Home » बिज़नेस » Govt fines RIL Rs 2500 crore for not meeting KG basin production targets
 

केजी बेसिन में रिलायंस द्वारा उम्मीद के मुताबिक काम नहीं करने पर 2500 करोड़ का जुर्माना

नीरज ठाकुर | Updated on: 20 August 2016, 22:49 IST

भारत सरकार ने केजी बेसिन से गैस का उत्पादन लक्ष्य पूरा नहीं कर सकने के कारण रिलायंस इंडिया लिमिटेड (आरआईएल) और इसके साझेदारों पर 380 मिलियन डाॅलर (2500 करोड़ रुपए) का अतिरिक्त जुर्माना ठोका है. कंपनी और उसके साझेदारों ने केजी- डी-6 से 2014-15 में लक्ष्य से कम प्राकृतिक गैस का उत्पादन किया.

हाल के सालों के दौरान पांचवीं बार ऐसा हुआ है जब केजी बेसिन गैस क्षेत्र में कार्यरत किसी कंपनी पर इस तरह का जुर्माना लगाया गया है. अप्रैल 2010 के बाद से लक्ष्य से कम गैस उत्पादन के चलते लागत तक नहीं वसूली जा सकी.

अनुमानित जुर्माने की रकम करीब 2.76 अरब डाॅलर है. इससे पहले सरकार ने 2010-11 के लिए 3.15 अरब रुपए, 2011-12 के लिए लगभग 37 अरब रुपए, 2012-13 के लिए लगभग 53 अरब रुपए और 2013-14 के लिए लगभग 39 अरब रुपए लागत वसूली की मनाही कर दी थी.

रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अब तक के सारे जुर्मानों का विरोध किया है और सरकार के साथ सीधी बातचीत का रास्ता अपनाया

उत्पादन साझेदारी समझौते के मुताबिक आरआईएल और उसके साझेदार यूके की कम्पनी बीपी पीएलसी और कनाडा की निको रिसोर्सेज गैस की बिक्री से होने वाले लाभ में से अपनी पूंजी और खर्चा निकालने के बाद सरकार के साथ लाभ की राशि बांटते हैं.

हालांकि सरकार और केजी बेसिन में कार्यरत संचालकों के बीच विवाद के चलते सरकार संचालकों पर इस तरह के जुर्माने लगा रही है. रिलायंस इंडस्ट्रीज ने अब तक के सारे जुर्मानों का विरोध किया है और सरकार के साथ सीधी बातचीत का रास्ता अपनाया.

केजी डी 6 क्षेत्र में 2009 में उत्पादन शुरू हुआ था. वर्तमान में हो रहा गैस उत्पादन 8 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्युबिक मीटर प्रतिदिन है जो कि 2012 तक 80 एमएमएससीएमडी के लक्षित उत्पादन का दसवां हिस्सा है.

सरकार के अनुसार, क्षेत्र मंे आवश्यक कुओं की खुदाई के प्रति दिलचस्पी नहीं लेने और इनकी संख्या में कमी के चलते संचालक अपना लक्षित उत्पादन पूरा नहीं कर पा रहे हैं.

पृष्ठभूमि

2011 से पहले लगता था कि केजी बेसिन में सब कुछ ठीक-ठाक है लेकिन जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में रिलायंस इंडस्ट्रीज और सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि तेल एवं गैस खंडों के साथ लाभ बांटने को लेकर चल रही व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है.

केजी बेसिन के साथ लाभ बंटवारे के संदर्भ में मौजूदा अनुबंध के अनुसार इस गैस क्षेत्र के ठेकेदारों को सरकार का लाभांश देने से पहले राजस्व राशि में से अपना खर्च निकाल लेने की अनुमति है.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, 'सरकार और क्षेत्र के संचालकों के बीच उत्पादन में हिस्सेदारी का अनुबंध इस प्रकार तय किया गया था कि इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को पूंजी लगाने के लिए प्रोत्साहन मिले ताकि सरकार पर भार कम पड़े.'

केजी बेसिन से देश की जरूरत के 25 प्रतिशत गैस आपूर्ति की उम्मीद थी लेकिन कम उत्पादन के चलते ऐसा नहीं हो सका

रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस को 25 प्रतिशत क्षेत्र छोड़े बिना ब्लाॅक के दूसरे और तीसरे चरण की खोज की अनुमति दे दी गई, जबकि प्रत्येक चरण के बाद ऐसा करना होता है लेकिन रिलायंस ने पूरे ही क्षेत्र को खोज का क्षेत्र मान लिया.

केजी बेसिन से देश की जरूरत के 25 प्रतिशत गैस आपूर्ति की उम्मीद थी लेकिन कम उत्पादन के चलते ऐसा नहीं हो सका है और भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए 80 प्रतिशत गैस आयात करनी पड़ती है और भारत अपनी ऊर्जा व ईंधन जरूरतों और उर्वरक प्लांट के लिए आयातित लिक्विड गैस पर निर्भर है.

कैग की रिपोर्ट संसद के पटल पर रखे जाने के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार पर केजी डी 6 से गैस उत्पादन लक्ष्य पूरा न कर सकने वाली रिलायंस के खिलाफ कार्यवाही करने का दबाव बढ़ गया, इसलिए सरकार ने रिलायंस पर हर साल जुर्माना लगाना शुरू कर दिया.

केजी बेसिन पर अन्य विवाद

2013 में ओएनजीसी ने दावा किया कि रिलायंस ने जानबूझ कर उसके ब्लाॅक के पास कुएं खोदे और अच्छी खासी मात्रा में गैस निकाल ली. जब आरआईएल ने कम्पनियों की शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया तो ओएनजीसी ने मई 2015 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.

अदालत में आरआईएल ने ओएनजीसी के दावे पर यह जवाब दिया कि उसके आरोप निराधार हैं क्योंकि निकटवर्ती क्षेत्र से गैस निकालना तकनीकी रूप से संभव नहीं है. साथ ही यह भी दावा किया कि रिलायंस ने डायरेक्ट्रेट जनरल आॅफ हाइड्रोकार्बन (डीजीएच) द्वारा स्वीकृत फील्ड डेवलेपमेंट प्लान के तहत ही गैस निकाली.

मामले के निपटारे के लिए डीजीएच ने ओएनजीसी और आरआईएल की सहमति से अमरीकी परामर्शदाता डीगोयलर एंड मैकनाॅग्टन (डी एंड एम) को नियुक्त किया. इसे क्षेत्र का सर्वे कर दोनों कम्पनियों द्वारा किए जा रहे दावों की सत्यता की जांच की जिम्मेदारी दी गई.

डी एंड एम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 11 हजार करोड़ रूपए से अधिक कीमत की 11.122 अरब क्युबिक मीटर प्राकृतिक गैस ओएनजीसे के कृष्णा-गोदावरी क्षेत्र से निकटवर्ती केजी डी 6 के आरआईएल ब्लाॅक को भेजी गई.

इस रिपोर्ट के आने के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय ने न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) एपी शाह के नेतृत्व में एक सदस्यीय पैनल गठित किया और उसे दोनों पक्षों की सफाई सुनने के बाद मामले की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया. शाह पैनल को जुलाई 2016 तक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी.

First published: 20 August 2016, 22:49 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी