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शराबबंदी लोकलुभावन हो सकती है लेकिन वित्तीय घाटे की भरपायी कैसे होगी?

नीरज ठाकुर | Updated on: 17 April 2016, 0:02 IST

कुछ समय पहले तक राज्य शराब की ब्रिकी से होने वाली आय को राजस्व के निश्चित हिस्से के तौर पर देखते थे. अब महिला मतदाताओं का विश्वास जीतने के लिए कुछ राज्य शराब की ब्रिकी पर प्रतिबंध लगा रहे हैं.

पिछले दो सालों में केरल और बिहार ने शराब पर बैन लगाया है. अब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा है कि दोबारा सत्ता में चुने जाने पर वह शराब पर प्रतिबंध लगाएंगी.

लेकिन क्या सरकारों को देश में अल्होकल पर बैन लगाना चाहिए? यह एक विवादास्पद बहस है जहां दोनों तरफ से मजबूत तर्क हैं.

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आर्थिक सहयोग और विकास (ओईसीडी) की रिपोर्ट के अनुसार 2012 में पिछले 20 सालों की तुलना में भारत में शराब की खपत में 55 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.

एक तरफ सामाजिक तर्क यह है कि शराब की व्यापक उपलब्धता गरीब महिलाओं के लिए अभिशाप हैं, जिन्हें अपने शराबी पतियों से शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ता है. इसके अलावा गरीब महिलाओं के छोटी बचत का बड़ा हिस्सा इनके पति शराब में उड़ा देते हैं.

ऐसी महिलाएं किसी भी राज्य में मतदान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इस वजह से सत्तारूढ़ दल शराब पर प्रतिबंध लगाने में चुनावी लाभ देखते हैं.

इसके विरोध के तर्क वास्तव में आर्थिक हैं. क्या राज्य शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाकर राजस्व का नुकसान बर्दाश्त कर सकते हैं?

किस कीमत पर?

राज्य सरकारें शराब और अन्य मादक द्रव्यों पर एक्साइज ड्यूटी लगाती हैं. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार 2012-13 में तेरह राज्यों (इनमें केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं) के कर राजस्व में 15 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी शराब और अन्य मादक द्रव्यों पर लगने वाले एक्साइज ड्यूटी से हुई थी. तमिलनाडु को शराब की ब्रिकी से राजस्व का 5.1 फीसदी हिस्सा जबकि बिहार को राजस्व का 3.9 फीसदी हिस्सा मिला था.

केरल की सरकार ने अगस्त 2014 में शराबबंदी की दिशा में आगे कदम बढ़ाने का फैसला किया. जबकि 2013-14 में केरल को शराब की ब्रिकी से 8,433 करोड़ रुपये मिले थे जो उसके कुल राजस्व का 24 फीसदी था. अब यह आंकड़ा 3.4 फीसदी के नीचे है.

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पिछले कुल सालों में राज्यों ने ईमानदारी से अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने का जिम्मा संभाला है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के प्रोफेसर पिनाकी चक्रवर्ती के अनुसार वित्तीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) के 2003 में लागू होने के बाद राज्यों के वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है.

गरीब महिलाओं के छोटी बचत का बड़ा हिस्सा इनके पति शराब में उड़ा देते हैं

हालांकि, चक्रवर्ती आगाह करते हैं कि अगर शराब पर प्रतिबंध चलन में आता है तो राज्यों को तेजी से उनकी बिगड़ती अर्थव्यस्था को देखना पड़ेगा. वह कहते हैं, 'भारत के अधिकतर राज्यों में शराब राजस्व का एक बड़ा स्रोत है. शराब पर प्रतिबंध लगाने के बाद राज्यों को यह देखना होगा कि वे इसकी भरपाई कैसे करेंगे.'

शराब पर प्रतिबंध की मांग करने वालों का तर्क है कि शराबबंदी से राज्यों के स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चों में कमी आएगी. इस तर्क से असहमत चक्रवर्ती का कहना है, 'शराबबंदी के बावजूद ऐसा कोई रास्ता नहीं है जिससे स्वास्थ्य पर होने खर्चों में कमी आएगी. बल्कि शराबबंदी की वजह से राज्य की अर्थव्यवस्था का नुकसान होगा.'

भारत के अधिकतर राज्यों में शराब राजस्व का एक बड़ा स्रोत है: पिनाकी चक्रवर्ती

वास्तव में राज्य सरकारों को अक्सर अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए शराब और तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ाना पड़ता है.

पिनाकी चक्रवर्ती की बात से योजना आयोग के पूर्व सदस्य अभिजीत सेन भी सहमत हैं. सेन का तर्क है, 'शराबबंदी के चलते राज्यों को होने वाले राजस्व की नुकसान भरपाई का एक मात्र तरीका है कि राज्य अपने कर-संग्रह में सुधार करें.'

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वह कहते हैं, 'इसके अलावा एक बार जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों के पास कर लगाने के कम रास्ते होंगे इसलिए राजस्व के नुकसान की भरपाई की गुंजाइश भी कम हो जाएगी.'

सेन कहते हैं कि अंत में राज्यों को सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं में कटौती करने का रास्ता बचेगा क्योंकि वे कर्मचारियों की सैलरी और कर्जों पर देने वाले ब्याज में कटौती नहीं कर सकते.

इसलिए अगले कुछ सालों में राज्यों में राजस्व के दूसरे स्रोत अवश्य खोजने होंगे वर्ना शराबबंदी से होने वाला राजस्व नुकसान उनके लिए तकलीफदेह होगा.

First published: 17 April 2016, 0:02 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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