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बेहाल खेतिहर: भारत के हर किसान परिवार पर है 50 हजार का कर्ज

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 30 May 2016, 8:41 IST
(गेट्टी इमेजेज़)
QUICK PILL
  • किसानों को बचाने के लिए सरकार की पहल नाकामयाब रही है. कर्ज और फसल का खराब हो जाना, किसानों की आत्महत्या की दो अहम वजहें बतायी जाती हैं.
  • पिछले कुछ वर्षों में वर्षा की भारी कमी से कृषि कार्य प्रभावित रहे हैं, जिसकी वजह से फसलें बर्बाद हुई हैं, उत्पादन कम हुआ है और किसानों की आमदनी घट गई है.
50,000
रुपए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के दो साल पूरे होने के उत्सव के बीच देश के समक्ष कुछ अहम चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं. उन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. ये हैं- सूखा और किसानों की आत्महत्या.

कृषि अभी भी भारतीयों की आजीविका का आधार है.साल 2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग 56 फीसदी कामकाजी लोग देश में अभी भी कृषि व्यवसायों में लगे हुए हैं.दुर्भाग्य की बात यह है कि कृषि उत्पादकता कम है, सिंचाई की सुविधाएं खराब हैं और भंडारण व बिक्री का ढांचा बिखरा हुआ है. आइए कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं जिनसे आपको भारतीय कृषि की मौजूदा स्थिति का एक अंदाजा मिल सकेगा.

1130

किसानों ने महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में साल 2015 में जान दी. (मीडिया की रपटों के मुताबिक)

साल 2016 के पहले चार महीनों में इस क्षेत्र में लगभग 400 किसानों ने खुदकुशी कर ली. इससे यह जाहिर होता है कि किसानों को बचाने के लिए सरकार की पहल नाकामयाब रही है.

कर्ज और फसल का खराब हो जाना, किसानों की आत्महत्या की दो अहम वजहें बतायी जाती हैं.

47,000
रुपए

औसतन हर खेतिहर परिवार पर कर्ज है (नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के अध्ययन के मुताबिक).

इसमें से एक-चौथाई कर्ज ‘कृषि/पेशेवर’ साहूकारों (सूदखोरों) से लिया गया है.

अनुमान के मुताबिक, किसानों की औसत मासिक आमदनी 6,426 रुपये और उनका औसत मासिक उपभोग खर्च 6,423 रुपये है.

12
करोड़

हेक्टेयर जमीन कम गुणवत्ता वाली है और संभवतः इसकी वजह से उत्पादकता में कमी होती है.

यह जर्मनी के आकार का लगभग चार गुना है.इसमें से 8.26 करोड़ हेक्टेयर जमीन की गुणवत्ता जल से होने वाले कटाव से, 2.4 करोड़ हेक्टेयर रासायनिक कारकों से, 1.2 करोड़ हेक्टेयर हवा की वजह से कटाव से और 10 लाख हेक्टेयर भौतिक गड़बड़ियों के कारण खराब हुई है.

यदि भू-क्षरण (मिट्टी का कटाव) नहीं होता, तो भारत 1.34 करोड़ टन अतिरिक्त कृषि उत्पादन करने में कामयाब होता.

16,336
करोड़

रुपये नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फंड से 2012-15 के दौरान राज्यों को केंद्रीय सहायता के तौर पर दिये गये.

महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और ओडीशा जैसे राज्य पिछले कुछ वर्षों से वर्षा की भारी कमी से प्रभावित रहे हैं, जिसकी वजह से फसलें बर्बाद हुई हैं, उत्पादन कम हुआ है और किसानों की आमदनी घट गई है.

भारत के कुल 688 जिलों में से लगभग 572 जलवायु परिवर्तन के लिहाज से संवेदनशील हैं.17% देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि और सहायक सेवाओं का अनुमानित योगदान (साल 2015-16 में).

साल 2011-12 में जीडीपी में इसका योगदान 18.5 फीसदी था और 2014-15 में घट कर 17.4 फीसदी हो गया.

फरवरी 2016 में राज्यसभा में दिये गये एक लिखित उत्तर के मुताबिक, “कुल जीडीपी में कृषि और सहायक क्षेत्रों के योगदान में कमी की मुख्य वजह है भारत का पारंपरिक कृषि अर्थव्यवस्था से उद्योग और सेवा-केंद्रित अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ना.”

52
%

साल 2012-13 के दौरान कुल बुवाई क्षेत्र में से असिंचित क्षेत्र की हिस्सेदारी (लैंड यूज स्टैटिस्टिक्स 2012-13 की रिपोर्ट के मुताबिक).

कुल मिला कर 73,829 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि असिंचित रहती है.

सिंचाई व्यवस्था को बेहतर करने के लिए मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) की शुरुआत की है, जिसका लक्ष्य नये जल संसाधनों का निर्माण, जलाशयों का नवीनीकरण, भूजल विकास आदि है.हालांकि, साल 2015-16 के लिए पूंजी उपयोग का हाल निराशाजनक रहा. आवंटित 4,300 करोड़ रुपये में से केवल 2,094 करोड़ रुपये ही जारी हुए.

First published: 30 May 2016, 8:41 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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