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बिल्डरों के वादों पे मारे जा रहे हैं घरौंदे का सपना देखने वाले

कैच ब्यूरो | Updated on: 22 April 2016, 20:50 IST

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बड़े बिल्डरों के प्रोजेक्ट में फ्लैट खरीदने वाले हजारों खरीदारों के सामने अपने आशियाने को पाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. बिल्डरों के खिलाफ झूठे वादे करने और समय पर निर्माण न करने की शिकायतों के पुलिंदे बढ़ते जा रहे हैं. 

शिकायतकर्ताओं में तमाम ऐसे हैं जिन्होंने अपने बचत की रकम को इन फ्लैटों को खरीदने में दे दिया था जबकि काफी तादाद ऐसे खरीदारों की है जिन्होंने बैंकों से मोटी ब्याज दर पर होम लोन लिया था. होम लोन लेने वाले खरीदारों के सामने दोहरी परेशानी है कि वे अपने मौजूदा घर का किराया भी दें और होम लोन की ईएमआई भी चुकाएं.

खरीदारों के बीच बढ़ती नाराजगी के चलते मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी इस मामले में सामने आना पड़ा और उन्होंने नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को इसे जल्द सुलटाने के निर्देश दिए.

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ग्रेटर नोएडा में तमाम बिल्डर ऐसे हैं जो ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण को कब्जा प्रमाणपत्र पाने के लिए पैसे नहीं चुका पा रहे हैं. जानकारी के मुताबिक बिल्डरों को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को 300 करोड़ रुपये चुकाने हैं. 

बिना कब्जा प्रमाणपत्र के बिल्डर से अपार्टमेंट्स का स्वामित्व वहां के स्वामियों को नहीं मिल सकता. हालांकि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के सीईओ आश्वासन देते हैं कि वे मामले को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं.

नोएडा प्राधिकरण द्वारा आम्रपाली बिल्डर्स के चेयरमैन अनिल शर्मा को समन भेजा और निर्देश दिया कि जल्द मामला सुलझाएं

खबर है कि इसके पड़ोसी नोएडा में 50 से 70 हजार होम बायर्स पिछले चार-पांच सालों से परेशान हैं. 127 में से 86 निर्माणाधीन प्रोजेक्ट कब्जा प्रमाणपत्र पाने का इंतजार कर रहे हैं और खरीदार दुविधा में हैं. 

इनमें से कुछ जिनके अपार्टमेंट का आवंटन किया जा चुका है वो बिल्डरों को पंजीकरण राशि देने के बावजूद भी कागजों का इंतजार कर रहे हैं. खबर है कि खरीदारों ने दावा किया कि स्वामित्व वाले कानूनी दस्तावेज की जगह उन्हें केवल खाली स्टांप पेपर दिए गए हैं.

जहां बिल्डरों का दावा है कि नोएडा प्राधिकरण उन्हें अनापत्ति प्रमाणपत्र देने में देरी कर रहा है, वहीं प्राधिकरण का कहना है कि बिल्डरों ने अब तक उनकी बकाया रकम का भुगतान नहीं किया. 

एक अनुमान के मुताबिक नोएडा में 2006 से लेकर 2009 तक के बीच आवंटित किए गए भूखंडों के लिए बिल्डरों के ऊपर प्राधिकरण के 7,200 करोड़ रुपये बकाया हैं. 

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ऐसे में हजारों लोग इन प्रोजेक्टों के पूरा होने की राह देख रहे हैं. गौरतलब है कि 2007 से लेकर 2012 तक उत्तर प्रदेश में बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) सरकार की मुखिया मायावती थीं.

खरीदारों को निर्धारित समय में फ्लैट देने में नामाक रहे तमाम बिल्डर्स में से एक आम्रपाली बिल्डर्स को हाल ही में सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ छेड़े गए बड़े विरोध का सामना करना पड़ा. मामला इतना बढ़ गया कि नोएडा प्राधिकरण द्वारा आम्रपाली बिल्डर्स के चेयरमैन अनिल शर्मा को समन भेजा और निर्देश दिया कि जल्द मामला सुलझाएं.

इससे पहले भी इस समूह पर कर चोरी के संदेह में आयकर टीम द्वारा छापा मारा जा चुका है. यहां तक कि क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी भी 2014 में इसके जांच के दायरे में आ गए थे. 

उस वक्त आयकर विभाग आम्रपाली ग्रुप द्वारा धोनी को दिए गए 75 करोड़ रुपये के पोस्ट डेटेड चेकों के बारे में जानकारी चाहता था. उनके प्रवक्ता ने तब दावा किया था कि यह पोस्ट डेटेड चेक धोनी द्वारा ग्रुप में निवेश की गई रकम के बदले में दिए गए सिक्योरिटी अमाउंट हैं.

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ताजा विवाद के बाद आम्रपाली ग्रुप के ब्रांड एंबैसडर के रूप में काम करने वाले धोनी ने इससे खुद को अलग कर लिया. उनकी पत्नी साक्षी सिंह धोनी भी आम्रपाली ग्रुप में अनिल शर्मा के साथ ही एक निदेशक के तौर पर जुड़ी हैं. इससे पहले 2014 लोक सभा चुनाव में शर्मा जहानाबाद से जेडीयू उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ चुके हैं.

नोएडा प्राधिकरण ने खरीदारों की शिकायतों के समाधान और तमाम प्रोजेक्ट्स में औचक छापेमारी के लिए छह सदस्यीय एक समिति का भी गठन किया है.

इस बीच एक अन्य मामले में खरीदारों की शिकायत के बाद ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने सुपरटेक के एक प्रोजेक्ट में बने 1009 फ्लैटों और विला को सील करने का आदेश सुना दिया. 

प्राधिकरण का दावा है कि ग्रेटर नोएडा स्थित ओमीक्रॉन 1 में सुपरटेक के सीजेडएआर कॉम्प्लेक्स में केवल 814 फ्लैटों और विला के निर्माण की अनुमित थी. 

प्राधिकरण का कहना है कि अतिरिक्त यूनिटों के निर्माण के बाद बिल्डर अनुमति के लिए आवेदन नहीं कर सकता

वहीं, बिल्डर ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि उसने कुछ गलत नहीं किया. उन्होंने प्राधिकरण से फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) खरीदने के बाद ही अतिरिक्त फ्लैटों-विला का निर्माण किया है और प्राधिकरण को स्वीकृति के लिए संशोधित बिल्डिंग प्लान भी सौंप दिया है. 

इस पर प्राधिकरण का कहना है कि अतिरिक्त यूनिटों के निर्माण के बाद बिल्डर अनुमति के लिए आवेदन नहीं कर सकता. बिल्डर पहले ही 1009 फ्लैट-विला में से आधे बेच चुका है.

यह पहला मामला नहीं है जब सुपरटेक मुसीबत में फंसा है. इससे पहले एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि नोएडा में बनने वाले सुपरटेक के एमरैल्ड कोर्ट प्रोजेक्ट को ढहा दिया जाए क्योंकि बिल्डर के पास केवल 24 मंजिला इमारत के निर्माण की अनुमति थी लेकिन उसने बाद में इसे 40 मंजिला तक निर्मित कर दिया. 

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और वहां से बिल्डर को स्टे मिल गया, हालांकि अभी फैसला आना बाकी है.

First published: 22 April 2016, 20:50 IST
 
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