Home » बिज़नेस » EPF: Has Arun Jaitley alienated BJP's core vote bank?
 

ईपीएफ: क्या जेटली ने बीजेपी के कोर वोट बैंक को नाराज किया?

नीरज ठाकुर | Updated on: 21 April 2016, 20:03 IST

बीते दो वर्षों के दौरान एनडीए सरकार कम टैक्स वसूली के चलते धन की कमी का सामना करती आ रही है. इस बार सरकार ने अपने बजटीय अनुमानों में सकल कर राजस्व में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने का अनुमान व्यक्त किया है.

इसी वजह से वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आम बजट में राजस्व को बढ़ाने के लिए दो बेहद अलोकप्रिय उपायों को अपनाने का प्रयोग करके देखा.

पहले तो वित्त मंत्रालय ने कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) के अंतर्गत जमा किये गए धन को निकालने पर 60 प्रतिशत कर लगाने की सिफारिश की. इस सिफारिश का विरोध होने पर वित्त मंत्रालय ने अपना कदम वापस खींचते हुए यह स्पष्टीकरण दिया कि सिर्फ जमा किये गए धन पर मिलने वाले ब्याज पर ही 60 प्रतिशत कर लगाया जाएगा. लेकिन इसके बाद मध्यम वर्ग और विपक्ष के दबाव में सरकार को घुटने टेकने पड़े.

विपक्ष के संगठित विरोध को देखते हुए सरकार ने ईपीएफ पर प्रस्तावित टैक्स को वापस ले लिया

आखिरकार ईपीएफ के तहत मध्यम वर्ग द्वारा जमा की जाने वाली बचत पर कर लगाने की अनुमति देने वाली इस अधिसूचना को पूरी तरह से वापस लेने का निर्णय लेना पड़ा.

इसके बाद एक और मुद्दा सामने आया जिसमें लोगों को अपना पीएफ का पैसा कब निकालना है, सरकार इसपर भी अपना नियंत्रण रखना चाहती थी.

पीएफ खाताधारकों की परेशानी खत्म, निकाल सकते हैं पूरा पैसा

इस बीच ईपीएफओ ने 1952 की ईपीएफ स्कीम के मानकों को संशोधित करते हुए सेवानिवृत होने वाले कर्मचारियों द्वारा इस पैसे को निकालने की आयु सीमा बढ़ाते हुए उसे 54 वर्ष से 58 वर्ष कर दिया.

इसके अलावा ईपीएफओ ने यह भी अनिवार्य कर दिया कि खाताधारक के दो महीने से अधिक समय तक बेरोजगार रहने की स्थिति में सिर्फ अपना अंशदान और ऊपर अर्जित किये गये ब्याज की ही निकासी कर सकता है. वहीं पीएफ खाते में कंपनी द्वारा डाले गए पैसे को खाताधारक सिर्फ खाते के परिपक्व होने पर ही निकाल सकता है.

नए नियमों के मुताबिक पीएफ खाताधारक कुछ विशेष स्थितियों में खाते से पूरा पैसा निकाल सकेंगे

पीएफ निकासी से संबंधित यह अधिसूचना मूल रूप से 10 फरवरी से लागू होनी थी लेकिन बाद में इसे 30 अप्रैल तक रोक दिया गया. अब 31 जुलाई तक इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला लिया गया है.

हालांकि, ईपीएफ एक्ट में किए गए संशोधनों पर विभिन्न मजदूर संगठनों ने एकजुट प्रदर्शन किया. और सरकार को इस मुद्दे भी पर अपने कदम वापस खींचते हुए अधिसूचना को वापस लेना पड़ा.

एनडीए सरकार को क्या सबक सीखना चाहिए?

भारत में मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के पास सामाजिक सुरक्षा का कोई विकल्प मौजूद नहीं है. अगर हम बीते एक वर्ष में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रास्फीति को काफी हद तक काबू में लाते हुए उसे नीचे रखने में कामयाब रहने से इतर देखें तो बीते 8 वर्षों से देश की जनता उच्च मुद्रास्फीति का सामना कर रही है. इसके चलते लोगों को अपनी बचत पर अच्छा लाभ देने वाले विकल्पों की कमी से जूझना पड़ा है.

उल्टी पड़ी ईपीएफ पर कराधान की कोशिश

साथ ही हमेशा से लोग ईपीएफ के पैसे से बुरे समय में, बच्चों की शिक्षा, परिवार में शादी-ब्याह या फिर घर के निर्माण जैसे कामों में खर्च करते रहे हैं.  ईपीएफ में पैसा बचाने की जुगत में लोग अपनी दैनिक आवश्यकताओं में काफी कटौती करते हैं ताकि वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण और नाजुक समय में उस पैसे का इस्तेमाल कर सकें.

इस सबके ऊपर केंद्र सरकार बीते दो बजटों में मध्यम वर्ग को कुछ भी देने में असफल साबित हुई है.

इनकम टैक्स के स्लैब को बढाया नहीं गया है और इस दौरान लोगों की आय में भी कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है. ऐसे परिदृश्य में विपक्ष और मजदूर संगठनों के लिये इस मुद्दे पर मध्यम वर्ग को लामबंद करना कोई मुश्किल काम नहीं था.

सरकार के लिए शर्मिंदगी

मध्यम वर्ग का वोट हर सरकार के लिए बेहद मायने रखता है क्योंकि चुनावी राजनीति में उसकी आवाज सबसे बुलंद होती है. मध्यम वर्ग द्वारा इस मसले पर एनडीए के बड़े पैमाने पर किये गए विरोध ने विपक्ष को इस सरकार को जनविरोधी साबित करने का एक मौका दे दिया है.

सरकार ने ईपीएफ की रकम के 60 फीसदी हिस्से पर कर लगाए जाने का प्रस्ताव रखा था

यूपीए की सरकार के दौरान बीजेपी ने पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार की नाक में दम कर दिया था. अब परिदृश्य बिल्कल उल्टा हो गया है. मजदूर संगठनों के साथ कांग्रेस भी मध्यम वर्ग को इस सरकार को आम आदमी की विरोधी साबित करते हुए उद्योगपतियों के हित में काम करने वाला बता रही है.

व्यापारी समुदाय की शिकायत

केंद्र सरकार द्वारा चांदी के अलावा अन्य प्रकार के आभूषणों पर एक प्रतिशत एक्साईज ड्यूटी लगाने का निर्णय भी उसके खिलाफ जा रहा है.

सरकार के इस फैसले के विरोध में देश के कई हिस्सों के तमाम सुनार, बुलियन व्यापारी और सर्राफा कारीगरों ने 43 दिनों की हड़ताल की. हालांकि सरकार द्वारा इस फैसले पर झुकने के कोई लक्षण न दिखाने के बाद इन लोगों को अपनी हड़ताल समाप्त करनी पड़ी. लेकिन आने वाले चुनावों में बीजेपी को पता चलेगा कि वह सुनार समुदाय के अपने इस पारंपरिक वोट बैंक से हाथ धो चुकी है.

ईपीएफ पर कर लगाने का क्या मतलब?

जेटली बीते दो वर्षों से अर्थव्यवस्था को ठीक तरीके से नहीं संभालने और चलाने के कारण आलोचनाओं के घेरे में रहे हैं. 2016 के इस बजट के बाद उन्हें मध्यम वर्ग और सुनार समुदाय जैसे पारंपरिक वोट बैंक के पार्टी से छिटक जाने के चलते एक और आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए.

First published: 21 April 2016, 20:03 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी