Home » बिज़नेस » Catch Hindi: Hindi News, Catch Hindi, Arun Jaitley, finance minister, India, budget, ecoomy, FMCG, Growth, farmers, YK Alagh, Ajay Jakhar, Bharat Krishak Samaj, Neeraj Thakur, Soumya Shankar
 

अरुण जेटली के इस बज़ट से भारतीय किसानों को क्या चाहिए

नीरज ठाकुर सौम्या शर्मा | Updated on: 26 February 2016, 15:03 IST
QUICK PILL
अरुण\r\n जेटली 29 फरवरी को बज़ट पेश करेंगे. अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरती जिंस \r\nकीमत, ठोस नीति का अभाव और अस्थिर निवेश सरकार के लिए चिंता का विषय हैं. \r\nऐसे माहौल में सरकार को ये तय करना है कि वो बेरोजगारों की फौज में हर साल \r\nजुड़ने वाले लाखों नौजवानों को काम दिलाने के लिए कौन सा रास्ता अख्तियार \r\nकरे.कैच न्यूज बज़ट पर विशेष शृंखला प्रस्तुत कर रहा है. इस शृंखला \r\nमें हम बताएंगे कि भारत के विभिन्न वर्गों और समुदायों को इस बज़ट से क्या \r\nउम्मीदें हैं. इसकी पहली कड़ी हम किसानों की बेहतरी के लिए उठाए जा सकने \r\nवाले कदमों की बात करेंगे.
भारतीय किसान पिछले दो साल से सूखे के शिकार हो रहे हैं. साल 2014 में 5,650 किसानों ने आत्मत्या की. साल 2015 के आंकड़े के इससे भी ज्यादा रहने की आशंका है.

भारत का दावा है कि वो 7.5 प्रतिशत की दर से दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है.

भारतीय नीति नियंताओं को किसानों की आत्महत्या की शायद ज्यादा फिक्र नहीं है क्योंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खेती का मौजूदा हिस्सा महज 17 प्रतिशत है. मौजूदा कृषि संकट भारतीय कार्पोरेट जगत के लिए अच्छी खबर नहीं है. ऑटोमोबाइल से लेकर एफएमसीजी सेक्टर की कंपनियां भारतीय ग्रामीण बाजार में मांग की कमी से परेशान हैं.

पढ़ेंः भारतीय अर्थव्यवस्थाः जस मनमोहन राज में तस मोदी राज में

1990 के दशक से ही सरकार कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा करती आ रही है. उसका पूरा ध्यान निर्माण और सेवा क्षेत्र पर रहा. भारतीय कामगार वर्ग का 49 प्रतिशत हिस्सा अभी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है. भारत अगर जल्द खेती के संकट से नहीं उबरा तो इसका व्यापक कुप्रभाव सभी कारोबारी सेक्टरों पर पड़ेगा.

एक बज़ट में शायद खेती से जुड़े सभी संकटों को हल नहीं किया जा सकता लेकिन सरकार फौरी तौर पर कुछ कदम जरूर उठा सकती है.

सरकार के लिए सुझाव


पूर्व केंद्रीय मंत्री और जानेमाने कृषि अर्थशास्त्री वाईके अलघ ने कैच से कहा, "सरकार को सिंचाई और भूजल में सुधार के लिए ज्यादा आवंटन करना होगा. सरकार ऐसी परियोजनाओं के लिए पर्याप्त आर्थिक मदद नहीं दे रही है. केंद्र सरकार को ये तय करना होगा कि इससे जुड़ी परियोजनाओं को गंभीरता से लिया जाए. हम बारिश के भरोसे कब तक रह सकते हैं?"

अरुण जेटली ने पिछले साल के बज़ट में लघु-सिंचाई परियोजनाओं के लिए 5300 करोड़ रुपये आवंटित किए थे. अलघ मानते हैं कि ये राशि भारतीय कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए नाकाफी है.

भारतीय कामगार वर्ग का 49% कृषि क्षेत्र पर निर्भर है, वित्त मंत्री जेटली को बज़ट में ये याद रखना होगा

अलघ कहते हैं, "सरकार ये पैसा कृषि विभागों के अपने कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लिए खर्च करती है. परियोजनाओं के लिए बहुत ही कम राशि बचती है."

भारत में भूजल की खुदाई की दर एक लाख रुपये प्रति हेक्टेयर है. अलघ कहते हैं कि सरकार भूजल सिंचाई परियोजनाओं को लागू करने के मामले में एनजीओ के ऊपर निर्भर हो गयी है जो ग़लत है.

पढ़ेंः खेत संकट पर बोले नाबार्ड प्रमुख: ऋण प्रवाह में नहीं हुआ सुधार

अलघ कहते हैं, "अगर एनजीओ अपनी दुकान बंद कर लें तो? फिर इन परियोजनाओं को कौन लागू करेगा? मेरा मानना है कि सिंचाई का ढांचा विकसित करने का जिम्मा सरकार का है, चाहे इसकी जो भी कीमत चुकानी पड़े. सिंचाई व्यवस्था में सुधार के बिना भारतीय कृषि में सुधार नहीं आ सकता."

अलघ मानते हैं कि सरकार को प्रस्तावित स्मार्ट सिटी में कृषि बाजार विकसित करने पर भी ध्यान देना चाहिए ताकि किसान अपने उत्पाद को सीधे ग्राहकों को बेच सकें.

अलघ कहते हैं, "इन स्मार्ट सिटी में खाद्य प्रसंस्करण यूनिट होनी चाहिए ताकि किसान तैयार उत्पाद ग्राहकों को बेच सकें. अभी 10 लाख आबादी वाले शहरों में किसान बाजार नहीं हैं. अभी उन्हें अपने उत्पाद बिचौलिये को बेचने पड़ते हैं."

'द फ्यूचर ऑफ़ इंडियन एग्रीकल्चर' के लेखक अलघ कहते हैं कि प्रोड्यूसर कंपनियों को अपना कारोबार बढ़ाने के लिए अलग से फंड उपलब्ध कराना चाहिए ताकि वो अपना विस्तार कर सकें.

पिछले तीन सालों से भारतीय कृषि क्षेत्र की विकास दर करीब दो प्रतिशत रही है. जबकि लक्ष्य चार प्रतिशत का था

प्रोड्यूसर कंपनी में दस या उससे अधिक सदस्य होते हैं और उनमें से प्रत्येक मुख्यतः सब्जी, वनोत्पाद, मुर्गी पालन इत्यादि से जुडा होता है.

भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय जाखड़ कहते हैं कि सरकार को आयात को बढ़ावा देकर भारतीय कृषि उत्पादों की कीमत पर अपरोक्ष लगाम नहीं लगाना चाहिए.

पढ़ेंः हरित क्रांति बीत चुकी, फिलहाल पंजाब के किसान कर्ज के कुचक्र में हैं

जाखड़ हाल ही में पांच लाख टन ज्वार के आयात का उदाहरण देते हैं. ज्वार का उपयोग ज्यादातर मुर्गी पालन उद्योग में होता है.

जाखड़ कहते हैं, "भारत में ज्वार की पैदावार 30 क्विंटल प्रति एकड़ है. अगर सरकार ने ड्यूटी फ्री आयात न किया होता तो ज्वार का बाजार भाव 1500 से 1800 रुपये प्रति क्विंटल होता. इसका लाभ किसानों को मिलता. सरकार कारोबारी समूह के दबाव में आते हुए ज्वार के आयात की इजाज़त दे दी. इसका फायदा किसको हुआ? जाहिर है कि किसानों को नहीं हुआ."

अगले कुछ सालों तक जीडीपी की दो प्रतिशत राशि कृषि क्षेत्र के शोध एवं विकास पर खर्च करने की जरूरत हैः अजय जाखड़

जाखड़ ने कुछ अन्य मांगे भी रखीं. वो कहते हैं कि अगले कुछ सालों तक जीडीपी की दो प्रतिशत राशि कृषि क्षेत्र के शोध एवं विकास पर खर्च करने की जरूरत है.

मौजूदा सिंचाई परियोजनाओं की मरम्मत और रखरखाव के लिए फंड उपलब्ध कराना चाहिए. मौजूदा सिंचाई क्षेत्रों में ड्रेनेज की व्यवस्था करनी होगी. प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत वाले वाटरशेड मैनेजमेंट में 10 गुना बढ़ोतरी करने की जरूरत है. सरकार को 10 लाख छोटे जल स्रोतों के निर्माण के लिए भी फंड उपलब्ध कराना चाहिए.

कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट्स एंड प्राइसेज के पूर्व चेयरमैन अशोक गुलाटी कहते हैं कि हाल ही में घोषित फसल बीमा योजना के लिए ठोस आर्थिक ढांचे की घोषणा करनी चाहिए.

पढ़ेंः मजबूत होती अर्थव्यवस्था में दम तोड़ती खेती-किसानी

गुलाटी चाहते हैं कि किसानों को खाद पर दी जानी छूट को सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर की जाए.

दुनिया के सबसे अधिक कुपोषित 19 करोड़ 40 लाख लोग भारत में हैं. इन लोगों के लिए सात प्रतिशत से अधिक विकास की दर का कोई खास मतलब नहीं है. पिछले तीन सालों से भारतीय कृषि क्षेत्र की विकास दर करीब दो प्रतिशत रही है. जबकि लक्ष्य चार प्रतिशत की विकास दर हासिल करना था.

अगर सरकार भारत के सबसे बड़े रोजगार दाता क्षेत्र की इसी तरह अनदेखी करती रही तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. जिसका देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है.

First published: 26 February 2016, 15:03 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी