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एस्सार लीक्स: जिस जेपीसी को अमर सिंह 'मैनेज' कर रहे थे वह केतन पारेख कांड से जुड़ा था और रिलायंस को राहत मिली थी

अभिषेक पराशर | Updated on: 18 June 2016, 15:29 IST
QUICK PILL
  • एस्सार लीक में 28 नवंबर 2002 को अमर सिंह और समता पार्टी के तत्कालीन सांसद कुंवर अखिलेश सिंह के बीच हो रही बातचीत यह बताती है कि किस तरह से अमर सिंह ने रिलायंस की तरफ से काम करते हुए शेयर मार्केट घोटाले की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की जांच को प्रभावित किया.
  • एनएसई में एएलबीएम और बीएसई में बीएलईएसएस में सबसे बड़ी भागीदार रही रिलांयस शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स लिमिटेड (आरएसएसबीएल) को जांच में क्लीन चिट दी गई. रिलायंस शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स लिमिटेेड ने 28 फरवरी 2001 से लेकर 7 मार्च 2001 के बीच बाजार से 1900 करोड़ रुपये निकाले.
  • जेपीसी की रिपोर्ट के मुताबिक 2001 में क्रैश की वजह बाजार से बड़ी मात्रा में निकाली गई रकम थी या फिर बड़े खिलाड़ियों ने पैसे निकाल लिए क्योंकि उन्हें बाजार की चाल का अंदाजा था.

एस्सार लीक में 28 नवंबर 2002 को अमर सिंह और समता पार्टी के तत्कालीन सांसद कुंवर अखिलेश सिंह के बीच हो रही बातचीत यह बताती है कि किस तरह से अमर सिंह ने रिलायंस के लिए काम करते हुए शेयर मार्केट घोटाले की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की जांच को प्रभावित किया. 

साफ शब्दों में कहा जाए तो वह शेयर मार्केट स्कैम की जांच के लिए गठित जेपीसी को मैनेज करने में सफल रहे ताकि केतन पारेख घोटाला मामले में कंपनी को बचाया जा सके. 

केतन पारेख घोटाले की जांच के लिए 26 अप्रैल 2001 को गठित जेपीसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि घोटाले के पीछे  केतन पारेख, बैंकों और कॉरपोरेट की मिलीभगत थी. 

रिपोर्ट 15 कंपनियों के ट्रेडिंग पैटर्न में आई अनियमितताओं का विस्तार से जिक्र करते हुए इस पर मुहर लगाती है. अडानी एक्सपोर्ट्स लिमिटेड और जी टेलीफिल्म्स लिमिटेड (जेआईएल), ल्यूपिन और रैनबैक्सी समेत कुल 15 कंपनियों के प्रोमोटर्स की केतन पारेख से मिलीभगत थी.

वहीं एनएसई में एएलबीएम और बीएसई में बीएलईएसएस में सबसे बड़ी भागीदार रही रिलांयस शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स लिमिटेड (आरएसएसबीएल) को जांच में क्लीन चिट दी गई. रिलायंस शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स लिमिटेेड ने 28 फरवरी 2001 से लेकर 7 मार्च 2001 के बीच बाजार से 1900 करोड़ रुपये निकाले. 

जेपीसी की रिपोर्ट के मुताबिक 2001 में क्रैश की वजह बाजार से बड़ी मात्रा में निकाली गई रकम थी या फिर बड़े खिलाड़ियों ने पैसे निकाल लिए क्योंकि उन्हें बाजार की चाल का अंदाजा हो गया था.

रिलायंस को क्लीन चिट

ऑटोमेटेड लेंडिंग एंड बॉरोइंग मैकेनिज्म (एएलबीएम) के दुरुपयोग की शिकायतों की जांच के दौरान समिति को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा. 

एएलबीएम की शुरुआत एनएसई ने फरवरी 1999 में की. जिसे दिसंबर 1999 में संशोधित कर दिया गया. मार्च 2000 तक इसका टर्नओवर न के बराबर यानी करीब 10 करोड़ रुपये था. जो अप्रैल 2000 में बढ़कर 700 करोड़ रुपये हो गया.

अप्रैल 2000 से मार्च 2001 के बीच एनएसई में सामान्य सेगमेंट में कुल टर्नओवर करीब 12,50,000 करोड़ रुपये रहा, जिसमें एएलबीएम की हिस्सेदारी 85,000 करोड़ रुपये की थी. यह एनएसई के कुल टर्नओवर का 6.8 फीसदी था. 

इस स्कीम में रिलायंस शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर लिमिटेड (आरएसएसबीएल)सबसे बड़ी खिलाड़ी थी. अप्रैल 2000 से मार्च 2001 के बीच हुए वॉल्यूम ट्रेड में कंपनी की हिस्सेदारी 39 फीसदी रही.  

इसके अलावा अक्टूबर 2000 से मार्च 2001 के बीच एएलबीएम के बॉरो ट्रांजैक्शंस में ब्रोकर कंपनी की हिस्सेदारी 65 फीसदी थी. इसलिए समिति ने एनएसई में एएलबीएम की जांच के लिए आरएसएसबीएल और उसकी क्लाइंट कंपनी रिलायंस पेट्रोलियम लिमिटेड को ही चुना.

सेबी ने जेपीसी को बताया कि आंकड़ों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि एएलबीएम का गलत इस्तेमाल नहीं किया गया. वहीं एनएसई ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि एएलबीएम बाजार के क्रैश होने के लिए जिम्मेदार नहीं था.

सेबी के मुताबिक रिलायंस शेयर्स एंड स्टॉक ब्रोकर्स लिमिटेड एनएसई में एएलबीएम और बीएसई में बीएलईएसएस की सबसे बड़ी खिलाड़ी थी. फरवरी 2001 तक कंपनी ने इसमें करीब 1,900 करोड़ रुपये डाले. यह पूरी रकम 28 फरवरी 2001 से लेकर 7 मार्च 2001 के बीच निकाल ली गई.

जेपीसी की रिपोर्ट के मुताबिक 2001 में मार्केट के क्रैश की वजह बाजार से बड़ी मात्रा में निकाली गई रकम थी

जब जेपीसी ने इस निकासी से बाजार पर पड़ने वाले असर के बारे में सेबी से पूछा तो उसने मौखिक तौर पर कहा कि इससे निश्चित तौर पर शेयरों की कीमत पर असर पड़ेगा. लेकिन लिखित जवाब में सेबी ने बताया कि किसी एक कंपनी की तरफ से इतनी बड़ी मात्रा में रकम निकालना गैर कानूनी नहीं है. 

इसी मामले में केतन पारेख ने जेपीसी को लिखित में बताया, 'बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकालने से उस पर असर पड़ता है. इससे कैरी फॉरवर्ड की लागत बढ़ जाती है. अगर फरवरी-मार्च 2001 में दस दिनों के भीतर 2,000 करोड़ रुपये निकाले जाते है तो तेजड़ियों को या अपनी होल्डिंग बेचनी पड़ेगी या फिर उन्हें डिलीवरी लेनी होगी.'

एक झटके में बाजार से इनती बड़ी रकम निकालने के बारे में सफाई देते हुए रिलायंस पेट्रोलियम ने कहा, 'एएलबीएम सेगमेंट में हमने सबसे अधिक 1,600 करोड़ रुपये का निवेश किया था. हमने मार्च 2001 में इसे घटाकर शून्य कर दिया. ब्याज आय में कमी, हमारी कारोबारी जरूरतें और स्टॉक एक्सचेंज में कथित रूप से होने वाली पेमेंट संकट के बारे में बाजार का बढ़ता पर्सेप्शन और उतार-चढ़ाव की वजह से हमने ऐसा किया.'

1999 से 2000 की शुरुआत में बाजार में जबरदस्त तेजी आई. जून 2000 के बाद से बाजर गिरने लगा, लेकिन उसकी रफ्तार धीमी थी. मार्च 2001 के बाद बाजार क्रैश कर गया.

समिति ने पाया कि क्रैश की वजह बाजार से बड़ी मात्रा में निकाली गई रकम थी या फिर बड़े खिलाड़ियों ने पैसे निकाल लिए क्योंकि उन्हें बाजार की चाल का अंदाजा था.

एस्सार लीक के बाद सार्वजनिक हुई बातचीत बताती है, 'रिलायंस की तरफ से जेपीसी के अध्यक्ष प्रकाश मणि त्रिपाठी, एस एस आहलूवालिया, प्रफुल्ल पटेल, प्रेम चंद गुप्ता और किरीट सोमैया को पैसे दिए गए ताकि रिलायंस इंडिया लिमिटेड को मदद पहुंचाई जा सके.' उत्तर प्रदेश के देवरिया से बीजेपी के सांसद रहे प्रकाश मणि त्रिपाठी के बेटे उस वक्त रिलायंस के लिए काम कर रहे थे. 

