारत पर पड़ेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत पूरी तरह से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर आधारित है. सबनवीस बताते हैं कि इसका असर भारत सरकारर के नौकरियों के सृजन क्षमता पर पड़ेगा.

उन्होंने कहा, 'निर्यात में गिरावट से एसएमई पर भी असर पडे़गा. एसएमई सेक्टर में भारत की सबसे बड़ी कामगारों की आबादी काम करती है.'

एनडीए सरकार हालांकि वैश्विक कारोबार को सुधारने की दिशा में बहुत कुछ नहीं कर सकती है लेकिन यह दूसरा साल है जब इकनॉॅमी जॉबलेस ग्रोथ की की दिशा में आगे बढे़गी. आने वाले चुनावों में सरकार को इसका गंभीर खमियाजा उठाना पड़ सकता है. 

First published: 8 June 2016, 23:33 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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