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श्रम सुधारः हरियाणा भी मजदूरों को 'चट रखो पट निकालो' की राह पर

राजीव खन्ना | Updated on: 17 February 2016, 22:59 IST
QUICK PILL
  • हरियाणा सरकार राज्य के श्रम कानूनों में बदलाव की तैयारी कर रही है. प्रस्तावित कानून में मजदूरों को नौकरी पर रखने और निकालने को आसान बना देने का प्रस्ताव है.
  • मजदूर संगठन प्रस्तावित कानून का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि प्रस्तावित कानून मजदूरों के खिलाफ है. मजदूर संगठन विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं.

राजस्थान की तर्ज पर हरियाणा भी नया श्रम कानून बनाने जा रहा है जिसके बाद राज्य में नौकरियों में 'हायर एंड फायर' (चट रखो पट निकालो) आसान हो जाएगा.

राज्य सरकार ने कारोबारियों को कानूनी छूट देने की भी योजना बना रही है. राज्य बहुत सारी जगहों पर स्वप्रमाणन को लागू करने पर विचार कर रहा है. मजदूर संगठन इसका विरोध कर रहे हैं लेकिन सवाल ये है कि क्या राज्य सरकार उसे कोई तवज्जो देगी.

खबरों के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने मुंबई में आयोजित मेक इन इंडिया इवेंट में रविवार  को कहा, "श्रम सुधार बड़ी प्राथमिकता हैं. मुझे भरोसा है कि ये विधानसभा में पारित हो जाएगा."

खट्टर दावा करते रहे हैं कि राज्य में औद्योगिक उठापटक बीते जमाने की बात है और राज्य औद्योगिक निवेश के लिए तैयार है. पिछले कुछ सालों में हरियाणा कई औद्योगिक हिंसाओं का शिकार बना है. गुड़गांव के मानेसर में स्थित मारुति के कारखाने में हुई हिंसा एक उदाहरण भर है. गुड़गांव मानेसर बेल्ट में ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं.

विश्लेषकों के अनुसार नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि बीजेपी शासन वाले राज्यों में निवेश लाने के लिए श्रम सुधार लागू हों

खट्टर ने दावा किया, "मजदूर संगठन और उद्योग जगत में अब सौहार्दपूर्ण संबंध है. सरकार ने भी कई प्रोत्साहन देने वाली श्रम नीतियां बनाई हैं, जिसमें न्यूनतम मजदूरी बढ़ाना शामिल है."

बीजेपी शासित राजस्थान देश का पहला राज्य है जिसने श्रम सुधार लागू किया. राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 2014 में कई कानूनों में संशोधन किया.

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विश्लेषकों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निवेश आकर्षित करने के लिए श्रम सुधारों पर जोर देते रहे हैं. इसीलिए जिन राज्यों में उनकी पार्टी की सरकार है वहां ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं. भारत में करीब 43 श्रम कानून हैं जिन्हें बनाया तो केंद्र सरकार ने है लेकिन उनमें से ज्यादातर को लागू राज्य सरकारें करती हैं.

कुछ राजनीतिक जानकारों के अनुसार चूंकि राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण केंद्र सरकार श्रम कानूनों में बदलाव नहीं ला पा रही है इसलिए वो राज्य सरकारों से उन कानूनों में बदलाव करने के लिए कह रही है जो समवर्ती सूची में आते हैं.

इन श्रम सुधारों के समर्थकों के अनुसार राज्यों में निवेश का माहौल बनाने के लिए ऐसे कानून बनाना जरूरी है जिससे राज्य का कारोबारी उत्पादन बढ़ सके.

क्या है श्रम सुधार?


हरियाणा सरकार इंडस्ट्रियल डेस्प्यूट एक्ट 1947 में बदलाव करना चाहती है. प्रस्तावित कानून के अनुसार 300 या उससे ज्यादा मजदूरों वाले कारखानों को ही यूनिट बंद करने या मजदूरों की छंटनी से पहले अनुमति लेनी होगी. मौजूदा कानून के अनुसार 100 मजदूरों या उससे ज्यादा की संख्या पर ऐसी इजाजत लेनी पड़ती है.

प्रस्तावित कानून में मजदूरों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति मौजूदा कानून के अनुसार ही रहेगी. सूत्रों के अनुसार नए कानून के अनुसार जिन कारखानों में 300 तक मजदूर हैं उन्हें ढांचागत बदलाव की इजाजत दी जाएगी.

