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ईपीएफ पर कर लगाने का क्या मतलब?

नीरज ठाकुर | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • सरकार ने ईपीएफ और एनपीएस में जमा रकम के 60 फीसदी हिस्से पर मिलने वाले ब्याज को कर दायरे में लाने का फैसला लिया है.
  • लेकिन अगर सरकार केवल 60 फीसदी बचत पर टैक्स लगा रही है तो सवाल उठता है कि कोई व्यक्ति क्यों अपनी जिंदगी भर की कमाई को जमा करेगा अगर उसे आखिर में इस पर टैक्स देना पड़े.

पिछले दो बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मध्य वर्ग को कायदे से कुछ भी नहीं दिया है. आयकर के स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है क्योंकि सरकार को रेवेन्यू जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता था.

लेकिन अब सरकार ने ऐसा फैसला लिया है जिसे नौकरीपेशा लोगों के पसीने छूट सकते हैं. सरकार ने ईपीएफ और एनपीएस में जमा रकम के 60 फीसदी हिस्से पर मिलने वाले ब्याज को कर दायरे में लाने का फैसला लिया है.

29 फरवरी के बजट भाषण में जेटली ने कहा था कि रिटायरमेंट के दौरान कुल जमा पूंजी में केवल 40 फीसदी रकम पर ही टैक्स में छूट मिलेगी. इसका मतलब यह हुआ कि बाकी की रकम पर टैक्स देना होगा. हालांकि अगर इस रकम को पेंशन फंड में निवेश किया गया है तो वह कर के दायरे से बाहर होगा.

लेकिन अगर सरकार केवल 60 फीसदी बचत पर टैक्स लगा रही है तो सवाल उठता है कि कोई व्यक्ति क्यों अपनी जिंदगी भर की कमाई को जमा करेगा अगर उसे आखिर में इस पर टैक्स देना पड़े.

मध्य वर्ग की कीमत पर स्टार्टअप को मिली राहत

कर्मचारियों को अपने मूल वेतन का 12 फीसदी पेंशन के तौर पर पीएफ खाते में जमा कराना होता है. सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत इस फंड को मैनेज करने का काम ईपीएफ करती है.

रोचक तौर पर सरकार ने जहां मध्य वर्ग पर कर लगाया वहीं उसने स्टार्ट-अप कंपनियों को राहत पहुंचाई. स्टार्ट-अप कंपनियों को ईपीएफ फंड में पहले तीन सालों तक पीएफ मनी के तौर पर महज 8.33 पर्सेंट का भुगतान करना होगा.

जबकि पहले अगर कोई कंपनी सालाना ईपीएफ खाते में 1.5 लाख रुपये का भुगतान करता था तब भी उसे टैक्स भरना होता था. अतीत में इस राशि को लेकर लिमिट नहीं थी.

सरकार का बचाव

गुरुवार को जारी बयान में सरकार ने कहा कि कर संरचना में बदलाव का मकसद निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को पेंशन फंड में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करना था.

सीपीएम के राज्यसभा सांसद तपन सेन ने सरकार के इस फैसले का आलोचना की हैं. सेन ने कहा, 'सरकार के पास कर्मचारियों के जीवन भर की जमा पूंजी पर कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है. लोग कड़ी मेहनत से इसे जमा करते हैं. लोग यह पैसा अपने रिटायरमेंट के लिए जमा करते हैं जब उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ता है. फिर सरकार को इस पैसे पर कर क्यों लगाना चाहिए?' 

सरकार के इस फैसले के खिलाफ ट्रेड यूनियन भी विरोध के लिए कमर कस रहे हैं. सरकार के इस फैसले के खिलाफ 11 से अधिक सेंट्रल यूनियन 10 मार्च को हड़ताल पर जाने की योजना बना रहे हैं. 

घरेलू बचत पर असर

भारत के वृद्धि दर गिरने की सबसे बड़ी वजह जीडीपी के मुकाबले घरेलू बचत में आई गिरावट है. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ  डिवेलपमेंट रिसर्च के प्रोफेसर आर नागराज ने कहा कि 10 फीसदी की ग्रोथ रेट हासिल करने के लिए भारत को घरेलू बचत में बढ़ोतरी करनी होगी.

पिछले दशक में जीडीपी के मुकाबले घरेलू बचत की दर 33-34 फीसदी थी जो अब घटकर 29-30 फीसदी हो चुकी है. 

नागराज ने कहा कि ईपीएफ पर कर लगाकर सरकार भारत के घरेलू बचत को पलीता लगाने का काम कर रही है. क्या ऐसे में एनपीएस को आगे बढ़ाने का कोई मतलब है? अब गेंद लोगों के पाले में है और अब उन्हें ही यह तय करना है कि वह ईपीएफ में निवेश करते हैं या नहीं. 

First published: 2 March 2016, 5:25 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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