कॉरपोरेट की मिलीभगत से हुआ था घोटाला

जनवरी 2001 में सेंसेक्स करीब 4,000  पर कारोबार कर रहा था. 15 फरवरी 2001 को यह अपने उच्चतम स्तर 4,437 पर जा पहुंचा. इसके बाद सेंसेक्स लुढ़कने लगा और यह 27 फरवरी 2001 को यह 4069 पर बंद हुआ. निफ्टी में भी यही ट्रेंड देखने को मिला. 

2001-02 के बजट के दिन यानी 28 फरवरी को सेंसेक्स 4070 पर खुला और 177 अंक चढ़कर 4247 पर बंद हुआ. 1 मार्च 2002 को  सेंसेक्स में 24 अंक की तेजी आई. लेकिन 2 मार्च को सेंसेक्स में जबरदस्त उतार-चढ़ाव के बाद इस आशंका को बल मिलने लगा कि शेयर बाजार में सब कुछ ठीक नहीं है. 

इस दिन सेंसेक्स 4323 पर खुला और अंत में 4095 पर बंद हुआ. एक दिन के कारोबार के भीतर सेंसेक्स में 246 अंकों की गिरावट दर्ज की गई. 

सिर्फ सेंसेक्स की चाल चौंकाने वाली नहीं थी बल्कि इस उठापटक में कुछ शेयरों की कीमतों में भी जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला. 7 मार्च 2001 को संसद के शून्य काल में यह मुद्दा उठा. 

सदस्यों ने सदन को बताया कि शेयर बाजार की चाल प्रत्याशित नहीं है और इसमें हस्तक्षेप किया जा रहा है. उन्होंने बैंकों के फंड के गलत इस्तेमाल की आशंका जताते हुए सदन को बताया कि अगर यह सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो बैंकों में जमा रकम खतरे में पड़ जाएगी. सांसदों ने कहा कि शेयर बाजार में जानबूझकर की जा रही छेड़छाड़ से छोटे निवेशकों की संपत्ति खत्म हो रही है.

संसद के दोनों सदनों में उठ रही आवाज को देखते हुए लोकसभा ने 26 अप्रैल 2001 को  मामले की जांच के लिए श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया.

लोकसभा ने सदन की मांग पर 26 अप्रैल 2001 को श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में संयुक्त संसदीय समित बनाई

1999 से 2000 की शुरुआत में बाजार विशेषकर (आईसीई) इंफॉर्मेशन, कम्युनिकेशन और एंटरटेनमेंट के शेयरों में जबरदस्त तेजी आई. जून 2000 के बाद से बाजर में गिरने लगा, लेकिन उसकी रफ्तार धीमी थी. लेकिन मार्च 2001 के बाद बाजार क्रैश कर गया. 

समिति ने पाया कि क्रैश की वजह बाजार से बड़ी मात्रा में निकाली गई रकम थी या फिर बड़े खिलाड़ियों ने पैसे निकाल लिए क्योंकि उन्हें बाजार की चाल का अंदाजा था.

समिति ने पाया कि जब सेंसेक्स तेजी से गिर रहा था तब उसे बैंकों और कॉरपोरेट से बड़ी मात्रा में पैसे मिल रहे थे. इसके बाद समिति को यह विश्वास करने में देर नहीं लगी कि इस पूरे घोटाले के पीछे  केतन पारेख, बैंकों और कॉरपोरेट की मिलीभगत थी. 

अडानी एक्सपोर्ट्स लिमिटेड

10 नवंबर 1999 को अडानी एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के शेयर की कीमत 621 रुपये थी जो 10 दिसंबर 1999 को अपने उच्चतम स्तर 1,271 रुपये पर पहुंच गई. अडानी एक्सपोर्ट्स के प्रोमोटर्स और सहायक कंपनियों ने क्रॉस डील की मदद से केतन पारेख की कंपनियों को शेयर बेचे. 

नवंबर 1999 में अडानी एक्सपोर्ट्स से जुड़ी कंपनियों ने केतन पारेख की कंपनियों को कुल 5 लाख शेयर बेचें. केतन पारेख की कंपनियों की तरफ से की जाने वाली खरीद बिक्री बताती है कि अडानी एक्सपोर्ट्स के शेयर में झूठे तरीके से वॉल्यूम ट्रेडिंग दिखाई जा रही थी.

