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ओला और उबर पर भारी पड़ेगी सर्ज प्राइसिंग पर रोक

नीरज ठाकुर | Updated on: 22 April 2016, 20:21 IST
QUICK PILL
  • दिल्ली सरकार ने 15 से 30 अप्रैल तक सम-विषम नियम लागू कर रखा है. इसके अनुसार सम तारीखों को वही गाड़ियां चल सकेंगी जिनका आखिरी नंबर सम होगा. विषम तारीख को विषम नंबर वाली गाड़ियां.
  • इस दौरान कई लोगों ने शिकायत की कि ओला और उबर जैसी ऐप आधारित टैक्सी कंपनियां ज्यादा किराया ले रही हैं. जिसके बाद दिल्ली सरकार ने इन कंपनियों की सर्ज प्राइसिंग पर पाबंदी लगा दी. कंपनियों के लिए ये आदेश भारी पड़ सकता है.

दिल्ली सरकार ने कहा है कि टैक्सी कंपनियां ओला और उबर सम-विषम योजना की समाप्ति के बाद भी अपना किराया नहीं बढ़ा सकती हैं. इतना ही नहीं, दिल्ली सरकार ओला और उबर जैसे टैक्सी सेवा प्रदाताओं के लिए कीमत का दायरा भी तय करने की मंशा रखती है.

ध्यान रहे कि कर्नाटक ने अपने यहां प्रति किलोमीटर 18.5 रुपये का मूल्य तय किया हुआ है और वहां किराया इससे ऊपर नहीं जा सकता है.

यह फैसला ग्राहकों की उस शिकायत के बाद लिया गया है जिसमें कहा गया था कि ओला और उबर लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर अपनी सर्ज प्राइस (किराया बढ़ोतरी) प्रणाली के अंतर्गत सामान्य दरों से चार से पांच गुना ज्यादा किराया वसूल रही हैं.

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इस स्थिति को समझने के दो तरीके हैं. पहली बात तो यह है कि भारत की सरकारें (राज्य और केंद्र) निजी क्षेत्र को नियामित करना पसंद करती हैं, भले ही उन्होंने इसे खड़ा करने में अपनी ओर से कोई सहयोग दिया हो या नहीं.

ओला और उबर जैसी कंपनियां चार-पांच बार सस्ती सेवा देकर सर्ज प्राइसिंग से वसूलती हैं लागत

ओला और उबर एक ऐसी प्रौद्योगिकी के सहारे बाज़ार में उतरे जिसका सरकारों से कोई लेना-देना नहीं था. रियायतों की एक प्रणाली के सहारे इन कंपनियों ने अपने ग्राहकों का जो आधार तैयार किया है, उसमें भी सरकार की कोई भूमिका नहीं है.

दूसरी बात यह जानने की है कि ओला और उबर का मॉडल भारत जैसे देश के लिए उपयुक्त है या नहीं. यह मॉडल बेहद किफायती दामों पर लोगों को वातानुकूलित टैक्सी के सफ़र की सुविधा देता है और उन्हें इस आराम का आदी बना देता है.

एक बार लोगों को इसकी आदत लग जाती है, तब कंपनियां उन ग्राहकों को रियायती दर मुहैया कराने लगती है. इसे ग्राहक अधिग्रहण का चरण कहा जाता है. जो रियायत पुराने ग्राहकों को दी जाती है, उसकी भरपाई किराया बढ़ोतरी से होती है जिसे सर्ज प्राइसिंग का नाम दिया गया है.

सवाल उठता है कि क्या इस देश के लोग एक वातानुकूलित टैक्सी में सफ़र करने की वास्तविक कीमत अदा करने को तैयार हैं?

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स्थानीय टैक्सी स्टैंड से अगर आप टैक्सी लेते हैं तो उसकी कीमत 9 से 18 रुपये प्रति किलोमीटर के बीच कुछ भी हो सकती है. यह इस पर निर्भर करता है कि आप कौन सा वाहन चुन रहे हैं.

अधिकतर भारतीय हालांकि स्टैंड से टैक्सी तभी लेते हैं जब उन्हें अपने शहर से बाहर जाना होता है. दूसरी ओर, मेरु और ईज़ीकैब्स जैसी सेवाएं बिना किराया बढ़ोतरी के 23-25 रुपया प्रति किलोमीटर की दर से शुल्क लेती हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि बीते एकाध साल में ओला और उबर वाला मॉडल काफी कामयाब रहा है, चूंकि स्थानीय आवाजाही के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों ने इस उम्मीद में इन सेवाओं को चुना कि उन्हें सस्ती लेकिन आरामदेह सेवा मिल रही है, भले ही सामान्य परिस्थितियों में तिपहिया ऑटो के मुकाबले इसका किराया 20 से 50 रुपये अधिक ही क्यों न पड़ता हो.

इस मॉडल का नुस्खा यह है कि लोगों को सामान्य लागत से कम दर पर पांच बार सफ़र करने का मौका दिया जाए और सर्ज प्राइसिंग के तहत एक बार में ही वह लागत निकाल ली जाए. हो सकता है कि बढ़े हुए किराये पर यात्रा करने में ग्राहकों को एकबारगी असुविधा हो, लेकिन अगली बार जब तक सस्ती सेवा मिलती रहेगी वे इस सेवा का इस्तेमाल करते रहेंगे.

ओला और उबर जिन देशों में सेवाएं देते हैं उनमें सबसे कम प्रति व्यक्ति आय भारत की है

यदि किसी कंपनी को एक स्थिर प्राइसिंग मॉडल के साथ वह लागत निकालने के लिए बाध्य किया जाता है, तो ग्राहकों को एक बार में ज्यादा भुगतान करने को राज़ी करने में कंपनी को दिक्कत आएगी.

ग्राहकों के इस व्यवहार की एक वजह यह भी है कि भारत में प्रति व्यक्ति आय बहुत कम है.

जिन उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में उबर अपना परिचालन कर रही है, उनके बीच भारत सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाला देश है.

विश्व बैंक के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति आय 2015 में 1581.5 डॉलर थी जबकि इंडोनेशिया, फिलीपींस, चीन, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका में यह आंकड़ा क्रमश: 3491, 2872, 7590, 11726 और 6483 डॉलर था.

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उबर जैसे बेहद सस्ते टैक्सी सेवा प्रदाता के लिए भारत का बाज़ार आदर्श होने के समर्थन में इकलौती दलील यह है कि यहां 18-25 रुपये प्रति किलोमीटर की दर पर टैक्सी सेवा का लाभ उठाने में सक्षम लोगों की संख्या ब्राज़ील या फिलीपींस में उबर से चलने में सक्षम लोगों की संख्या के बराबर या ज्यादा हो सकती है.

समस्या यह है कि इस बाजार को पहले से ही मेरु जैसी कंपनियों ने कब्ज़ा रखा है जबकि ओला और उबर जैसों का अपना बाज़ार यहां तैयार होने के पीछे सिर्फ और सिर्फ उनकी बेहद सस्ती दरें ही हैं, जिसे टिकाए रखने के लिए ज़रूरी है कि दिन या महीने के किसी तय वक्त उसकी भरपाई किराया बढ़ोतरी से की जाए.

ओला और उबर खुद को इस बाज़ार में टिकाए रख सकें, उसका इकलौता तरीका यही है कि उनके लिए ज्यादा से ज्यादा ड्राइवर काम कर रहे हों ताकि शहर के किसी भी हिस्से में न्यूनतम प्रतीक्षा अवधि के भीतर लोगों को सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें. इस किस्म के नेटवर्क में चालकों के लिए भी थोड़ा आर्थिक प्रोत्साहन ज़रूरी हो जाता है.

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मेरु कैब्स के पास अपने वाहन हैं और वह अपने चालकों को मासिक वेतन देती है जबकि ओला और उबर के पास अपनी गाड़ियां नहीं हैं. ओला और उबर के लिए गाड़ी चला रहे चालकों को इसीलिए कम से कम इतना सक्षम तो होना ही चाहिए कि वे अपने वाहन की मासिक किस्त भर सकें और दिन के अंत में कुछ पैसे बचाकर घर ले जा सकें.

शुरुआत में ओला और उबर ने चालकों की भरपाई के लिए निवेशकों के पैसे का इस्तेमाल किया था और हर महीने उन्हें मोटी रकम पकड़ायी जाती थी. यह मॉडल लंबे समय तक नहीं टिक सकता. इसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए ज़रूरी है कि किराये में बढ़ोतरी हो. सर्ज प्राइसिंग की अहमियत यहीं समझ में आती है.

ऐसा नहीं हुआ, तो ओला और उबर को मजबूरी में मेरु और ईज़ीकैब्स के बाजार में अपनी जगह खोजनी पड़ेगी जबकि यह बाज़ार पहले से ही बहुत सीमित है.

First published: 22 April 2016, 20:21 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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