ठेका मजदूरी के कानून में भी बदलाव करने का प्रस्ताव है. प्रस्तावित कानून के अनुसार कोई कारोबारी 50 मजदूरों तक को ठेकेदार की मदद से काम पर रख सकता है इसके लिए उसे पंजीकरण और लाइसेंस लेने की औपचारिकताएं पूरी नहीं करनी होंगी. अभी ये छूट 20 मजदूरों तक पर है.

हरियाणा सरकार ने फैक्ट्री एक्ट 1948 में भी सुधार प्रस्तावित किया है. इस कानून के तहत 20 मजदूरों तक वाले बिजली की सुविधा वाले और 40 मजदूरों तक वाले बगैर बिजली की सुविधा वाले कारखानों को इस कानून के अतंर्गत नहीं रखा जाएगा. प्रस्तावित कानून में पहली बार कानून का उल्लंघन करने वालों के मामले पर फैक्ट्री कानून के तहत विचार किया जाएगा न कि आम अदालत में.

नए कानून में 'स्वप्रमाणन' योजना का भी प्रस्ताव है. सरकार के अनुसार इसका मकसद मजदूरों के सामाजिक-कानूनी अधिकारों के संग समझौता किए बगैर कारखानों के गैर-जरूरी निरिक्षण पर रोक अंकुश लगाना है. सरकार का दावा है कि इससे राज्य में कारोबार करना आसान होगा.

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पिछले साल जुलाई में एंटरप्राइज प्रमोशन पॉलिसr 2015 में खट्टर ने कई श्रम सुधारों की घोषणा की थी. उन्होंने टियर टू शहरों के लिए अलग मजदूरी की दर निर्धारित करने के प्रस्ताव की बात कही थी ताकि ऐसे शहरों में कारोबारों को बढ़ावा मिले.

प्रस्तावित नीति के अनुसार, "मजदूरों की संख्या सीमा को 100 से 300 करने से मजदूरों और कारोबारियों दोनों को फायदा होगा. इससे ज्यादा रोजगार पैदा होगा. "

प्रस्तावित कानून के अनुसार आईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो और टेक्सटाइल उद्योग को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 के तहत पब्लिक यूटिलिटी का दर्जा दिया जाएगा.

मजदूर संगठनों के अनुसार हरियाणा के प्रस्तावित श्रम कानून मजदूरों के खिलाफ है

मजदूर संगठन प्रस्तावित कानूनों का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि ये सारे बदलाव कारोबारियों के हित में हैं. सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन(सीटू) की हरियाणा इकाई के सचिव सुरेंद्र सिंह ने कैच न्यूज को बताया, "कारोबारी कानूनों के उल्लंघन से निपटने के दो तरीके हैं. एक, मौजूदा कानून को पूरी तरह लागू किया जाए. दो, उल्लंघन को ही कानूनी बना दिया जाए. मौजूदा सरकार दूसरा तरीका अपना रही है."

सुरेंद्र के अनुसार मजदूरों की संख्या सीमा 100 से 300 करने पर राज्य की 80 फीसदी कारखाने नए कानून के तहत आ जाएंगे. वो कहते हैं, "मालिकों को छंटनी की छूट देना मजदूरों के हित में नहीं है."

सुरेंद्र बताते हैं कि राज्य में मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी के स्थिति पहले से ही खराब है. वो कहते हैं कि 'चट रखो पट निकालो' की नीति से मजदूरों में असुरक्षा बढ़ जाएगी.

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आल इंडिया सेंट्र्ल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन(एआईसीसीटीयू) के नेता प्रेम सिंह अहलावत कहते हैं कि सरकार सुधार के नाम पर मजदूरों के अधिकारों में कटौती कर रही है और हम राज्य भर में इसका विरोध करेंगे.

इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस(इंटक) के हरियाणा सेक्रेटरी अमित यादव कहते हैं मजदूर संगठन विरोधस्वरूप कि विधान सभा तक मार्च करेंगे. 

वो कहते हैं, "इन कथित सुधारों के बाद कारोबारी कई छोटी छोटी इकाइयां बनाकर इनका लाभ उठाएंगे और बाद में इसे बिल्डरों को बेच देंगे. इससे मजदूरों को कुछ नहीं मिलेगा. यही राजस्थान में हो रहा, यही मध्य प्रदेश में हो रहा है."

एक सरकारी अधिकारी ने नाम न देने की शर्त पर कैच को बताया, "सरकार अपना काम करेगी. मजदूर संगठन का दिन जा चुका. अब वो मृत समान हैं."

बहरहाल, कहा जा रहा है कि प्रस्तावित श्रम सुधारों को जल्द ही मंत्री मंडल से पारित करा के विधान सभा में पेश किया जाएगा.

First published: 17 February 2016, 22:59 IST
 
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