सेबी ने पाया कि अडानी ग्रुप और केपी ग्रुप (केतन पारेख ग्रुप) के बीच मजबूत रिश्ते थे. सेबी के मुताबिक दोनों कंपनियों के बीच हो रहे करोड़ों रुपये के लेन-देन में किसी तरह का ब्याज नहीं लिया गया. जांच के मुताबिक अडानी समूह ने केतन पारेख को करीब 340 करोड़ रुपये दिए लेकिन उसे बदले में महज 208 करोड़ रुपये मिले.

इतना ही नहीं केतन पारेख के पास 29 दिसंबर 2000 तक  अडानी ग्रुप की कंपनी अडानी पोर्ट्स लिमिटेड के 32 लाख शेयर थे. 

जी टेलीफिल्म्स लिमिटेड

1 अक्टूबर 1999 को कंपनी के शेयर की कीमत 476 रुपये थी जो 24 फरवरी 2000 में बढ़कर 1,555 रुपये हो गई. कीमत में की गई छेड़छाड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 30 मार्च 2011 को शेयर की कीमत महज 121 रुपये हो गई.

एस्सेल ग्रुप की इनवेस्टमेंट यूनिट ने केतन पारेख की कंपनियों को 2-5-2000 से 25-4-2001 के बीच 706.40 करोड़ रुपये दिए. इसमें से उसे 251.55 करोड़ रुपये वापस मिल गए. दोनों कंपनियों के बीच हुए लेन-देन बताते हैं कि दोनों कंपनियों के बीच फंड का लेन-देन कंपनी के शेयरों में गिरावट के बाद शुरू हुआ.

रिपोर्ट के मुताबिक केपी ग्रुप की कंपनियों ने एस्सेल ग्रुप की तरफ से दिए गए फंड का इस्तेमाल ही नहीं किया. एस्सेल ग्रुप ने केपी ग्रुप को पैसा देते हुए यह अंडरटेकिंग ली थी कि वह इन पैसों से जी टेलीफिल्म्स और एस्सेल पैकेजिंग लिमिटेड के शेयरों की खरीदारी नहीं करेगी. 

कोलकाता स्टॉक एक्सेंज के डिफॉल्टर्स ब्रोकर्स समूह एच सी बियानी, सिंघानिया और पोद्दार ग्रुप ने जी टेलीफिल्म्स लिमिटेड के शेयरों में लगातार खरीदारी की. कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज में डी के सिंघानिया ग्रुप और पोद्दार ग्रुप की तरफ से की गई खरीदारी में केपी समूह की कंपनियों की बड़ी भूमिका थी.

इनके अलावा एफ्टेक इंफोसिस लिमिटेड, सायबरस्पेस इंफोसिस लिमिटेड, डीएसक्यू सॉफ्टवेयर, ग्लोबल टेलीसिस्टम्स लिमिटेड, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक, एचएफसीएल, ल्यूपिन लेबोरेटरीज, पदमिनी टेक्नोलॉजिज, पेंटामीडिया ग्राफिक्स लिमिटेड, रैनबैक्सी लेबोरेटरीज, शंख टेक्नोलॉजिज इंटरनेशनल लिमिटेड और एसएसएल लिमिटेड के प्रोमोटर्स और उसकी सहयोगी कंपनियों का केतन पारेख की कंपनियों के बीच सांठ-गांठ होने का खुलासा हुआ.

त्रिपाठी की अध्यक्षता में गठित जेपीसी में लोकसभा के 20 जबकि राज्यसभा के 10 सांसद शामिल थे. लोकसभा सांसदों में मणिशंकर अय्यर, माग्रेट अल्वा, विजेंद्र पाल सिंह बदनौर, राशिद अल्वी, सी कुप्पुस्वामी, जगन्नाथ मलिक, रुपचंद पाल, पी एच पंडियन, प्रवीण राष्ट्रपाल, जयपाल रेड्डी, कुंवर अखिलेश सिंह, महेश्वर सिंह, प्रभुनाथ सिंह, किरीट सोमैया, के येरानायडू, सी पी राधाकृष्णन, खारबेल स्वेन, श्रीचंद कृपलानी और अनंत गीते शामिल थे. 

जबकि राज्यसभा से एस एस आहलूवालिया, श्री नोलात्पल बसु, के रहमान खान, प्रफुल्ल पटेल, कपिल सिब्बल, सी रामचंद्र, सी पी तिरुनवाकरासु, प्रेम चंद गुप्ता,अमर सिंह और ललितभाई मेहता शामिल थे.  

कैच एस्सार लीक में सामने आए खुलासे को सत्यापित नहीं करता है. 

First published: 18 June 2016, 15:29 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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