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विदेशी कंपनी के पास है आधार का सोर्स कोड, लोगों की निजी जानकारी तक है पहुंच

सुनील रावत | Updated on: 27 September 2018, 13:46 IST

सुप्रीम कोर्ट के संविधान बेंच के बहुमत ने आधार की वैधता को बरकरार रखा है लेकिन आधार की सुरक्षा पर  न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ के असंतोषजनक फैसले से कुछ गंभीर सवाल जरूर उठते हैं. न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ के फैसले में यह बात सामने आयी है कि न केंद्र सरकार और न ही भारत की विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) के पास डी-डुप्लिकेशन तकनीक के लिए स्रोत कोड है जो इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण भाग है.

जबकि आधार का सोर्स कोड एक विदेशी निगम से संबंधित है, यूआईडीएआई केवल एक लाइसेंसधारी है. सेंट्रल आइडेंटिटी डेटा रिपोजिटरी (सीआईडीआर) में बॉयोमीट्रिक डेटाबेस बॉयोमीट्रिक खोज और डी-डुप्लिकेशन एल्गोरिदम प्रदान करने वाले थर्ड पार्टी वेंडर तक पहुंच योग्य है. 2016 में आधार अधिनियम के से पहले यूआईडीएआई ने भारत के किसी भी निवासी से संबंधित किसी भी व्यक्तिगत जानकारी को प्रदान करने के लिए एल-1 आइडेंटिटी सोल्युशन (एक अमेरिकी इकाई जो बॉयोमीट्रिक स्टोरेज के लिए स्रोत कोड प्रदान करती है) के साथ अनुबंधित किया है.  

फैसले में यह बात सामने आती है कि नागरिकों ने इस कार्यक्रम में एनरोल किया और बिना किसी सहमति के यूआईडीएआई को अपने बॉयोमीट्रिक्स सौंप दिए. अनुबंध के तहत एल-1 आइडेंटिटी सोल्युशन बायोमेट्रिक सॉफ्टवेयर के स्वामित्व को बरकरार रखता है. यह भी प्रदान किया गया है कि एल-1 आइडेंटिटी सोल्युशन को यूआईडीएआई के डेटाबेस तक पहुंच और किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी दी जा सकती है.

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा यह अनुबंध में प्रदान किया गया है कि एल-1 आइडेंटिटी सोल्युशन यूआईडीएआई को इसके कारण होने वाली किसी भी हानि के खिलाफ क्षतिपूर्ति करेगा. हालांकि 1.2 अरब नागरिकों की संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी के लीक को केवल अनुबंधित क्षतिपूर्ति से नहीं सही किया जा सकता है.

वह डेटा का नुकसान अप्रत्याशित है. एक डिजिटल समाज में व्यक्ति को व्यक्तिगत जानकारी पर नियंत्रण बनाए रखने से खुद को बचाने का अधिकार होता है. 1.2 अरब नागरिकों के आंकड़ों की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है और अनुबंध द्वारा इसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती है.

उन्होंने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि यूआईडीएआई नामांकन की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए विभिन्न संस्थाओं के समझौते ज्ञापन (एमओयू) में प्रवेश कर चुका था. यूआईडीएआई और रजिस्ट्रारों के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन संविधान के अनुच्छेद 299 के दायरे में अनुबंध नहीं थे और इसलिए नामांकन के लिए रजिस्ट्रारों द्वारा लगाई गई निजी संस्थाओं द्वारा किए गए कार्यों को शामिल न करें.

जस्टिस चंद्रचूड़ के निर्णय में कहा गया है कि "चूंकि यूआईडीएआई और नामांकन एजेंसियों के बीच अनुबंध की कोई गोपनीयता नहीं है, इसलिए आधार अधिनियम से पहले नामांकन की प्रक्रिया में लगी निजी पार्टियों की गतिविधियों में कोई वैधानिक या कानूनी समर्थन नहीं है.

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First published: 27 September 2018, 13:35 IST
 
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