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काला धन: क्या वास्तव में मोदीजी ने जुमला ही दिया था?

नीरज ठाकुर | Updated on: 18 May 2016, 8:35 IST
QUICK PILL
  • मोदी सरकार ने 80 लाख करोड़ रुपया वापस लाने के साथ हर व्यक्ति को 15 लाख रुपया देने का वादा किया था लेकिन हकीकत में आंकड़ा 5,000 करोड़ रुपये भी नहीं हो पाया है.
  • सरकार उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करने में विफल रही है जिन्होंने विदेश में काला धन छिपा रखा है. लेकिन सरकार ने भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं.

भारत में हर कोई काले धन के बारे में बात करता है. हर दिन की बहस में लोग इस पर चर्चा जरूर करते हैं. मसलन अगर काला धन वापस आ गया तो इतनी समस्याएं सुलझ जाएंगी या फिर रातों रात भारत एक गरीब मुल्क से विकसित देशों की कतार में जा खड़ा होगा.

काले धन को वापस लाने के वादे के साथ मौजूदा एनडीए सरकार सत्ता में आई. अपने चुनावी भाषण में नरेंद्र मोदी ने सरकार बनने के 100 दिनों के भीतर 80 लाख करोड़ काले धन को वापस लाने का वादा किया था.

मोदी सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं और काले धन के खिलाफ लड़ाई जारी है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकार ने अपना वादा पूरा किया? जवाब हां और न के बीच में है.

हां इसलिए क्योंकि सरकार को काला धन वापस लाने की दिशा में कानून बनाने में एक साल से अधिक का समय लग गया. नए कानून के बाद महज 3,770 करोड़ रुपये की रकम वापस लाने में सफलता मिली है. 

सरकार ने 80 लाख करोड़ रुपया वापस लाने के साथ हर व्यक्ति को 15 लाख रुपया देने का वादा किया था लेकिन हकीकत में आंकड़ा 5,000 करोड़ रुपये भी नहीं हो पाया है.

मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 100 दिनों के भीतर विदेश में रखे काला धन को वापस लाने का वादा किया था

काला धन को वापस लाए जाने की योजना विफल होने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली फरवरी 2016 में नई योजना के साथ सामने आए. इस योजना में घरेलू संपत्तियों को निशाना बनाया गया.

नई योजना में कहा गया कि अघोषित संपत्ति पर 45 फीसदी टैक्स का भुगतान कर उसे सफेद बनाया जा सकता है. इस योजना की शुरुआत एक जून 2016 से होेगी. अब यह योजना कितनी सफल रहती है, यह भविष्य बताएगा.

सरकार के कदम

काला धन वापस लाना चुनावी जुमला ही रहा है और दुनिया की कोई भी सरकार काले धन को उतनी आसानी से वापस नहीं ला सकती. लेकिन सरकार ने अब आगे से ब्लैक मनी को देश से बाहर जाने से रोकने के लिए जरूर कुछ कदम उठाए हैं.

हालांकि पिछले कुछ सालों के दौरान काले धन को लेकर सरकार की मंशा को लेकर सवााल उठने लगे हैं. हार्वे फलसैनी ने स्विट्जरलैंड के एचएसबीसी बैंक में भारतीयों के रखे काले धन को देश वापस लाए जानेे के मामले में सरकार को मदद देने का वादा किया था. लेकिन मोदी सरकार ने इस पेशकश को नजरअंदाज कर दिया.

फलसैनी ने कहा, मैं भारत आकर भारतीय अधिकारियों की इस मामले में मदद करना चाहता हूं. लेकिन सरकार ने इस पेशकश को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया.

पनामा पेपर्स लीक में सामने आए भारतीयों के बारे में सरकार ने कहा कि वह मामले की जांच करेगी

इस साल अप्रैल महीने में इंडियन एक्सप्रेस ने उन भारतीयों के बारे में जानकारी दी जिन्होंने विदेश में अपना खाता खोल रखा है. सरकार ने हर बार की तरह ही इस खुलासे को लेकर कहा कि वह सामने आए सभी नामों के बारे में जांच करेगी.

सरकार की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि सीबीडीटी, वित्तीय खुफिया ईकाई और आरबीआई के अधिकारी जांच दल में शामिल होंगे और यह टीम विदेश में खाता रखने वाले लोगों की जांच करेगी.

लेकिन समय बीतने के साथ ही यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ता दिख रहा है. क्या सरकार ने इस मामले में अलग बर्ताव किया?

काले धन से जुड़े मामलों की विशेष जानकारी रखने वाले प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि सरकार काला धन वापस लाने के मामले में प्रतिबद्धता साबित करने में विफल रही है. 

उन्होंने कहा, सरकार को एचएसबीसी मामले में कुछ करना चाहिए था. हम जानते हैं कि एचएसबीसी हवाला का हिस्सा था लेकिन यूपीए और एनडीए सरकार ने इस मामले में कुछ भी नहीं किया. आप अमेरिका को देखिए उन्होंने यूबीएस पर 78 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया जबकि क्रेडिट सुइस पर 2 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया गया. इसके साथ ही काला धन रखने के मामले में मदद देने वाले कई अन्य बैंकों पर जुर्माना लगाया गया. वहीं भारत सरकार इस मामले में कुछ भी करने में विफल रही हैं.

मॉरीशस समझौता

सरकार उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करने में विफल रही है जिन्होंने विदेश में काला धन छिपा रखा है. लेकिन सरकार ने भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं.

मॉरीशस और भारत के बीच हुए समझौते के तहत अब शेयरों की बिक्री पर होने वाले पूंजीगत लाभ पर मॉरीशस में भी कर देना होगा. अगर शेयरों को 12 महीने से कम रखा जाता है तो उसे शॉर्ट टर्म कैपिटल लाभ के तौर पर देखा जाएगा और इस पर 15 फीसदी टैक्स देना होगा. लेकिन अगर शेयरों को 12 महीनों से अधिक तक रखा जाता है तो फिर उस पर कोई टैक्स नहीं लगेगा.

करीब तीन दशक तक दुनिया भर के निवेशकों ने मॉरीशस के रास्ते भारत में निवेश कर काले धन को भारत की अर्थव्यवस्था में पंप किया.

तो क्या संधि में बदलाव से मिलेगी मदद?

अरुण कुमार के मुताबिक दुनिया भर में 80 से अधिक टैक्स हैवेंस हैं. निवेशक बेहद आसानी से अपने लेन-देन को मॉरीशस से दूसरे टैक्स हैवेंस में पहुंचा देते हैं.

कुमार का कहना सही प्रतीत होता है. दिसंबर 2015 में बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक निवेशकों को इस संधि में होने वाले संशोधन के बारे में पता था और उन्होंने मॉरीशस की बजाए सिंगापुर से भारत में पैसों का निवेश शुरू कर दिया.

क्या काले धन पर कोई दीर्घकालिक समाधान निकल पाएगा?

दुनिया की सभी सरकारें काले धन को रोकने के लिए एक दूसरे के साथ मिलकर काम कर रही हैं. ओईसीडी भी इस मामले में मिलकर काम करने पर सहमत हो गई है. लेकिन इस काम को पूरा करने में खासी मुश्किलें आएंगी.

सरकार की उपलब्धि

सरकार को इस बात का श्रेय देना चाहिए कि उसने काले धन को नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाए हैं. लेकिन सरकार काला धन रखने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में अब तक फिसड्डी साबित हुई है. 

हम जानते हैं कि काले धन की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े लाभार्थी नेता और राजनीतिक दल होते हैं. इनसे निपटने में विफलता यह बताती है कि सरकार का 100 दिनों में 80 लाख करोड़ रुपये लाने का वादा महज जुमला ही था.

First published: 18 May 2016, 8:35 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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